ज़िन्दगी
सर्दियों के किसी इतवार की अलसुबह सी
अलसाई अलसाई
बिस्तर में ही गुज़र बसर हो जाती है
ना आगे खुद बढती है
ना बढ़ाने की इच्छा होती है।
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हर उड़ान की एक मंजिल होती है। कि एक चमकीला दिन शाम में घुल जाता है। कि पूनम का चांद सूरज की आगवानी में स्वाहा होता जाता है। कि रात के जगमग स...
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