Saturday, 26 November 2016

ज़िन्दगी


ज़िन्दगी 
सर्दियों के किसी इतवार की अलसुबह सी 
अलसाई अलसाई
बिस्तर में ही गुज़र बसर हो जाती है
ना आगे खुद बढती है
ना बढ़ाने की इच्छा होती है।
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