Thursday, 22 September 2016

रियो पैरालंपिक

                
(गूगल से साभार)
                                                      लाल अक्सर गुदड़ी में छिपे होते हैं।खुशियाँ अक्सर उन लम्हों में आती हैं जब आप उनकी उम्मीद नहीं कर रहे होते हैं और अक्सर जिनकी काबिलियत में आपका विश्वास नहीं होता वे चमत्कार कर देते हैं।याद कीजिए रियो ओलंपिक खेलों को।कितने गाजे बाजे के साथ 117खिलाड़ियों और उनसे भी ज्यादा सपोर्टिंग स्टाफ तथा अधिकारियों का दल रियो गया था।परिणाम ? वही ढाक के तीन।पदक जीतने के लाले।भला हो साक्षी और सिन्धु का जिन्होंने दल को खाली हाथ लौटने की शर्मिंदगी से बचा लिया।इस दल का शायद ही कोई खिलाड़ी हो जिसे आप नहीं जानते हों।मैं तो जानता था।ज्यादातर स्टार थे।लेकिन क्या आप दीपा मलिक,देवेन्द्र झाझंरिया,वरुण सिंह भाटी या मरियप्पन को जानते थे? क्या रियो पैरालंपिक में गए 19 खिलाड़ियों में से किसी एक को जानते थे?उनके किसी प्रशिक्षण शिविर या प्रशिक्षण कार्यक्रम के बारे में सुना था? नहीं ना!मैंने तो नहीं सुना था।लेकिन उन 19 ने वो कर दिखाया जो 117 नहीं कर पाए।उन्होंने दो स्वर्ण एक रजत और एक कांस्य पदक जीते। एक बार फिर दोहराता हूँ उड़ान के लिए होंसले की जरुरत होती है;जीत के लिए जोश,जुनून,जज़्बे और कड़ी मेहनत की जरूरत होती है।रियो पैरालंपिक में गए भारतीय दल को बधाई।



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