Thursday, 30 August 2018

एशियाड 2018 डायरी वाया फेसबुक

           


एशियाड 2018 डायरी वाया फेसबुक




दिनांक 21 अगस्त:समय 12:53 



नाम - सौरभ चौधरी
उम्र - 16 साल
ग्राम - कलीना ज़िला मेरठ

और
कारनामा - इंडोनेशिया में चल रहे 18वें एशियाड में
10 मीटर एयर पिस्टल स्पर्द्धा में नए एशियाई खेल रिकार्ड के (240.7अंक)साथ स्वर्ण पदक जीतना और वो भी दो बार के विश्व चैंपियन रहे जापान के तोमोयुकी मत्सुदा को परास्त कर।

मुबारक सौरभ।

नोट-सौरभ चौधरी ने इसी जून में जूनियर विश्व कप में विश्व रिकार्ड के साथ और पिछले माह चेक गणराज्य में आयोजित 28वीं 'मीटिंग आफ शूटिंग होप्स अंतरराष्ट्रीय चैम्पियनशिप में इसी स्पर्धा में स्वर्ण पदक जीत चुके हैं।

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दिनांक 22 अगस्त:समय14:37 

नाम - राही जीवन सरनोबत
उम्र - 27
स्थान - कोल्हापुर
और
कारनामा - 18वें एशियाड में 25 मीटर पिस्टल स्पर्द्धा में स्वर्ण पदक

विशेषता - एशियाई खेलों में शूटिंग में स्वर्ण पदक जीतने वाली पहली महिला।

बधाई राही।
(ये 18वे एशियाड का भारत का चौथा स्वर्ण पदक है।)

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दिनांक 23 अगस्त:समय19:40

नाम - शार्दुल विहान
उम्र - 15 वर्ष
स्थान- गाँव सिवाया ज़िला मेरठ
और
कारनामा - 18वें एशियाड में डबल ट्रैप स्पर्द्धा में 
रजत पदक।

नोट-इस स्पर्द्धा में स्वर्ण पदक जीतने वाले कोरिया के शिन सुनजिन के 74 शॉट्स के मुक़ाबिल 73 शॉट्स लगाए। सन 2015 में पहली प्रतियोगिता में भाग लेने वाले शार्दुल ने 2017 में दिल्ली में आयोजित 61वीं राष्ट्रीय शॉटगन प्रतियोगिता में चार स्वर्ण पदक जीते थे।

बहुत बधाई शार्दुल विहान। 

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दिनांक 23 अगस्त:समय20:32
  

खबर ये है कि भारत की पुरुष कबड्डी टीम इस बार फाइनल में नहीं पहुँच पाई है।सेमीफाइनल में वो ईरान से 27 के मुकाबले 18 अंकों से हार गयी है।इससे पहले लीग मैच में भारतीय टीम कोरिया से भी 23-24 अंकों से हार गई थी।ये किसी भी पदक जीतने की खुशी के मुक़ाबिल गहरा आघात पहुंचाने वाली बात है।यकीं मानिए इसमें हॉकी वाली दुर्दशा की बू आ रही है।समय रहते नहीं चेते तो वही हश्र होने जा रहा है।
कबड्डी एक ऐसा खेल है जिसे लीग सिस्टम ने सबसे ज्यादा फायदा पहुंचाया।फायदा इस मायने में कि इस खेल को बहुत ही लोकप्रिय बनाया।पर लगता है खेल में सिर्फ ग्लैमर बढ़ा और कुछ नहीं।आखिर क्या कारण है कि लीग शुरू होने के बाद के लगभग पहले ही एशियाड में ये दुर्गति।

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दिनांक 24 अगस्त:समय22:52
  

नाम - स्वर्ण सिंह, दत्तू भोकानल, ओम प्रकाश
         और सुखमीत सिंह
स्पर्द्धा - रोइंग की स्कल्स ( चार नाविक)

और

कारनामा - स्वर्ण पदक नं पाँच


बधाई टीम रोइंग इंडिया

नोट - यह एशियन गेम्स के रोइंग में भारत का सिर्फ दूसरा गोल्ड मेडल है। बजरंग लाल ठाकर ने 2010 के सिंगल्स इवेंट में गोल्ड मेडल जीता था।और हाँ आज स्वर्ण पदक जीतने से पहले भारत ने नौकायन में दो ब्रॉन्ज मेडल भी जीते -1.रोहित कुमार और भगवान सिंह ने डबल स्क्ल्स 2.दुष्यंत ने लाइटवेट सिंगल स्कल्स

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दिनांक 24 अगस्त:समय23:00
   

स्वर्ण पदक नं 6
टेनिस पुरुष युगल
रोहन बोपन्ना और दिविक शरण।

बधाई रोहन/दिविक

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दिनांक 25 अगस्त:समय 19:55

नाम - तेजिंदर पाल सिंह तूर

स्थान - मोगा पंजाब
स्पर्द्धा- शॉटपुट
और
कारनामा-भारत के लिए 18वें एशियाड में सातवां 
स्वर्ण पदक जीतना।



तेजिंदर ने अपने पांचवे प्रयास में 20.75 मीटर गोला फेंक कर नया गेम रेकॉर्ड बनाया।अभी 2017 में भुबनेश्वर में एशियाई खेलों में 19.77 मीटर थ्रो के साथ रजत पदक जीता था और मात्र .03 मीटर से स्वर्ण पदक चूक गए थे।उनका अब तक का सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन 2017 में पटियाला में आयोजित सीनियर एथेलेटिक्स प्रतियोगिता में आया था जब उन्होंने 20.40 मीटर गोला फेंका था।

नोट-वे मोगा जिले के खोसा पंडो गाँव के हैं और क्रिकेट छोड़ कर एथेलेटिक्स में आये।गौरतलब है इस बार तमाम ऐसे खिलाड़ी हैं जो क्रिकेट छोड़कर आये हैं और ये भी कि वे ग्रामीण पृष्ठभूमि वाले साधारण परिवार से आते हैं।

बहुत बधाई तेजिंदर।

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दिनांक 26 अगस्त:समय 15:01


तमाम अनिश्चिताओं और अव्यवस्थाओं के बीच प्रतियोगिताओं में भाग लेना और फिर भारी उम्मीदों के बोझ और दबावों के तले खेलना और तब भी पदक जीतना भारतीय खिलाड़ियों की नियति बन गई है।अब घुड़सवारी को ही लीजिए। मई में 7 सदस्यीय टीम की घोषणा हुई तो अगले दिन ही टीम का खेलों में भाग लेना स्थगित कर दिया गया।फिर जब पूरा भारतीय दल इंडोनेशिया जाने लगा तो आनन फानन घुड़सवारी टीम को भी जाने की अनुमति मिली।अब घोड़ों के साईसों को अनुमति नहीं मिली और एक लंबे समय के लिए घोड़े बिना साईस के रहे।
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ऐसे में आज भारत को आठवें दिन घुड़सवारी स्पर्धा में दो रजत पदक हासिल हुए।पहला रजत पदक फवाद मिर्जा ने एकल स्पर्द्धा में दिलाया। मिर्जा ने सेनोर मेडिकोट घोड़े के साथ फाइनल में 26.40 सेकेंड में अपनी स्पर्धा को पूरी कर रजत पदक जीता।मिर्जा ने 2014 में हुए एशियाई खेलों में इसी स्पर्धा में 10वां स्थान हासिल किया था।उल्लेखनीय है घुड़सवारी में भारत को 32 साल बाद पदक मिला है।
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इसी इवेंट की टीम स्पर्धा में भारत ने दूसरा स्थान हासिल कर रजत पदक जीता. राकेश कुमार, आशीष मलिक, जीतेंद्र सिंह और मिर्जा की टीम ने 121.30 सेकेंड के साथ रजत पदक जीता.

मिर्ज़ा फौद, राकेश,आशीष और जीतेंद्र को बधाई।

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दिनांक 26 अगस्त:समय 17:41


Congratulations! athletes doing good job!

1. Silver for hima in 400m Women


2.Silver for anas in 400m men

3.Bronze for govind lakshamanan in 1000 men 


4.Dutee Chand takes silver medal with a timing of 11.32 seconds 100m women


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दिनांक 26 अगस्त:समय 19:36

India's Lakshmanan Govindan loses bronze in 10,000m after being disqualified for stepping out of the track.

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दिनांक 26 अगस्त:समय 21:05


"Watching Hima, Anas and Dutee perform makes us realise it's not about shoes but about the soul". 
                                                             सehwag

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दिनांक 27 अगस्त:समय 23:29  
  

कुछ दूरियां केवल दूरियां भर नहीं रहती,वे शोहरत की ऊंचाइयों में तब्दील हो जाती हैं और कुछ उड़ान केवल उड़ान नहीं रहती कद की ऊंचाई के पैमाने में तब्दील हो जाती है।आज जब नीरज अपने तीसरे प्रयास में अपने भाले को 88मीटर से 6 सेंटीमीटर और ज़्यादा की उड़ान भरवा रहे तो वे केवल एक पदक भर नहीं जीत रहे थे बल्कि पिछले दो दिनों से अपने एथलीट साथियों की रुपहली चमक को सुनहरी चमक में तब्दील कर रहे थे।जब वे ये स्वर्ण पदक जीत रहे थे तो वे भारतीय एथेलेटिक्स के सबसे चमकदार सितारे मिल्खा सिंह की बराबरी भी कर रहे थे।एक ही साल में राष्ट्रमंडल खेलों और एशियाड में स्वर्ण पदक जीतने की। 

बहुत बधाई नीरज।

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दिनांक 28 अगस्त:समय 13:05   
  
ओह!ऐसा तो न सोचा था! एक उम्मीद भरे दिन की उदास शुरुआत!तीन सुनहरी उम्मीदें रुपहली सांत्वना भर रह गईं!


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दिनांक 28 अगस्त:समय 18:26 
   


जिस सुनहरे रंग की तलाश भारत को आज सुबह से थी वो डूबते सूरज से मंजीत ने चुरा ही लिया।

एक उदास दिन को खुशनुमा शाम में बदलने के लिए तेनु बहुत बहुत बधाई ओये मनजित्ते।

और जिनसन जॉनसन को भी।

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दिनांक 29 अगस्त:समय 19:07
    


ये क्या ही कमाल है कि समुद्र में डूबता सूरज अपनी सुनहरी चमक भारतीय खिलाड़ियों के गले में तमगों के रूप में सुरक्षित कर जाता है।



बधाई स्वप्ना बर्मन और अरपिंदर

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दिनांक 30 अगस्त:समय 18:39 


उफ्फ्फ! अभी तो अपने देसी खेल की मायूसी से ही ना उबरे थे,ऐ मेरे राष्ट्रीय खेल ये तूने क्या किया!

जिनसन आज तो तुम्हारा ये सोना ही ग़मे समंदर के बियाबान में उम्मीदों की कश्ती का किसी लाइट हाउस सा सहारा बना।

बहुत मुबारक जिनसन।

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दिनांक 30 अगस्त:समय 19:10 

हॉकी वाले भाईयो अगर आप इतनी उम्मीदें जगा के इतने महत्वपूर्ण मैच में मलेशिया से भी हार जाओगे तो भाई लोग क्रिकेट ही देखेंगे ना जहां क्रिकेट वाले भाई लोग 86/6 करके इंग्लैंड की उनके घर में ही बैंड बजा रहे हैं।





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दिनांक 30 अगस्त:समय 19:29


'लेडीज़ फर्स्ट' भाई ये ही दस्तूर है,तमीज है।अब महिलायें 4×400 में प्रथम आईं तो भाई लोगों को उनके पीछे ही रहना था।

4×400 रिले टीम इंडिया

महिला सोना
पुरुष चांदी

दोनों को बहुत बधाई 

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दिनांक 30 अगस्त:समय 19:37 


एथलेटिक्स में भारत

सोना 7 🥇🥇🥇🥇🥇🥇🥇
चाँदी 10🥈🥈🥈🥈🥈🥈🥈🥈🥈🥈 
कांसे 2 🥉🥉
कुल 19 तमगे!


भाई लोग इसे ही राष्ट्रीय खेल घोषित करवा दो।
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Friday, 17 August 2018

भारतीय क्रिकेट टीम की जीत के 'शिखर पुरुष'











भारतीय क्रिकेट टीम की जीत के 'शिखर पुरुष' 
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ये क्या ही संयोग है कि भारतीय क्रिकेट टीम की जीत के 'शिखर पुरुष' अजित वाडेकर ऐन उस समय दिवंगत होते हैं जिस समय भारतीय क्रिकेट टीम इंग्लैंड में मेज़बान टीम से बुरी तरह परास्त हो रही होती है।उस समय उनके मन में उनके अपनी कप्तानी के दोनों ऐतिहासिक दौरों की याद ताज़ा हो रही होगी। पहला वो  दौरा जिसमें उन्होंने इंग्लैंड को उसकी धरती पर पहली बार हराया था 1971 में  या फिर 1974 का दौरा जब टीम 3-0  से बुरी तरह हारी थी। वो दौरा जो 'समर ऑफ़ 42'के नाम से बेहतर जाना जाता है क्यूंकि इसी दौरे में भारतीय टीम ने अब तक का टेस्ट मैच का न्यूनतम स्कोर का रेकार्ड बनाया था और जिसके बाद उन्होंने संन्यास ले लिया  था।वे चाहे जो सोच रहे हो उनका दिल जार जार रो रहा होगा। ये कि ऐतिहासिक जीत के 47 साल बाद ये दुर्दशा या 44 साल बाद भी वो ही दुर्दशा।

 वाडेकर ने कुल 37 टेस्ट खेले जिसमें उन्होंने 2113 रन बनाए।उनके  नाम केवल एक शतक है न्यूज़ीलैंड के खिलाफ 143 रन। वे एक दिवसीय टीम के पहले कप्तान थे। उन्होंने कुल दो एकदिवसीय मैच खेले। ये आँकड़े बहुत प्रभावी नहीं लगते। दरअसल  बहुत बार आंकड़े सही स्थिति नहीं दिखा पाते। वाडेकर के आंकड़े भी यही करते हैं। भारतीय क्रिकेट में उनकी महत्ता बहुत अधिक है। उनका दाय अतुलनीय है। दरअसल वे भारतीय क्रिकेट टीम की जीत के अग्रणी पुरुष हैं। वे पहले कप्तान थे जिन्होंने सबसे फिसड्डी टीम को जीतना सिखाया,अपने पर भरोसा करना सिखाया।वे लगातार तीन सीरीज जीतने वाले पहले कप्तान थे। दो विदेशी धरती पर और घरेलु। 1971 में चयनकर्ता समिति के अध्यक्ष विजय मर्चेंट के निर्णायक मत की बदौलत वे मसूर अली खान पटौदी को हटाकर भारतीय टीम के कप्तान चुने गए। उन्होंने उस चयन को साबित किया। पहले क्रिकेट के सार्वकालिक महान खिलाड़ी गैरी सोबर्स के नेतृत्व वाली वेस्टइंडीज की टीम को हराया और उसके बाद इंग्लैंड को इंग्लैंड की धरती पर हराया। वे यहीं नहीं रुके। उसके बाद इंग्लैंड को घरेलू सीरीज में हरा कर लगातार तीन सीरीज जीतने वाले पहले खिलाड़ी बने।1971 की जीत भारतीय क्रिकेट टीम की जीत एक मानक जीत थी एक लाइट हाउस की तरह जिसने आगे की  सभी जीत के लिए उत्प्रेरक का काम किया। यकीन मानिये 1983 की टीम की स्मृतियों में ये जीत भी बड़ी उत्प्रेरक के रूप में काम कर रही होगी और ये भी कि 1971 की जीत 1983 की जीत से किसी भी मायने में कम नहीं। 
अब जब भारत की टीम  सीरीज का निर्णायक और महत्वपूर्ण तीसरा टेस्ट खेलने जा रही है,इस सीरीज में जीत ही अजित वाडेकर को सच्ची श्रद्धांजलि होगी। अजित वाडेकर की स्मृतियों को नमन।   

Saturday, 11 August 2018

'कहाँ राजा भोज और कहाँ गंगू तेली'




कहाँ राजा भोज और कहाँ गंगू तेली
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                                               कपिल और हार्दिक की तुलना करना अभी ना केवल जल्दबाज़ी है, बल्कि बेमानी भी है। और ये तुलना किस हद तक बेमानी हो सकती है इसे गावस्कर की तल्खी और उनके बयान से समझा जा सकता है।ये सही है कि 2017 में हार्दिक ने शानदार प्रदर्शन किया है। लेकिन आज की तारीख में भी वे भरोसेमंद खिलाड़ी नहीं बन पाए हैं। आज भी यही है कि चल गए तो चल गए नहीं तो राम भरोसे। आज भी उनका स्थान टीम में पक्का नहीं है। जहां दो मैच में असफल हुए तो अगले मैच में या उससे अगले मैच में टीम से बाहर नज़र आएंगे। कपिल लगातार 131 टेस्ट मैच खेले,केवल एक बार राजनीति के चलते बाहर हुए। वे अभी भी कपिल के पासंग भी नहीं हैं। कपिल की उपलब्धियों को छूना तो दूर अभी तो कहीं आस पास भी नज़र नहीं आते। कपिल टीम के लीड बॉलर होते थे जो शानदार इन कटर और बेहतरीन आउट स्विंगर के लिए जाने जाते थे। जबकि हार्दिक आज भी चेंज बॉलर के रूप में आते हैं। क्या उनकी बॉलिंग की कोई खासियत है। अगर बैटिंग और फील्डिंग की भी बात करें  तो 1983 के विश्व कप में ज़िम्बाब्वे के खिलाफ 17 रन पर 5 विकेट गिर जाने के बाद 175 रनों की पारी और उसके बाद फाइनल में 30 गज़ पीछे भाग कर उनके द्वारा लिए गए कैच की क़्वालिटी बताती है कि वे किस स्तर के खिलाड़ी थे। यहां ये भी बात ध्यान में रखनी चाहिए कि हार्दिक अपना ये प्रदर्शन उस समय कर रहे हैं  भारतीय विश्व की सर्वश्रेष्ठ टीमों में शुमार होती है और कपिल उस समय खेल रहे थे जब भारतीय टीम विश्व की सबसे फिसड्डी टीमों में गिनी जाती थी।  दरअसल हार्दिक को कपिल की छाया बनने के लिए भी अभी नर्मदा में असीमित पानी को बहते देखना होगा।
                                                                             सच तो ये है कि कपिल  शानदार आल राउंडर थे और भारतीय क्रिकेट को उनका इतना ज़्यादा योगदान है कि हार्दिक को छोड़िये किसी भी खिलाड़ी से उनकी तुलना नहीं की जा सकती।भारतीय क्रिकेट के दो प्रकाश स्तम्भ हैं गावस्कर और कपिल देव। भारतीय क्रिकेट के अप्रतिम प्रतिमान हैं।रतीय क्रिकेट के  दो स्वरूपों के प्रतिनिधि आइकॉन हैं। ये दोनों भारतीय क्रिकेट के दो प्रस्थान बिंदु हैं। गावस्कर उस युग के सबसे शानदार खिलाड़ी हैं जब क्रिकेट एलीट और जेंटलमैन खेल होता था। उन्होंने दुनिया भर की सबसे खतरनाक बॉलिंग के खिलाफ बैटिंग को नयी ऊंचाइयों तक पहुंचाया था। वे क्रिकेट के क्लासिक स्वरुप के सबसे बेहतरीन व्याख्याता थे। कमज़ोर टीम मानी जाने के बाद भी भारतीय क्रिकेट को एक पहचान दिलाई थी। जहां गावस्कर ने छोड़ा वहां से कपिल ने शुरू किया। यदि गावस्कर ने भारतीय क्रिकेट को पहचान दिलाई तो कपिल ने भारतीय क्रिकेट को नयी ऊंचाइयां प्रदान की। कपिल ने टीम को संगठित किया,नेतृत्व प्रदान किया और विश्व विजेता बनाया। दरअसल 1983 की जीत भारतीय क्रिकेट का सर्वोच्च बिंदु नहीं बल्कि वो प्रस्थान बिंदु था जहां से वो सर्वोच्चता की ओर प्रस्थान करती है। कपिल स्वयं निम्न मध्यम वर्ग से आते थे और वे क्रिकेट के मास स्वरुप का प्रतिनिधित्व करते थे। उनके समय में ही क्रिकेट का स्वरुप अधिक जनतांत्रिक हुआ। गावस्कर से हाथों से क्रिकेट की बागडोर कपिल के हाथों में जाना दरअसल क्रिकेट के एलीट खेल के जन साधारण के खेल में तब्दील होने का रूपक है। कपिल क्रिकेट के संक्रमण काल के खिलाड़ी थे। ये वो समय था जब एलीट खेल मास के खेल में रूपांतरित हो रहा था। उसकी क्लासिक विशेषताएं लोकप्रिय भंगिमाओं में बदल रही थीं। सुस्त रफ़्तार वाला खेल तेजी का रुख कर रहा था। नफासत रफ टफ क्रियाओं में क्रियान्वित हो रही थी। और अपेक्षाकृत असीमित समय वाले खेल का समय सीमित हो रहा था। इस संक्रमण काल में ना केवल सरवाइव करना बल्कि उसे सर्वोच्च स्तर पर ले जाना सबसे कठिन होता है।और कपिल एकदम यही करते हैं। यही कपिल की महानता है। और इसी कारण कोई और खिलाड़ी उनकी समानता नहीं कर सकता। हाँ उनके बाद पहले गांगुली और फिर धोनी उनके काम को आगे बढ़ाते हैं। 
                                                       
         इसीलिये मैं कहता हूँ कि भारतीय क्रिकेट में कपिल की कोई बराबरी नहीं कर सकता। कोई भी नहीं। ये कहना निसंदेह कठोर होगा लेकिन इससे बेहतर कोई मुहावरा याद नहीं पड़ रहा कि 'कहाँ राजा भोज और कहाँ गंगू तेली'। 
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ये आलेख मूलतः एक फेसबुक पोस्ट पर टिप्पणी थी।