Saturday, 29 June 2019

लम्हा लम्हा ज़िन्दगी यूं मचलती है

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"कोई अगर तुमसे पूछे 
मेरे बारे में
तो कहना एक लम्हा था
जो बीत गया
अगर कोई मुझसे पूछेगा 
तुम्हारे बारे में
तो मैं कहूंगा 
एक ही लम्हा था 
जो मैंने जी लिया"
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ये ज़िन्दगी आखिर लम्हों का जोड़ घटाव ही तो है,जमा  बाकी ही तो है। आप लम्हा लम्हा जीते जाते हो। एक लम्हा ज़िन्दगी में जुड़ता जाता है और एक लम्हा ज़िन्दगी कम होती जाती है। किसी लम्हे में पूरी ज़िंदगी जी ली जाती है और कोई एक लम्हा पूरी ज़िंदगी भी नही जिया जाता। एक लम्हे प्रेम के समंदर में डूब जाते हो तो एक लम्हे ग़म के दरिया में। एक लम्हा ख्वाब का,एक लम्हा खराशों का। एक लम्हा मुस्कुराती सुबह का,एक लम्हा उदास शाम का। एक खुशनुमा लम्हा आस का, एक उदास लम्हा निराशा का। 
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एक खुशनुमा लम्हे में कलम ने प्यार का शाहकार रचा अगले लम्हे एक राग ने धड़कना सिखाया और अगले लम्हे स्वर के दरिया में कल कल बह निकला।
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कुणाल-प्रशांत एक लम्हा शब्दों से प्रेम की इमारत बनाते हैं,उसे एक लम्हे में जावेद-मोहसिन अपनी धुन से रंग देते हैं तो प्रेम के अनेकों रंग बिखर बिखर जाते हैंऔर अगले लम्हे जब अरिजीत-श्रेया अपने सुरों की रोशनी से भर देते हैं तो वे रंग खिलखिला उठते हैं
     "तू इश्क़ के सारे रंग दे गया
      फिर खींच के अपने संग ले गया"
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#बॉलीवुड_गीत_7

Sunday, 23 June 2019

'तुमसा नहीं देखा'



         'पूर्ण' शब्द अपने आप में बहुत ही सकारात्मक होने के बावजूद अनेक संदर्भों में  उतना ही नकारात्मक लगने लगता है। एक ऐसा शब्द जो अक्सर खालीपन के गहरे भावबोध में धकेल देता है,कुछ छूट जाने का अहसास कराता है और मन को  अन्यमनस्यकता से भर भर देता है। पिछले दिनों जब युवराज सिंह मुम्बई के एक होटल में जब अपनी मैदानी खेल पारी के पूर्ण होने की घोषणा कर रहे थे तो केवल ये घोषणा ही उनके फैन्स के दिलों में गहन उदासी और खालीपन का भाव नहीं भर रही थी बल्कि वो जगह भी,जहां वे ये घोषणा कर रहे थे,उनके दुख का सबब भी बन रही थी। निसंदेह ये नितांत दुर्भाग्यपूर्ण ही था युवराज जैसे प्रतिभावान खिलाड़ी को जिस पारी के पूर्ण होने की घोषणा खेल मैदान में  गेंद और बल्ले से करनी थी वो एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में माइक के ज़रिए कर रहा था।
              यूं तो उनके खेल आंकड़े स्वयं ही बयान देते हैं कि वे भारतीय क्रिकेट के और खासकर छोटे प्रारूप वाली क्रिकेट के एक बड़े नहीं बहुत बड़े खिलाड़ी हैं। लेकिन उनका ये 'बड़ापन' इन आंकड़ों का मोहताज है ही नहीं। दरअसल वे आंकड़ों के नहीं उपस्थिति के खिलाड़ी हैं। उनका व्यक्तित्व इतना आकर्षक है कि वे मैदान पर अपनी उपस्थिति भर से दर्शकों के दिल में चुपके से घुस जाते हैं और फिर अपने सकारात्मक हावभाव,अथलेटिसिज्म और कलात्मक खेल से दिमाग पर छा जाते हैं। उनके चेहरे पर फैली  स्मित मुस्कान और मैदान पर उनकी गतिविधियों से इतनी पॉज़िटिव ऊर्जा निसृत होती कि दर्शकों के दिलोदिमाग उससे ऐसे आवृत हो जाते कि उन्हें कुछ और नहीं सूझता और उनके प्यार में पड़ जाते।
              वे एक आल राउंडर थे। आल राउंडर मने ऐसे खिलाड़ी जो खेल के हर महकमे में बराबर की दखल और दक्षता रखता हो। और उन जैसा खिलाड़ी एक शानदार आल राउंडर ही हो सकता था। वे आला दर्जे के कलात्मक बल्लेबाज़,अव्वल दर्जे के बेहतरीन क्षेत्ररक्षक और एक अच्छे गेंदबाज़ थे। एक खिलाड़ी के रूप में उनके व्यक्तित्व का कोई एक कुछ हद अनाकर्षक पहलू था तो वो उनका बॉलिंग एक्शन था अन्यथा उन्हें बैटिंग और फील्डिंग करते देखना अपने आप में किसी ट्रीट से कम नहीं होता। वे मोहम्मद कैफ और सुरेश रैना के साथ मिलकर क्षेत्ररक्षकों की ऐसी त्रयी बनाते हैं जिसने केवल फील्डिंग के दम पर भारतीय क्रिकेट की तस्वीर बदल दी। सन 2000 के बाद से क्रिकेट की सफलताओं में फील्डिंग का भी उतना ही योगदान है जितना बैटिंग और बॉलिंग का और निसंदेह इसके श्रेय का बड़ा हिस्सा युवराज के खाते में आता है। युवराज पॉइंट गली या कवर के क्षेत्र में एक ऐसी अभेद्य दीवार थे जिसे किसी भी बैट्समैन के लिए भेद पाना दुष्कर होता था। वे चीते की फुर्ती से गेंद पर झपटते और बल्लेबाजों को  क्रीज के बिल में ही बने रहने को मजबूर कर देते और यदि गलती से गेंद  हवा में जाती तो उसका पनाहगाह सिर्फ उनके हाथ होते। और जब बल्ला उनके हाथों में होता तो बाएं हाथ से बल्लेबाज़ी की सारी एलिगेंस मानो उनके खेल में साकार हो उठती। वे बॉल के जबरदस्त हिटर थे और पावर उनका सबसे बड़ा हथियार। एक ओवर में छह छक्के और 12 गेंदों में फिफ्टी उनके हिस्से में नायाब रिकॉर्ड हैं। लेकिन उनकी पावर हिटिंग  रॉ नही थी।उसमें अद्भुत लालित्य और कलात्मकता होती। वो इस कदर मंजी होती कि देखने वाले को उनके चौके छक्के बहती हवा से सहज लगते।मानो उसमे शक्ति लगाई ही नहीं। उनके कवर में पंच आंखों के लिए ट्रीट होते और और उनके पसंदीदा पुल शॉट नायाब तोहफा। 
          वे जब भी मैदान में होते गतिशील रहते,वे अदम्य उत्साह शक्ति से भरे होते, ऊर्जा उनसे छलक छलक जाती।ये उन जैसे खिलाड़ी का ही माद्दा था जो कैंसर जैसी बीमारी से लड़कर  खेल में शानदार वापसी कर सका। मां बाप के अलगाव की त्रासदी से जूझते हुए वे जिस व्यक्तित्व और और खिलाड़ी के रूप में उभरते हैं और भारतीय क्रिकेट परिदृश्य पर छा जाते हैं वो अपने आप मे बेमिसाल है।
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खेल मैदान से अलविदा भारतीय क्रिकेट के युवराज।बहुत आए और गए पर 'तुमसा नहीं देखा'।

Saturday, 15 June 2019

क्वाही का जादू बनाम चोटों का दंश



लगभग 15 दिन पहले जब एनबीए फाइनल्स गोल्डन स्टेट्स वारियर्स और टोरंटो रप्टर्स के बीच होना तय पाया गया था उस समय बास्केटबॉल के सभी बड़े विशेषज्ञ और जानकार ये अटकललें लगा रहे थे की 'बेस्ट ऑफ सेवन' का फाइनल्स आखिर कितने गेमों में खत्म हो जाएगा।ज़्यादातर विशेषज्ञों का मानना था कि ये फाइनल्स 6 गेमों में समाप्त होगा।और अमेरिका के कैलिफोर्निया के ओरेकल एरीना में बृहस्पतिवार की रात्रि में रप्टर्स टीम वारियर्स को 114 के मुकाबले 110 अंको से हराकर एनबीए 2019 का समापन किया तो विशेषज्ञों के अटकलें सच्चाई में तब्दील हो गईं थीं।बस फ़र्क़ सिर्फ इतना था कि जीतना वारियर्स को था जीत रप्टर्स गई।
दरअसल रप्टर्स लगभग आधी रात को जब 4 के मुकाबले 2 गेमों से वारियर्स को हराकर एनबीए के नए चैंपियन बन रहे थे तो तो वे वहां से हज़ारों मील दूर टोरंटो में खुशियों और उत्साह का सवेरा ला रहे थे। ये पहला अवसर था जब लैरी ओ ब्रायन ट्रॉफी देश से बाहर की यात्रा कर रही है।टोरंटो रप्टर्स एकमात्र विदेशी फ्रेंचाइजी है और इसके 24 साल के इतिहास में पहली बार टीम फाइनल्स में पहुंची और ट्रॉफी अपने नाम की।
12 महीने पहले लियोनार्ड क्वाही के फ्री एजेंट हो जाने के बाद जब रप्टर्स ने सान एंटोनियो स्पर्स से अपने लिए ट्रेड किया तो शायद ही किसी को ये अनुमान हो कि वे एक इतिहास की निर्मिती करने जा रहे हैं। वे उन्हें उनके शानदार खेल के लिए फाइनल्स का एमवीपी (मोस्ट वैलुएबल प्लेयर) घोषित किया गया तो ऐसा करने वाले एनबीए इतिहास के अब्दुल जब्बार क्रीम और लेब्रोन जेम्स के बाद ऐसे तीसरे खिलाड़ी थे जो दो अलग अलग टीमों से फाइनल्स  एमवीपी घोषित किया गया।दरअसल उन्होंने अपने खेल की शानदार कलाओं से वारियर्स के किले थॉम्पसन,डुरंट और स्टीफन करी की कलाओं की चमक को इस कदर फीका कर दिया कि खुद तो पूर्णिमा के चाँद से एनबीए के आसमान में छा गए और बाकी खिलाड़ी दूज और तीज की चंद्र कला भर से रह गए।  इतना ही नहीं जब क्वाही जब रप्टर्स को जॉइन कर रहे थे उन्होंने शहयड ही सोचा होगा कि वे एक इतिहास को दोहराते हुए एक उम्मीदों के  बड़े संहारक के रूप में स्थापित हो जाएंगे। 2012 में वे सान एंटोनियो स्पर्स की और से फाइनल्स मियामी हीट के विरुद्ध खेल रहे थे। मियामी हीट में उस समय लेब्रोन जेम्स और ड्वाने वेड जैसे खिलाड़ी खेल रहे थे। उस समय स्पर्स ने हीट को हराकर लगातार तीसरे साल चैंपियन बनने से रोक दिया था।और आज ठीक उसी तरह का कारनामा दोहरा रहे थे वारियर्स को लगातार तीसरे साल और पिछले पांच ससलों में चौथी बार चैंपियन बनने से रोक दिया।
इसमें कोई शक नही रप्टर्स की ये जीत जितनी क्वाही,सीएकम,लारी और मार्क गसोल के खेल की वजह से है उतनी ही वारियर्स के सबसे उम्दा खिलाड़ी दो बार के एमवीपी केविन डुरंट तथा अन्य खिलाड़ियों की चोट के कारण भी है। पर आदुनिक खेलों में चोट एक अनिवार्य चीज है और जीत तो जीत होती है।एनबीए को एक नया चैंपियन मुबारक।

Monday, 10 June 2019

राफा द गैलक्टिको ऑफ टेनिस




राफा द 'गैलक्टिको' ऑफ टेनिस
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राफेल नडाल के 12 वीं बार 'कूप डी मस्केटीएर' ट्रॉफी जीतने के बाद उनसे हारने वाले युवा थिएम कह रहे थे 'राफा हमारे खेल के लीजेंड हैं और ये (12बार फ्रेंच ओपन जीतना) अवास्तविक(unreal) है , तो राफा को  मस्केटीएर ट्रॉफी प्रदान करने के बाद रॉड लेबर ने ट्वीट किया कि 'ये विश्वास से परे(beyond belief) है।' दरअसल राफा का उस समय वहां होना ही अपने आप मे अविश्वास से परे होना था। वे पीले रंग की टी शर्ट पहने थे। जैसे ही जीते तो पीठ के बल कोर्ट पर लेट गए।और वे जब उठे तो लाल मिट्टी उनकी पीली शर्त पर लिपटी थी। उस समय राफा अस्त होने से ठीक पहले के सूर्य के समान लग रहे थे जिसकी स्वर्णिम आभा दिन भर की ओजपूर्ण परिश्रम के कारण रक्तिम आभा में बदल जाती है। उस रक्तिम आभा वाले सूर्य को उस मैदान में खड़े देखना वास्तव में अविश्वसनीय था जिसके खेल के प्रकाश में टेनिस खेल के आकाश के सारे तारे छुप जाते हैं। बिला शक वे 'किंग ऑफ क्ले' है,मिट्टी की सतह के खेल साम्राज्य के चक्रवर्ती सम्राट जिसकी जीत के अश्वमेध अश्व को पकड़ने की हिम्मत ना तो फेडरर और जोकोविच जैसे पुराने यशश्वी सम्राटों में है और ना थिएम,सितसिपास और ज्वेरेव जैसे युवा राजकुमारों में। ऐसा प्रतीत होता है कि फिलिप कार्टियर मैदान की लाल मिट्टी से उनका इतना  आत्मीय लगाव है की वो भी उनके रक्त की तरह उनमें अतिशय उत्साह की ऑक्सीजन से युक्त कर राफा को अपराजेय बना देती है। भले ही रियल मेड्रिड मेरी सबसे नापसंद टीम रही हो पर उनका एक फ्रेज तो अपने सबसे पसंदीदा खिलाड़ी के लिए उधार लिया ही जा सकता है।दरअसल वे टेनिस के 'गैलेक्टिको' हैं। सबसे अलग। सबसे सुपर।
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राफा को फ्रेंच ओपन की 12वीं और ग्रैंड स्लैम की कुल 18वीं जीत की बहुत मुबारकां।

Sunday, 9 June 2019

ये मृत्यु का महाउत्सव था



ये मृत्यु का महाउत्सव था
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(आज आईएमए द्वारा पासिंग आउट परेड आयोजित की गई जिसका आकाशवाणी देहरादून द्वारा सजीव प्रसारण किया गया। मैं भी आकाशवाणी टीम का सदस्य था और इस महत्वपूर्ण आयोजन को देखने का सुअवसर मिला।इस दौरान कारगिल समेत तमाम युद्धों में वीरगति को प्राप्त होने वाले जवान होंट करते रहे)

किसी भी संस्था के प्रशिक्षुओं का अपनी उपाधि प्राप्त करने या प्रशिक्षण समाप्त करने के बाद खुशी मनाना स्वाभाविक है और उनके नियोक्ताओं द्वारा उन्हें समारोहपूर्वक विदा म भी। सिर्फ इसीलिए नही कि उन्होंने अपना लक्ष्य सफलतापूर्वक पूरा किया है बल्कि इसलिए भी कि वे एक ऐसी दुनिया में प्रवेश जहां उनके सपने साकार रूप होने जा रहे होते हैं। जहां उनके सपनों को पंख लगने जो हैं और उनकी उड़ान के लिए अनंत आकाश है। वे जीवन को भरपूर जीने जा रहे हैं। वो जीवन का उल्लास है। वे जीवन का उत्सव मनाया रहे होते हैं।

पर क्या वास्तव में  जीवन के इस उल्लास का उत्सव आईएमए के ये प्रशिक्षु भी मनाते हैं,वे प्रशिक्षु जो युद्ध के लिए प्रशिक्षित होते हैं,जो युद्ध की रणनीतियों में दक्षता हासिल करते हैं।युद्ध जो विनाश का पर्याय हैं। युद्ध जो मृत्यु का सहोदर है। वे तो नियति से वायदा करते हैं। वायदा किसी भी परिस्थिति में मृत्यु को गले लगाने का। युद्ध को सीखते और उसमें निष्णात होते जाने की प्रक्रिया में वे युद्ध की निस्सारता को समझ रहे होते होंगे और उसी प्रक्रिया में ज़िन्दगी के सबसे बड़े सत्य से भी परिचित हो रहे होते होंगे।वे जान रहे होते होंगे कि जीवन तो मिथ्या है।मृत्यु ही एकमात्र सत्य है। और जब वे प्रशिक्षण के बाद जीवन की कर्मभूमि में उतर रहे जोते हैं तो निश्चित ही जीवन का नही मृत्यु का महा उत्सव मना रहे होते होंगे। बिल्कुल आम भारतीय जैसे।जैसे वो सुख दुख में समदर्शी रहता है। वो दुख में भी सुख की तरह उत्सव मनाता है।वो पूर्णिमा के उजाले की तरह अमावस की स्याह रात का उत्सव भी मनाता हैं। और मृत्यु का मूल राग करुणा का राग है।और जब ये प्रशिक्षु महा उत्सव मना रहे होते हैं तो तमाम उल्लास,हर्ष,उत्साह,खुशियों और मुस्कराहटों के बावजूद एक करुण संगीत नेपथ्य में तैर रहा होता है एक ऐसा करुण संगीत जो हर पल आपको हर जगह मृत्यु की उपस्थिति का एहसास करा रहा होता है। हाँ ये ज़रूर होता है कि आपकी देशप्रेम की अमूर्त भावना वहां उपस्थित स्थूल उपादानों से मिलकर हिलोरें मारने लगती है।
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क्या युद्ध इतने ज़रूरी होते हैं और उनके बिना भी कोई दुनिया संभव है।


Friday, 17 May 2019

ये रंगों का बयान है


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टेस्ट मैच क्रिकेट खेल का मूल प्रारूप है। पांच दिन का ये प्रारूप इस खेल का सबसे शांत,उबाऊ और नफासत से भरा है जिसमें खिलाड़ी सफेद कपड़े पहनते हैं। ये रंग खेल के उस प्रारूप का सबसे प्रतिनिधि रंग है। मैदान में घास को छोड़कर सफेद जूतों व कपड़ों और हल्के क्रीम कलर या ऑफ व्हाइट कलर के बल्लों और विकटों के बीच बस एक ही चटख  लाल रंग होता है गेंद का। इस प्रारूप में सफेद रंग के बीच जिस अनुपात में लाल रंग होता है,मैदान में बस उतना ही रोमांच और उत्साह होता है।

 फिर टेस्ट क्रिकेट की नीरसता को तोड़ने के लिए सीमित ओवरों वाला एकदिवसीय प्रारूप आया। अब क्रिकेट में गज़ब के  रोमांच और उत्साह का समावेश हो गया। नफासत की जगह भदेसपन लेने लगा। भद्रजनों का खेल आमजनों का खेल होने लगा। तो इसी के साथ रंगों का अनुपात भी बदल गया। मैदान में रंग बिखरने लगे। सफेद कपड़े रंगीन कपड़ों में बदल गए और बॉल का रंग लाल से सफेद हो गया। अब रंगीन कपड़ों के बीच जिस अनुपात में बॉल का सफेद रंग होता है मैदान में नीरसता की भी बस उतनी ही गुंजाइश बची रह गई।

लेकिन शायद अभी भी एक कमी बाकी थी। इन रंगों में चमक की कमी थी,रंगों में ग्लेज़ नही था क्योंकि खेल के रोमांच और उत्साह में ग्लैमर की कमी थी। तब फटाफट प्रारूप टी ट्वेंटी आया।इसमें रोमांच,जोश,जुनून और गति का विस्फोट हुआ और ग्लैमर का समावेश हुआ तो कपड़ों के थोड़े फीके और कम चमक वाले रंग चटक होने लगे,रंगों की चमक और ग्लेज़ सहसा ही जोश और जुनून के अनुपात में बढ़ गया।
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क्या ही कमाल है कि रंग क्रिकेट के क्रमिक  बदलाव के सबसे गाढ़े प्रतीक हैं। निसंदेह ये देखना रोचक होगा कि आगे इसके और छोटे होते प्रारूप पर रंग कैसे अपना बयान बदलेंगे।

Monday, 6 May 2019

कि हमने एक मिथक बनते देखा है






कि हमने एक मिथक बनते देखा है
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30 जून 2018 को रूस के कजान स्टेडियम में फुटबॉल विश्व कप के दूसरे दौर में ही फ्रांस ने अर्जेंटीना को हराकर बाहर कर दिया। मैच समाप्त होने के बाद एक खिलाड़ी उदास सा धीमे धीमे कदमों से बाहर जा रहा था। उसने एक बार भी पीछे मुड़कर नहीं देखा। ये लियोनेस मेस्सी थे। दरअसल ये किसी खिलाड़ी का जाना नहीं था बल्कि करोड़ों फुटबॉल प्रेमियों के इष्ट देवता का समय से पूर्व रूठ कर जाने जैसा था। अब आप ही सोचिए अगर कोई गणपत बप्पा को चतुर्थी के दिन अपने घर स्थापित करता है तो फिर अनंत चतुर्दशी के दिन विधि विधान से विसर्जित करता है ना या फिर नवरात्र में दुर्गा की स्थापना करता है तो नवमी की पूजा के बाद ही विसर्जित करते हैं ना। तो फिर मेस्सी 15 जुलाई से पहले बिना जुले रीमे ट्रॉफी के बैगर कैसे जा सकता था। पर ऐसा हुआ। मेस्सी को समय से पहले ही रुखसत होना पड़ा। शायद मेस्सी की अनचाही विदाई के दुख के कारण बहते आंसुओं से ही उस दिन कज़ान के वातावरण में कुछ ज़्यादा नमी रही होगी,कराहों से हवा में सरसराहट कुछ तेज हुई होगी,हार की तिलमिलाहट से सूरज का ताप कुछ अधिक तीखा रहा होगा,दुःख से सूख कर मैदान की घास कुछ ज़्यादा मटमैली हो गयी होगी और कजान एरीना से बाहर काजिंस्का नदी वोल्गा नदी से गले लग कर जार जार रोई होगी।

लेकिन बीते बुधवार को कैम्प नोउ के मैदान में मेस्सी के जादू को देखकर बार्सिलोना में ही नही बल्कि कजान की धूप में भी मुलामियत पसर गई होगी,हवा में मुस्कराहटों का संगीत तैर गया होगा,मैदान की घास फिर से हरी हो गई होगी और हां कजिंस्का नदी फिर वोल्गा के गले लगी होगी और इस बार खुशी के आंसू बहाए होंगे।
दरअसल इस शाम बार्सिलोना एफ सी की टीम अपने मैदान कैम्प नोउ में चैंपियंस लीग के सेमीफाइनल के पहले चरण के मैच में लिवरपूल की टीम को होस्ट कर रही थी। पिछले विश्व कप की असफलता को भुला कर मेस्सी इस सीजन अपने पूरे रंग में आ चुके थे। और अब मैच दर मैच अपना जादू बिखेरा रहे थे। इस मैच से पहले वे इस सीजन 46गोल कर चुके थे। बार्सिलोना को स्पेनिश लीग का खिताब दिला चुके थे। और....और इस मैच में अपने खेल के जादू से पिछले साल की उपविजेता लिवरपूल की टीम को लगभग बाहर ही नहीं कर रहे थे बल्कि दर्शकों को हिप्नोटाइज़ कर रहे थे और अपने खेल कैरियर का एक और लैंडमार्क स्थापित कर रहे थे। जब 75वें मिनट में अपना पहला और टीम का दूसरा गोल कर रहे थे तो ये अपने क्लब के लिए 599वां गोल था। और उसके बाद 83वें मिनट में मेस्सी का ट्रेडमार्क गोल आया। उनका 600वां गोल दरअसल इससे कम शानदार नहीं ही होना चाहिए था। ये एक फ्री किक थी। वे 35 मीटर दूरी से गोल के लगभग बाएं पोल के सामने से किक ले रहे थे। सामने चार विपक्षी खिलाड़ियों की मजबूत दीवार। गोल पर सबसे महंगे और शानदार गोलकीपर एलिसन मुस्तैद। ये एक असंभव कोण था। लेकिन मेस्सी के लिए नहीं। मेस्सी ने किक ली। बॉल एक तीव्र आर्च बनाती हुए सामने खिलाड़ियों की दीवार के सबसे बाएं खिलाड़ी के ऊपर से गोल पोस्ट के पास जब पहुंची तो एक क्षण को लगा कि बॉल गोलपोस्ट से बाहर। पर ये क्या! बॉल तीक्ष्ण कोण से दांई ओर ड्रिफ्ट हुई और गोल के ऊपरी बाएं कोने से होती हुई जाल में जा धंसी। ये गोल नहीं था। एक खूबसूरत कविता थी जिसे केवल मेस्सी के कलम सरीखे पैर फुटबॉल के शब्दों से विपक्षी गोल के श्यामपट पर लिख सकते थे। दरअसल कोई एक चीज कला और विज्ञान दोनों एक साथ कैसे हो सकती है,इसे मेस्सी के फ्री किक गोलों को देखकर समझा जा सकता है। वे विज्ञान की परफेक्ट एक्यूरेसी के साथ अद्भुत कलात्मकता से अपनी पूर्णता को प्राप्त होते हैं। इस गोल के बाद एक खेल पोर्टल जब ये ट्वीट करता है कि "लिटिल जीनियस डिफाइज लॉजिक" तो आप समझ सकते हैं क्या ही खूबसूरत गोल रहा होगा।और 600 गोल के लैंडमार्क को प्राप्त करने के लिए इससे कम खूबसूरत गोल की दरकार हो सकती है भला।
ओह ! लव यू मेस्सी !
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दरअसल जब आप मेस्सी को खेलते देख रहे होते हैं तो एक खिलाड़ी को,एक फुटबॉल जीनियस या लीजेंड भर को नहीं देख रहे होते हैं बल्कि भविष्य के एक मिथक को बनते महसूस कर रहे होते हो। जब इस मैच को देखने के बाद गैरी लिनेकर जैसा फुटबॉलर ये कह सकता है कि 'मैं इतना भाग्यशाली हूँ कि अपने ग्रैंड चिल्ड्रेन्स को बता पाऊंगा मैंने मेस्सी को खेलते देखा है" तो आप भी अपने को सौभाग्यशाली मानिए कि आपने मेस्सी को खेलते देखा है,कि फुटबॉल के मैदान में एक मिथक को बनते देखा है।

Friday, 3 May 2019

भोर

   

ये तो तय है कि दिन के सारे निश्चय जो सांझ की संभावनाओं में डूब रहे हैं,वे अंततः रात्रि की अनिश्चितताओं में घुल जाएंगे।बस देखना ये है कि उम्मीद के जुगनू,तारे और एक चाँद सारे मिल के अनिश्चितताओं का भार भोर के नए स्वप्नों के उगने तक ढो पाते हैं कि नहीं।
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"चल ए नज़ीर इस तरह से कारवाँ के साथ।
जब तू न चल सके तो तेरी दास्ताँ चले।"
                                           नज़ीर
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तो ये भी तय रहा कि सकारात्मक सोच हमें मानुस बनाए रखेगी।





Wednesday, 1 May 2019

साक्षात्कार _1



   
साक्षात्कार_1
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थ्रीश कपूर देश के जाने माने छायाकार हैं। प्रकृति के सबसे कोमल और सुकुमार चितेरे सुमित्रा नंदन पंत की जन्मभूमि कौसानी उनकी जन्म और कर्मस्थली दोनों है। शायद  ये उस धरती का ही कमाल है कि वे भी प्रकृति को अपने कैमरे में उतनी ही खूबसूरती से पकड़ते हैं। वे खुद  हिमालय के प्रेम में दीख पड़ते हैं।
                                       

वे हिमालय में और हिमालय उनमें घुल गया है। उन्होंने हिमालय की और उसके जीवन की अद्भुत छटा को किसी कुशल चित्रकार की तरह अपने कैमरे के माध्यम से उकेरा है। इसके लिए उन्होंने हिमालय की लंबी लंबी यात्राएं की,उसके हर रंग को कैमरे की नज़र से देखा और फिर उसे  संजोया है। उनके चित्र हिमालय के सौंदर्य और उसके जीवन के जीवंत दस्तावेज हैं। उस पर कमाल ये कि वे जितने बड़े कैमरे के उस्ताद  हैं उतने ही सहज और सरल इंसान। उनसे मुलाकात एक उपलब्धि की तरह है।


अभी वे दून में थे। मैंने अपने कार्यक्रम के लिए उनसे एक बातचीत रिकॉर्ड की। उनसे बातचीत की है हमारे साथी अनिल भारती जी ने। इस बातचीत का प्रसारण होगा शनिवार 4 मई को प्रातः साढ़े आठ बजे आकाशवाणी देहरादून एफ एम 100.5 मेगाहर्ट्ज़ पर।


उम्मीद है ये सिलसिला आगे भी जारी रहेगा और अपने दो बहुत ही पंसदीदा छायाकारों से आपकी मुलाकात की कोशिश रहेगी। जिस तरह थ्रीश हिमालय के छायाकार हैं डॉ सुनील उमराव संगम के छायाकार हैं। वे गंगा,और अदृश्य सरस्वती के पवित्र संगम स्थली के तपस्वी हैं। उनमें संगम क्षेत्र के हर क्षण,हर रंग,हर रूप को अपने कैमरे में समा लेने की दीवानगी है तो दूसरी ओर  सर नॉस्टेल्जिया के छायाकार हैं। 'हर बीत रही चीज़' को पहचानने और कैमरे से पकड़ने की उनमें गज़ब की योग्यता और ललक है। निसंदेह उनके फोटो तमाम बीती चीजों के ऐसे प्रामाणिक दस्तावेज होंगे जिनसे इतिहास लिखा जा सकेगा।

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दोनों का भी दून घाटी में इंतज़ार।

Sunday, 21 April 2019

ये महासू की धरती है



ये महासू की धरती है

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देहरादून आए एक माह से ज़्यादा बीत चुका है ।लेकिन एक खास किस्म का खालीपन अभी भी मन में पसरा पड़ा है। जब भी किसी एक जगह से विस्थापित होकर दूसरी जगह स्थापित होते हैं तो आपको अपने लिए जगह बनाने के लिए खासी मशक्कत करनी पड़ती है। आपको अपने लिए एक स्पेस क्रिएट करना होता है। ये स्पेस आपको यूं ही सहजता से नहीं मिल जाता। लोग आपको या तो स्पेस देते नहीं हैं या फिर देते हैं तो इतना कम कि वो खाँचा आपके लिए बहुत छोटा है। उसमें आप फिट नहीं हो पाते। अपनी काबिलियत से,मेहनत से अपने लायक स्पेस बनाना पड़ता हैं ।आपको खुद को साबित करना पड़ता है। तब जाकर आपकी उपस्तिथि दर्ज होती है। इसीलिए किसी भी नई जगह बनाने में एक लंबा अरसा बीत जाता है। आप हमेशा संघर्षरत रहते हैं। समय कब बीत जाता है पता ही नहीं चलता।आप एक भराव में रहते हैं हमेशा।

     पर दून की बात कुछ और है। यहां स्पेस की कोई समस्या ही नहीं है। स्पेस लोगों के दिलों में भी और बाहर भी खूब है। लोग कुछ और जगहों की तरह तंग दिल जो नहीं हैं।
यहां लोग आपको आपकी क़ाबिलियत से ज़्यादा स्पेस देते हैं। खुद उनके दिलों में जो स्पेस है। दरअसल वे प्रकृति पुत्र हैं। उन्होंने देना सीखा है और खूब खूब देना सीखा है।अब ये आपके ऊपर है जो ज़्यादा स्पेस मिला है तो उसको आपको खुद कैसे भरना है। ये शिवालिक पहाड़ियों की तलहटी में बसा शहर है। चारों और पहाड़ियां हैं। वे अक्सर धूसर रंग की दिखाई  देती हैं। ऐसा महसूस होता है मानो इन पहाड़ों पर पड़ने वाली शुभ्र बर्फ पिघलकर यहां के लोगों के मन को साफ कर निष्कलुष कर देती है और बदले में मन की सारी कलुषता सोख कर खुद को धूसर कर लेती है। क्या ही संयोग है कि ये शिवालिक पहाड़ियां महासु (महाशिव) का निवास स्थल है और ये बात शायद उसी परंपरा से आती है। ठीक वैसे ही जैसे शिव दुनिया को बचाने के लिए विष पी लेते हैं और नीलकंठी हो जाते हैं।
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देहरादून प्रवास डायरी_एक






Monday, 25 March 2019

'ये वो कतई नहीं था जो हम चाहते थे'



'ये वो कतई नहीं था जो हम चाहते थे'
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कल रात लॉस एंजिल्स लेकर्स के ब्रुकलिन नेट्स से 111-106 से हारने के बाद लेब्रोन जेम्स कह रहे थे "ये वो नही थP जिसके लिए हमें अनुबंधित किया गया था"और निसंदेह उनके चाहने वाले उनके इन्हीं शब्दों को अपने मन में दोहरा रहे होंगे "हाँ बिल्कुल, ये वो नहीं था जो हम चाहते थे"। क्या कोई भी विश्व कप फुटबॉल फाइनल्स की मेस्सी के बिना कल्पना कर सकता है। क्या किसी क्रिकेट विश्व कप की बिना सचिन के कल्पना की जा सकती थी। बिना राफेल नडाल के फ्रेंच ओपन की कल्पना की जा सकती है क्या। नहीं ना। तो फिर एनबीए पोस्ट सेशन की बिना लेब्रोन के कैसे कल्पना की जा सकती है। लेकिन यथार्थ कल्पना की तरह रंगीन और कोमल नहीं होता। यथार्थ का रंग धूसर और प्रकृति रूक्ष होती है। और यथार्थ यही है कि 2004-5 के बाद फाइनल्स की तो बात ही छोड़िए लेब्रोन जेम्स पोस्ट सेशन में भी नहीं दिखाई देंगे क्योंकि इस हार के बाद लेकर्स टीम की नॉकआउट में पहुंचने की कोई भी संभावना खत्म हो गई है।

दरअसल कुछ खिलाड़ी खेल का पर्याय बन जाते हैं। हॉकी की ध्यानचंद के बिना,क्रिकेट की ब्रैडमैन के बिना,फुटबॉल की पेले और माराडोना के बिना,बैडमिंटन की रूडी हार्तोनो और लिम स्वी किंग के बिना,टेनिस की रॉड लेबर के बिना या बास्केटबॉल की माइकेल जॉर्डन के बिना कल्पना की जा सकती है क्या। हां कालांतर में  खिलाड़ी उन्हें चुनौती देते  हैं और वे उनके समकक्ष आकर खुद भी लीजेंड बन जाते हैं। सचिन या मेस्सी और रोनाल्डो या रोजर फेडरर या लिन डान और ली चोंग वेई  या बोवलेंडर ऐसे ही लीजेंड हैं और ठीक इनकी तरह बास्केटबॉल में लेब्रोन जेम्स भी।
लेब्रोन ने पिछले चार सालों तक अकेले दम पर क्लीवलैंड केवलियर्स को फाइनल्स तक पहुंचाया और एक खिताब दिलाया। इस बार जब उन्होंने लेकर्स को जॉइन किया तो लगा कि लेकर्स के दिन बहुरने वाले हैं और कोबे ब्रायंट व शकील ओ नील वाले दिन लौटने वाले हैं। पर ऐसा हुआ नहीं। दरअसल लेब्रोन के कंधे अब झुकने लगे हैं और सांस उखड़ने।

जो भी हो इन गर्मियों में जब आप स्टीफेन करी,जेम्स हार्डन,केविन डुरंट, अन्थोनी डेविस से लेकर रसेल वेस्टब्रूक,क्वाहि लियोनार्ड और जोएल एम्बिड के खेल से रोमांचित हो रहे होंगे आपके दिल का एक कोना लेब्रोन की अनुपस्थिति के  उदासी भरे अहसास से जार जार हो रहा होगा।

Thursday, 14 March 2019

अलविदा शहरे मोहब्बत।

                      


एक शहर का यादों का समंदर हो जाना
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   13 और 14 मार्च के मध्य की रात्रि है ये। गाड़ी नं. 14163,संगम एक्सप्रेस इलाहाबाद से यात्रियों को मेरठ की ओर लिए जा रही है। रात्रि का एक बजा है। रेलगाड़ी अँधेरे का सीना चीर बढ़ी चली जा रही है। अधिकांश लोग सो रहे हैं। लेकिन एच 1 बोगी की सीट नं 9 पर मैं  केवल और केवल करवटें बदल रहा हूँ। नींद आँखों से कोसों दूर है। नींद शायद इन आँखों को अभी भी वहीं कहीं ढूंढ रही होगी जहाँ बरसों बरस से रहती आई है। उसे शायद ये इल्म ही ना हुआ हो कि जिन आँखों में उसे रैन बसेरा करना है वे अब  कहीं दूर निकल गई हैं। या फिर इल्म हो भी तो तो ये सोच कर वहीं रुक गई हो कि आज की रात वहां उसके लिए कोई जगह ही ना हो क्यूंकि आज की रात तो उनमें पानी को ही जगह जो कम पड़ जानी है। उफ्फ ये कितना पानी साथ चला आया है कि पानी से आँख भर भर जाती हैं। और ट्रेन है कि दौड़ी दौड़ी जाती है। ये रेलगाड़ी आखिर इतनी तेजी से क्यूँ दौड़ी चली जाती है।  क्या इसलिए कि इस बार का जाना वापस आने के लिए नहीं है?
                          तन जितना इस शहर से दूर भागा जा रहा है, मन उतना ही उस शहर की ओर लौट लौट जाता है। उस महबूब शहर की ओर जिसमें ज़िंदगी के सबसे महत्वपूर्ण 35 साल बिताए। वो शहर जिसमें यौवन की दहलीज़ पर आमद हुई। एक ऐसा शहर जिसमें गाँव का अल्हड़पन तो था ही, पर शहर की नफासत भी मिली थी । वो शहर होने भर को शहर था। शांत  ठहरा सा शहर।  बस शहर होने के एहसास भर से संतुष्ट शहर। ऐसा शहर जिसमें आगे बढ़ने की जल्दबाज़ी ना थी। वो शहर जो बहुत बहुत मखमली सा था और कुछ कुछ खुरदुरा सा भी।  वो शहर जो हम में रच बस गया और वो शहर जिसमें हम  रच बस गए। वो शहर जिसकी गली कूँचों में हमारी कितनी ही यादें बिखरी पड़ी हैं और हमारी यादों में उसके  गली कूँचे। वो शहर जिसमें  हम जिए। वो शहर जिसे हमने जिया। वो शहर जिसमें हमने ख्वाबों को देखना सीखा, जिसमें ख्वाब देखे और उन ख्वाबों के लिए कुछ करने गुज़रने की सलाहियत पाई। वो शहर जिसमें क ख ग सीखा पढ़ाई का भी और ज़िन्दगी का भी।
                                रेलगाड़ी दौड़ी चली जा रही है।  खिड़की के शीशे से पर्दा हटा है। बाहर कुछ ख़ास नहीं दिखाई दे रहा है। बस दरख्त साये से पीछे भागे जा रहे हैं। दिमाग में विचार भी उसी तरह भागे जा रहे हैं। यादें अतीत में गहरे और गहरे उतराना चाहती हैं। अब रेलगाड़ी धीमी हो चली है। शायद कोई शहर आने वाला है। पटरी के समानांतर लैंप पोस्ट का सिलसिला शुरू हो गया है। उनसे मंद मंद उदास सा प्रकाश फ़ैल रहा है। लगता है उदासी मन के सूनेपन से सहमकर बाहर आ गयी है और सब जगह व्याप गयी है। मन को थोड़ा सुकून मिलता है। इस उदास रात में कुछ  तो अपना सा है।  जिस तरह से हम किसी शहर के लिए उदास होते हैं तो क्या वे भी किसी के उसे छोड़ देने से मायूस होते होंगे। उसके गली कूंचे भी उदास होते होंगे। उस शहर की वे जगहें विछोह महसूसती होंगी। खालीपन के अहसास से तो ना भर जाती होंगी।
                               रेलगाड़ी ने फिर गति पकड़ ली है। एक और स्टेशन पीछे छूट गया है। दिल की धड़कनें फिर बढ़ने लगती हैं। मन कुछ और बेचैन हो उठता  है। महबूब शहर पीछे और पीछे छूटता जाता है। पर जितना ये शहर छूटता जाता है उससे कहीं ज़्यादा फिर फिर मन में बसता जाता है। दिल में यादों के निशान कुछ और गहरे होते जाते हैं। छूटने और फिर फिर बसने का ये सिलसिला अनवरत चलता जाता है। और इन दो विरुद्धों में सामंजस्य बैठाते हुए नए गंतव्य के लिए मन तैयार हो रहा होता है।  बिलकुल इस महबूब शहर की तरह जिसकी मूल प्रवृति ही विरुद्धों के सामंजस्य की है। जिसका अस्तित्व ही विरोधी भावों के मेलजोल पर टिका है और जो दो विपरीत धाराओं से मिल कर गतिमान होता है। उसका इतिहास और भूगोल बना ही इस सामंजस्य से है।

                                     अब देखिए ना प्रकृति ने उसे कुछ ऐसी ही नेमत से बख़्शा है। ये जगह ही ऐसी है जहां  विपरीत प्रकृति वाली दो  नदियाँ इसकी उत्तरी और दक्षिणी सीमाएं बनाती हैं और फिर मिलकर पूरब में बह निकलती हैं। अथाह जलराशि लिए धीर गंभीर यमुना दक्षिण में बहती है। शायद इसका स्याह रंग उसकी गहराई से ही बनता है और उसकी अथाह जलराशि का प्रतीक भी बनता है। तो उत्तर से होती हुई गंगा आती है। अपेक्षाकृत कम गहराई और कम जलराशि लेकिन विस्तार लिए। इसका विस्तीर्ण बहाव ही इसे शुभ्र रंग प्रदान करता है। विधि ने ही जब इस स्थान के लिए ऐसा विधान रचा तो मानव ही पीछे क्यों रहता। उसने शहर को ही दो भागों में बाँट दिया। सीमा बनी रेल लाइन। इसके दक्षिण का शहर पुराना और उत्तर का नया। दक्षिण वाला हिस्सा यमुना की तरह सघन और अधिक जनसंख्या वाला और उत्तर गंगा की तरह कम जनसंख्या वाला  और विरल बसावट वाला । दक्षिण यहाँ के स्थायी और मूल निवासियों का हिस्सा तो उत्तर आस पास के शहरों से आए आप्रवासियों का हिस्सा। एक स्थानीय विशेषताओं और संस्कृति का वाहक तो दूसरा आयातित विशेषताओं से भरा पूरा। एक पुरातन संस्कृति पर गर्वोन्नत होता हुआ तो एक आधुनिक भावबोध पर इतराता हुआ। एक गली कूंचो में मंथर गति से चलता तो दूसरा चौड़ी सडकों पर दौड़ता। एक पुराने घर चौबारों में बसता तो दूसरा बड़े बड़े बंगलों में रहता। एक ठहरा ठहरा सा तो दूसरा बहता बहता सा। एक मस्त मौला सा तो दूसरा उद्विग्न  अधीर अधीर सा। भूगोल की ये दो चौहद्दी एक इलाहाबाद बनाती हैं।
                                 फिर भूगोल अपना इतिहास भी अपनी तरह ही रचता है। अगर ये वत्स महाजनपद के शासकों की साम्राज्यवादी भौतिक लिप्साओं की स्थली रहा तो बुद्ध और महावीर की तपस्थली और धर्म प्रचार का केंद्र भी रहा। ये जगह अवन्ति और वत्स महाजनपदों के बीच संघर्ष की हुंकार और टंकार के कोलाहल से आक्रान्त हुई तो उदयन और वासवदत्ता के प्रेम संगीत से भीग भीग भी गयी। ऐन उस जगह जहां चक्रवर्ती सम्राट हर्षवर्धन सांसारिक इच्छाओं से विरक्त होकर अपना सर्वस्व दान कर देता था,बादशाह अकबर अपनी साम्राज्यवादी लालसाओं को पूरा करने के लिए क़िले का निर्माण करता है और अपने साम्राज्य की रक्षा के लिए किलेबंदी करता है। जहां अलाउद्दीन खिलज़ी गद्दी के लालच में अपने चाचा की ह्त्या कर धोखे और षड़यंत्र के कारनामे को अंजाम देता है ,शहज़ादा खुसरू  प्रेम की खातिर जान देने का आदर्श स्थापित किया चाहता है। क्या ही कमाल है जिस जगह ब्रिटिश साम्राज्ञी ईस्ट इण्डिया कंपनी से देश का शासन अपने हाथ लेकर अपने साम्राज्यवादी मंसूबों को पूरा करने के लिए इसे राजधानी बनाती है उसी जगह को देश की आज़ादी के लिए क्रांतिकारी देशभक्त अपना केंद्र बनाते हैं। ये ही वो शहर है जहां परिमल संस्था और प्रगतिवादी टकराते और रगड़ खाते श्रेष्ठ हिंदी साहित्य रचते हैं।
                              ये जितना लफ़्फ़ाज़ों,बकैतों,भौकालों का शहर है उतना ही संजीदा लोगों का भी। जितना बमबाज़ों का उतना ही कलमबाज़ों का। ना जाने किस जगह फर्राटे से अंग्रेज़ी बोलती अधुनातन नवयौवना के साथ खांटी भोजपुरी बोलने वाला  युवा डेट करता मिल जाए। ना जाने कब आप चौड़ी चौड़ी साफ सुथरी सड़कों पर से गुजरते हुए पतली गलियों की भूल भुलैया में जा पहुंचे और कब जाने कंधे से कंधे टकराती और दम रोक देने वाली गलियों से निकल कर नीले आसमान के नीचे हरे भरे खुले वातावरण में सांस लेने लगे। कब आपकी आंखों के सामने भैसों के मस्त झूमते काफिले के ठीक पीछे विश्व के बड़े ब्रांडों की मोटर कारों के झुंड द्वारा रास्ता देने की याचना के लिए हॉर्न बजने का दृश्य नमूदार हो जाए। और फिर शहर का पॉश इलाका सिविल लाइंस तो स्वयं ही बड़े बड़े शानदार बंगलों के बीच बीच में सगरपेशा लोगों की झोपडपट्टियों के  साथ विकास की विसंगतियों का सबसे बड़ा विज्ञापन सा प्रस्तुत होता ही है।
                             अगर यहां के मूल वाशिंदे इस शहर की आत्मा हैं तो आसपास के इलाकों से लेकर दूर दराज के इलाकों से आए लोग इस शहर का दिल दिमाग हैं। ये शहर जितना स्थानीय कारोबारी और व्यापारी बनाते हैं उतना ही बाहर से आए सरकारी मुलाज़िम सजाते सवाँरते हैं। ये शहर जितना यहां के माननीय जजों और काले कोट में सजे एडवोकेट्स का है उतना ही बाहर से आए हैरान परेशान मुवक्किलों का भी है। ये शहर जितनी गृहस्थों की कर्म भूमि है उतनी ही बाहर से आए विद्यार्थियों की तपस्थली भी है। जितने लहकट इस शहर की आन है उतने ही मेधावी शहर की शान हैं।सेठ साहूकारों की अट्टालिकाएं शहर को वैभव प्रदान करती हैं तो मध्य प्रदेश,पूर्वी उत्तर प्रदेश और बिहार से आये मज़दूरों की श्रम शक्ति उस वैभव का आधार बनती है। ये इस शहर में ही संभव होता है कि एक कान से आपको वैभव के अट्टहास सुनाई दे और दूसरे कान से मजबूरी की सिसकियां। एक ही साथ आपको सजा संवरा वैभव और शानों शौकत इठलाता इतराता मिलेगा तो पीठ पर नमक के दाग सजाए मानवीय श्रम की गरिमा चहलकदमी करते हुए भी मिलेगी।
                                         दरअसल ये बहुस्तरीय जीवन और संवेदनाओं का शहर है। शहर के जीवन की ये परतें अपने अस्तित्व के लिए अनेक स्तरों पर सहभाग करती हैं, टकराती हैं और आगे बढ़ती हैं। ये परतें एक दूसरे से अलहदा भी होती हैं और एक दूसरे की सीमाओं का अतिक्रमण भी करती हैं। अब यहां के विद्यार्थी जीवन को ही देखिए ना। यहां बड़ी संख्या में बाहर से विद्यार्थी आते हैं और यहां के समाज का अभिन्न अंग बन जाते हैं। पर फांके स्पष्ट दीख पड़ती हैं। एक ओर वे स्थानीय समाज को अर्थवृति के साधन मुहैय्या कराते हैं तो  दूसरी और उनमें अक्सर हितों का टकराव भी होता है। इलाहाबाद के छात्र समुदाय की  अपनी एक अलग पहचान है। वे एक इकाई के रूप में स्पष्टतः अलग दीख पड़ते हैं। लेकिन ये इकाई भी बहुस्तरीय है। उसके अपने खाँचें हैं,परतें हैं,अंतर्विरोध हैं।ये वर्टिकल भी हैं और होरिजेंटल भी। यहां भी ठीक समाज की तरह छात्रों का स्तरीकरण होता है। सबसे बड़ा विभाजन हॉस्टल और डेलीगेसी का।निसंदेह होस्टलर इलीट और डेलीगेसी वाले मास। फिर यूनिवर्सिटी होस्टल वाले ऊपर और ट्रस्ट होस्टल वाले नीचे। लेकिन बात दबंगई की हो तो ट्रस्ट वाले बहुत ऊपर। इसी तरह डेलीगेसी वालों के भी स्तरीकरण के कई खांचे। कुछ विश्वविद्यालय के आस पास रहने वाले ज़्यादा खुशकिस्मत और शहर के बाहरी इलाकों और कछारी मोहल्लों में रहने वाले दोयम दर्जे वाले। खांचे और भी हैं। जातीय चेतना वाले भी,क्षेत्रीय चेतना वाले भी,भाषाई चेतना वाले भी और सबसे ऊपर वर्गीय चेतना वाले तो हैं ही। पर एक बात सबमें कॉमन। कमरे हॉस्टल के हों या डेलीगेसी के ,बड़े बड़े सपने उसके इनमेट की आखों से निकलकर कमरे के कोने कोने में समाए होते हैं और इन सपनों की चमक उनसे निकलकर दूर दराज़ के गांव गिराव में रहने वाले मां बाप,भाई बहनों और कुछ की पत्नियों की आंखों तक पहुंचती है। ये सपने इनमेट के कम और उसके घर परिवार वालों के ज़्यादा करीब होने लगते हैं। गांव और छोटे छोटे कस्बों के खुले वातावरण से आकर दबड़ेनुमा कमरों की कैद में जब उनका दम घुटने लगता है तो शहर के तमाम बाजारों की रौनकें उनकी बदरंग कैद  भरी ज़िन्दगी में कुछ रंग भर देती है तो बहुत से किताबों  की दुनिया के भीतर जाकर उसके असीमित अनोखे संसार में अपने सपनों को उड़ान देने की कोशिश करते। कुछ के सपने पूरे होकर आसमान में सितारे से टंक जाते कुछ के पूरे तो होते हैं पर आधे अधूरे जो सड़क के लैंपपोस्ट,लालटेन या फिर दिए से टिमटिमाते रह जाते। लेकिन ऐसे भी कम लोग नहीं होते जिनके सपनों के चिराग जल ही नहीं पाते और शोक के करुण संगीत में बदल जाते। कुछ तो इससे भी आगे जाकर सल्फास की गोली या चादर के फंदों तक पहुँच जाते और अनंत में विलीन हो जाते।
               दिमाग में शहर की भोगी,जानी, समझी छवियों के असंख्य कोलाज बन मिट रहे हैं। कभी मुस्कान से होंठ फैल जाते हैं तो कभी आंख नम होने लगती हैं। आंखों की इस कोर से उस कोर तक फैले पानी में उन यार दोस्तों के प्रतिबिम्ब तैर रहे हैं जो इन 35 सालों के हासिल है। वे यार दोस्त जिनके होने से ज़िन्दगी है। वे जो अब यार दोस्त ना होकर विस्तारित परिवार का हिस्सा हैं। वे लोग जिन्होंने 35 सालों के रहवास में रंग भरे,खुशियों का सबब बने और मुसीबतों में साथ खड़े रहे। ज़िन्दगी के अद्भुत रंगों वाले इस शहर ने ज़िन्दगी को विविध रंगों से भर भर दिया है।दिल की ज़मीन पर इस शहर की यादों की एक ऐसी अमिट पगडंडी बन गयी है जो समय के किसी भी झंझावात से धुँधला नहीं सकती।
                    अलविदा इलाहाबाद!
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एक शहर को अलविदा कहना ज़िंदगी को अलविदा कहने जैसा क्यूँ है !

Saturday, 23 February 2019


इस बसंत 
तेरी याद
कभी दहकी
कभी बहकी
कभी महकी
और फिर 
रेत में बूंद सी
जीवन में दुख सी
समा गई।

Thursday, 14 February 2019

ये हरे रंग के समुंदर का देस है



ये हरे रंग के समुंदर का देस है 
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लिखे या सुने शब्दों से बनी अवधारणाओं की क्रियात्मक और व्यावहारिक पुष्टि होना आवश्यक है वरना बहुत से भ्रम बने रह सकते हैं।



                अब देखिए ना जो गोवा अब तक केवल खूबसूरत समुद्री किनारों,विदेशी सैलानियों,कसीनो और मादक द्रव्यों की खपत वाला एक ऐसा देस था जो ज़िन्दगी से बेपरवाह लोगों के लिए स्वर्ग है,एक बहुत ही रंगीन देस, उस देस को जब खुद अपनी आंखों से देखा तो पाया कि ये 'रंगीन' नही बल्कि अद्भुत रंगों वाला देस है।मेहनतकश और खुशमिज़ाज लोगों का देस है। रंग यहां की फ़िज़ाओं में बिखरे पड़े हैं। यहां समुंदर का रंग ही हरा नहीं है बल्कि ये पूरी धरती ही हरे रंग का समुंदर लगती है।शायद ये  यहां के घने हरे जंगलों का ही प्रभाव है कि समुंदर ने भी अपना रंग नीले से हरा कर लिया है। यहां ज़मीन में फेरिक ऐलुमिनियम ऑक्साइड है जो ज़मीन का रंग लाल कर देती है। हरे जंगल और लाल ज़मीन एक अद्भुत रंग संयोजन प्रस्तुत करते हैं ।ये दोनों जीवन की प्राथमिक आवश्यकताएं हैं जो समृद्धि का पीला रंग पैदा करते हैं।तभी यहां के सारे भवनों का रंग पीला है।हरे समुंदर व जंगल और लाल ज़मीन के बीच पीले रंग के आशियाने गोवा के जीवन का एक खूबसूरत रूपक बनाते हैं।

        दक्षिण गोवा और पंजिम को जोड़ने वाली सड़क मांडवी नदी के किनारे उसके समानांतर बहती सी लगती है और मुम्बई के मरीन ड्राइव से कहीं खूबसूरत दृश्य बनाती है।मरीन ड्राइव तो अनंत सीमा वाली नीले रंग की एकरसता  पैदा करती है जबकि इस सड़क से मांडवी के चौड़े पाट की अथाह जलराशि,जंगल और अनंत आकाश का अद्भुत सौन्दर्य वाला फ्रेम बनता है।यहां की उतार चढ़ाव और शार्प कर्व वाली खूबसूरत सड़कें ये बयान देती हैं कि ज़िन्दगी के उतार चढ़ाव और अनिश्चित मोड़ ही उसे खूबसूरत बनाते हैं।समुद्र,संगीत और हां फुटबॉल यहां के लोगों के पैशन हैं।समुद्र किनारे बच्चों से लेकर हर उम्र के लोगों को फुटबॉल खेलते देखकर लगता है शायद ये उनके खून में है।आखिर ब्रह्मानंद,ब्रूनो कुटिन्हों,लॉरेंस गोम्ज,रोबेर्टो फर्नान्डीज और मोरेसियो अल्फांसो जैसे खिलाड़ी यूं पैदा नही होते।यहां की अपनी भवन निर्माण शैली है।पूरे पंजिम में इस शैली के भवन दिखाई देते हैं।ये इस देस को एक विशिष्ट चरित्र प्रदान करते हैं। दरअसल प्राचीन परंपराओं और जीवन शैली का निर्वाह करते हुए आधुनिक सोच और दिल दिमाग वाले लोगों का देश है गोवा। जीवंत लोगों का देस है गोवा। खूबसूरत और बेहद दिलकश देस है गोवा। 

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लव यू गोवा।

Wednesday, 6 February 2019

ये अमावस्या की स्याह रात का महा उत्सव है

ये अमावस्या की स्याह रात का महा उत्सव है
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जीवन के प्रति अपने नज़रिए,रीति रिवाज़ों,परम्पराओं और मान्यताओं के कारण हम भारतीय पूरे संसार में यूं ही नहीं अनोखे समझे जाते हैं,अद्भुत समझे जाते हैं। गज़ब का जीवट और धैर्य होता है हम में। हम कई बार अतिवाद के ऊपरी छोर पर पहुँच कर पागलपन की चौहद्दी लांघते से लगते हैं। जीवन के सुख दुःख को इतनी समदृष्टि से देखते हैं कि दुखों का भी खुशियों की तरह उत्सव मनाते हैं। पूर्णिमा की उजली रात की तरह अमावस्या की स्याह रात का भी महा उत्सव रचते हैं।
        इन दिनों प्रयाग में कुम्भ चल रहा है और 4 फरवरी को मौनी अमावस्या थी। इस बार ये सोमवार को थी यानी सोमवती अमावस्या। ये संयोग काफी दिनों में पड़ता है और सरकार,मीडिया और निसंदेह आम जनता भी इसे महा उत्सव की तरह मनाने को आतुर थी और मनाया भी।लेकिन किस तरह !


03 फरवरी 02 बजे 

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आकाशवाणी को मकर संक्रांति के बाद मौनी अमावस्या स्नान पर्व और शाही स्नान का सजीव आँखों देखा हाल प्रसारित करना था। कमेंट्री से जुड़े लोग पहले ही कुंभ क्षेत्र पहुंच चुके हैं। लगभग डेढ़ बजे हम नौ लोग जिसमें कमेंटेटर और साथी अधिकारी लोग थे,तीन गाड़ियों से मेला क्षेत्र के लिए रवाना होते हैं।दो गाड़ियों पर पास है,एक पर नहीं। हम लोग आशंकित हैं पता नही गाड़ी कहां रोक दी जाय और फिर अपने मेला क्षेत्र स्थित कैम्प तक पहुंचने के लिए कितना पैदल चलना पड़े। आशंका थोड़ी दूर चलते ही सच साबित होती है। हिन्दू होस्टल चौराहे पर बैरिकेड लगे हैं। गाड़ियों को यहां रोका जा रहा है। संगम की यहां से दूरी 6 किलोमीटर से भी ज़्यादा है।यहां से लोगों की पैदल यात्रा शुरू होती है। अब बड़ी संख्या में लोग पैदल जाते दिखाई दिखाई देने लगे हैं। लोग पहले कोशिश करते हैं कि गाड़ियां आगे जा सकें लेकिन असफल होने पर उतर कर पैदल चल पड़ते हैं। एक हल्की सी निराशा की लकीरें उनके चेहरों पर उभरती हैं,पर गंगा दर्शन और उसमें डुबकी लगाने के उत्साह में वे कहीं छिप सी जाती हैं। हमें मीडिया पासधारी होने का लाभ मिलता है। हमारी गाड़ियाँ आगे बढ़ती हैं। जैसे जैसे हम आगे बढ़ते जाते हैं, पैदल स्नानार्थियों की संख्या भी बढ़ती जाती है। सबमें बस एक ही आतुरता परिलक्षित होती है संगम पहुंचने की। बालसन चौराहे पर फिर बेरिकेडिंग है। हम पुलिस से बहस करने से बचने के लिए अल्लापुर का रास्ता पकड़ लेते हैं और बाघम्बरी गद्दी होते हुए दारागंज जाने वाली सड़क पर परेड ग्राउंड प्रवेशद्वार पर पहुंचते हैं। आश्चर्यजनक रूप से यहां पर तैनात पुलिसकर्मी मीडिया पास दिखाने पर सहजता से जाने देते हैं और हम लोग काली सड़क क्रॉसिंग पहुंचते हैं। काली सड़क पूरी तरह से संगम जाने वाले स्नानर्थियों से भरी चल रही है। सड़क पर तिल रखने की जगह नहीं है। हमें इन्हें चीर कर आगे बढ़ना है,लेकिन ये संभव नहीं हो पा रहा है। लोगों का अनवरत  प्रवाह है। उस प्रवाह में एक लय है। सब एक गति से आगे बढ़ रहे हैं। ऐसा लगता है मानो कोई नदी बह रही हो  जिसमें पानी की जगह मानव प्रवाहित हो रहे हैं। उस प्रवाह का गंतव्य संगम स्थल की है जिसमें वे खुद को विलीन कर देना चाहते हैं। हम गाड़ी से उतर कर उस पार खड़े सिपाहियों के पास जाते हैं। उनसे उस पार लगी बेरिकेडिंग हटा कर जाने देने का आग्रह करते हैं। वे सहजता से मान जाते हैं और बड़ी मशक्कत के बाद उस मानव प्रवाह को रोकते हैं और हम आगे बढ़ते हैं। इसके बाद दो और जगह बेरिकेडिंग हैं,किसी तरह हम उन्हें पार करते हैं। अंततः  बांध के नीचे त्रिवेणी सड़क वाली टी पर पहुंचते हैं जहां रास्ता पूरी तरह बंद है। हम लोग गाड़ियां वापस भेज देते हैं। यहां से कैम्प पास ही है।

03 फरवरी रात्रि 08 बजे
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रात्रि के आठ बजे हैं। हम 5 साथी अक्षयवट मार्ग स्थित अपने टावर को देखने के बहाने संगम तक घूमने निकलते हैं। ये यमुना का उत्तरी किनारा है। किले से लेकर संगम तक यमुना के उत्तरी किनारे पर लगभग 50 मीटर चौड़ाई में पुआल बिछी है।उस पर कहीं भी तिल रखने की जगह नहीं हैं।गाम गिराम के लोग समूहों में यहां उपस्थित हैं। अधिसंख्य क्या लगभग सभी समाजार्थिक दृष्टि से निम्न निम्न मध्यम वर्ग से हैं। तमाम बैठे बतिया रहे हैं ,बहुत से कंबल रजाई ताने सो रहे हैं।जगह जगह चूल्हे सुलगे हैं। खाना बनाने का उपक्रम हो रहा है। लिट्टी चोखा,दाल भात,खिचड़ी,चूड़ा,कुछ जगह रोटियां भी। जिनके पास बनाने का जुगाड़ नही है वे चना चबैना से काम चला रहे हैं। तो बहुत से लोग घर से ही बनवाकर लाये हैं। ये हाल सिर्फ यमुना किनारे का ही नही है बल्कि सेक्टर 3 और  4 में हर उस जगह का है जहां हुक्मरानों के कारिंदों ने लोगों को ऐसा करने की अनुमति दी है बल्कि यूं कहें कि ऐसा करने से रोका नहीं है।ठंड अपने शबाब पर है। गहराती जाती अमावस की रात में हल्की हल्की सी हवा बहने लगी है जो ठंड से लिपट कर उसकी उपस्थिति के अहसास को तीव्र से तीव्रतर कर रही है। सर के ऊपर केवल आसमान का छावा है और नीचे एक पतली पॉलीथिन का बिछौना या चादर और पुआल मिलकर लोगों को धरती से विलगाने की असफल कोशिश कर रहे हैं। रेत साज़िशन पाला बदल कर ठंड के साथ हो लिया है और ठंड की मारक क्षमता को चाकू की धार की माफिक पैना कर  रहा है,और  तीक्ष्ण बना रहा है। पर क्या ही कमाल है जो उन श्रद्दालुओं पर इस बरसती ठंड और सुविधाओं की शून्य उपस्थिति का जरा भी असर हो रहा हो। वे असीम धैर्य के साथ उस दीर्घ प्रतीक्षित शुभ मुहूर्त का इंतज़ार कर रहे हैं जब वे संगम के पवित्र जल में डुबकी लगाकर अपने जन्म जन्मांतरों के पाप काट देंगे और अपने इहलोक के साथ परलोक को भी साध लेंगे। इस कड़कड़ाती ठंड और विपरीत परिस्थितियों  के बावजूद लोगों के चेहरों पर असंतोष या रोष के भाव की उपस्थिति शून्य है। अगर कुछ है तो उनके चेहरों पर आतुरता है और संतोष का भाव तो छलक छलक जा रहा है। सब खुश हैं। उस कड़ाके की ठंडी रात की कठिनतम परिस्थितियां भी अपने तमाम प्रयासों के बावजूद उनकी संतुष्टि के स्थायी भाव को विचलित नही कर पा रही हैं । ठीक उनके अपने जीवन की तरह। वे लगातार अभावों,कष्टों के बावजूद बेहतर दिनों की आस नही छोड़ते। अनवरत कर्म में लीन रहते हैं। इस आस में कि बस सुख उनके जीवन में आने वाला है। सुख उनके जीवन से अनुपस्थित हैं तो क्या हुआ, वे साल दर साल दुखों का ही उत्सव मना लेते हैं। आज भी ठीक वैसे ही कठिनतम परिस्थितयों के बीच अमावस की स्याह रात का भी पूर्णिमा की उजली रात की तरह उत्सव मनाने की अदमनीय इच्छा के वशीभूत हैं।
           
 हम लोग वापस कैम्प लौट आये हैं।
  
 3 फरवरी रात्रि 11बजकर 19 मिनट से अमावस शुरू हो गई है। ऐसी उद्घोषणाएं ध्वनि विस्तारक यंत्रो के माध्यम से लगातार प्रसारित की जा रही हैं। हम कैम्प में लेटे इनको सुन रहे हैं। नींद विचारों की भीड़ में गुम हो गई है। अर्धरात्रि के बाद भीड़ का दबाव शायद बढ़ गया है। ऐसा अनुमान हम लोग लेटे लेटे लगा रहे हैं। क्योंकि अब लोगों से अपील की जा रही है कि वे स्नान करके अपने गंतव्यों की और प्रस्थान करें। ये अपील स्वयं डीआईजी और मेलाधिकारी कर रहे हैं। उनके स्वर में व्यग्रता की उपस्थिति महसूस होती है।

04 फरवरी प्रातः 04 बजे
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प्रातः चार बजे यमुना पट्टी सड़क पर स्थित हम अपने कैम्प के गेट पर खड़े हैं। ये संगम वापसी मार्ग है।स्नानार्थियों का दबाव बढ़ रहा है। काली मार्ग और यमुना पट्टी क्रॉसिंग पर आने वाले स्नानार्थियों को रोकने के लिए लगे बैरिकेड हटा दिए गए हैं। बहुत से लोगों को जो संगम क्षेत्र में प्रवेश कर गए हैं उन्हें अलग अलग स्थानों पर डाइवर्ट किया जा रहा है।जमुना पट्टी सीधे किला घाट और यमुना किनारे जाती है। लोग वहीं नहाते हैं। संगम पर थोड़ा दबाव काम हो जाता है। मुख्य संगम स्थल वैसे भी कहाँ आम आदमियों के लिए उपलब्ध है। वो अखाड़ों के शाही स्नान के लिए आरक्षित है। इस समय तक यमुना पट्टी पर भी पाँव रखने की जगह नहीं बची है। एक तरफ से लोग संगम जा रहे हैं दूसरी और से वापस जा रहे हैं। ऐसा प्रतीत हो रहा है दो रेलगाड़ियां समानांतर पटरियों पर विपरीत दिशा में जा रही हों। उफ्फ ये क्या !एक अधेड़ दम्पत्ति भीगे कपड़ों में चले आ रहे हैं। वे नहाकर बाहर आए तो उनके वस्त्र गायब थे। प्रातः चार बजे 4 /5 डिग्री तापमान में गीले अधो वस्त्र और धोती ब्लाउज में वे काँप रहे हैं। पर क्या ही कमाल है उनके चहरे पर अफसोस की शिकन नहीं है। वे दयनीय नहीं लग रहे हैं। संगम में स्नान करने से आत्मा की संतृप्ति के भाव उनके चहरे पर इसने प्रबल हैं कि उनके शारीरिक कष्ट का आभास नहीं होता है। वे एसएसपी ऑफिस का पता पूछते हैं और पता पाकर तेज कदमों से आगे बढ़ जाते हैं। पर हमारी देह काँप उठती है।

04 फरवरी प्रातः 05. 30 बजे
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सजीव कमेंटरी के चार स्थलों में से एक काली मार्ग बाँध स्थित संकट मोचन हनुमान मंदिर है। ये कैम्प के सबसे निकट है। यहां पहुँचना सबसे आसान है। इसीलिए हम थोड़ी देर से लगभग साढ़े पांच बजे वहां के लिए निकलते हैं। पांच मिनट बाद हम काली सड़क और जमुना पट्टी के क्रासिंग पर खड़े हैं। भीड़ को वहां रोक दिया है। शायद संगम पर अधिक भीड़ हो गयी है। सामने हमारा गंतव्य दिखाई दे रहा है। लेकिन हमें जाने नहीं दिया जा रहा है। हम चिंतित होते हैं। किसी तरह से सुरक्षा कर्मियों को कन्विंस करते हैं। हमें किनारे से लगे बेरिकेडिंग को लांघ कर जाने को कहा जाता है। किसी तरह से हम उसे पारकर अपने गंतव्य पर पहुंचते हैं। लेकिन इस बीच भीड़ इतनी अधिक हो चुकी है कि उसको संभाल पाना असंभव होता जा रहा है। पीछे से लगातार लोग आ रहे हैं और वहां पर रोक दिया गया है। अब धक्का मुक्की  के हालात हो गए हैं। जैसे पानी को रोकना असंभव होता है। वो अपना रास्ता ढूंढ ही लेता है। ठीक वैसे ही भीड़ को रोकना मुश्किल है। भीड़ ने अब अपना रास्ता ढूंढ लिया है। 
उसने साइड में लगी बेरिकेडिंग तोड़ दी है। लोग उससे हा हा कार करते हुए इस तरह से जा रहे हैं जैसे पानी कोई बांध तोड़ कर हरहराकर बह निकलता है। सुरक्षाकर्मी अपने स्थान पर खड़े असहाय से देख रहे हैं और हम मंदिर की छत से। हम सिहर उठते हैं। पर भीड़ के हिस्सा बने बच्चों,युवाओं,महिलाओं,वृद्धों किसी के भी चहरे पर 'यहां आना गलत हुआ' जैसा कोई भाव नहीं है,कोई शिकन उनके माथे पर नहीं है। अजीब सा पागलपन उनके सिर पर सवार है,एक आतुरता चहरे पर पसरी है। 

04 फरवरी प्रातः 10 बजे
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प्रातः साढ़े पांच बजे से दस बजे तक मंदिर की छत से,जहां से हम सजीव आँखों देखा हाल प्रसारित कर रहे थे,संगम की ओर उमड़ते जन सैलाब को देख रहे थे। शहर में दक्षिण और पच्छिम  दिशाओं से आने वाले यात्रियों के लिए परेड क्षेत्र से होकर आने वाला काली मार्ग संगम क्षेत्र में प्रवेश का मुख्य मार्ग है तो दूसरी और उत्तर से शहर में प्रवेश करने वाले यात्रियों के लिए दारागंज से होकर बाँध के नीचे वाला समानांतर मार्ग है जो बाँध के ठीक नीचे काली सड़क से मिलता है। हम इसे मंदिर से साफ़ साफ़ देख पा रहे हैं। दोनों तरफ से अनवरत जन प्रवाह आ रहा है। जो हमारे सामने मिलकर जनसैलाब का रूप धारण कर रहा है। चारों तरफ नरमुंड ही नरमुंड चमक रहे हैं। ये बिलकुल गंगा यमुना के संगम सा दृश्य प्रस्तुत करता सा प्रतीत होता है। उत्तर दिशा से दारागंज से आता जनप्रवाह मानो गंगा हो जिसमें  दक्षिण दिशा से परेड होकर काली मार्ग से आता यमुना जैसा अपेक्षाकृत बड़ा जनप्रवाह बाँध के नीचे दारागंज से आने वाले जनप्रवाह में मिलकर एक विशाल जनप्रवाह का निर्माण करता है। दस बजे हमारी कमेंट्री ख़त्म होती है। अपना सामान समेट कर हम भी उस जन प्रवाह का हिस्सा बन जाते हैं। 
 यूँ तो काली मार्ग मुख्यतः संगम जाने का मार्ग है लेकिन हम सुबह से ही देख रहे थे कि इसी से बहुत से वापस भी जा रहे हैं। आने जाने वालों ने बड़ी ही ईमानदारी से आधा आधा मार्ग बाँट लिया है। हम संगम से आने वाले जनप्रवाह की विपरीत दिशा से जाने का प्रयास करते हैं क्यूँकि हमारा कैम्प मंदिर से संगम की और पड़ता है। बहाव के विरुद्ध तैरना हमेशा कठिन और कष्टप्रद होता है। यहां इसे हमने यथार्थ में घटित होते महसूसा। हम दो लोग भीड़ द्वारा संगम जाने वाले जनप्रवाह में धकिया दिए गए जबकि हमारे पांच साथी साइड के बेरिकेड को पार करने की फिराक में हैं। इस प्रयास में हमारे वरिष्ठ कमेंटेटर काशी विद्यापीठ के पत्रकारिता विभाग के पूर्व विभागाध्यक्ष प्रो राम मोहन पाठक बेहोश होते होते बचे। उनकी खराब होती हालत देखकर सुरक्षाकर्मियों ने आनन फानन में उन्हें साइड बेरिकेडिंग से उस तरफ कर दिया। उसी के साथ बाकी चार लोग भी उस तरफ कूद गए और अपनी जान बचाई। उधर हम दो लोग भीड़ में बिना किसीअपनी ऊर्जा खर्च किये आगे की और धकेले जा रहे हैं। बार बार भगदड़ के आसार बन रहे हैं। उस धक्का मुक्की में छूटे जूते चप्पल उस भयावहता के सबसे मुखर बयान लग रहे हैं। हमारे मुख भय से पीले हो गए हैं पर लोग हैं कि इस भयावह स्थिति में संगम में डुबकी लगाने की आतुरता से गीले हो रहे हैं। एक अजीबअधीरता से सबके चेहरे लाल  हैं। 
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मुझे सिर्फ एक ही अहसास होता है कि कुम्भ मेला भारतीयों की धार्मिक आस्था और विश्वास  का,उनके हर्ष, उल्लास,उनकी सामूहिकता,विश्व बंधुत्व की भावना का शाहाकार ही नहीं है बल्कि उनकी अतिवादिता का,जो पागलपन की सीमा को छू छू जाती है का भी उदाहरण है। ये एक ऐसा बयान है जो उस भारतीय मानसिकता को निदर्शित करता है जिसमें वे दुःख और अभावों के इस कदर आदी हो जाते हैं कि सुख के अभाव में दुखों का भी उत्सव गान करते हैं और  पूर्णिमा की उजली रात की तरह अमावस की स्याह रात का भी उत्सव राग बुनते हैं। 




Sunday, 6 January 2019

खेल बनाम खेल




खेल बनाम खेल
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यूँ तो समय के पंख होते हैं। पल गुज़रा नहीं कि इतिहास बन गया। तो साल 2018 को गुज़रे 6 दिन होने को आए हैं और अब वो भी बीती बात लगता है। पर अभी इतना भी नहीं बीता कि उसकी बात ही ना हो या वो याद ही ना आए। दरअसल स्मृतियों के रेत में समय के कुछ पग इतने गहरे धंसे होते हैं कि उनके चिह्न मिटाए नहीं मिटते और उन पदचापों की अनुगूँज बहुत लम्बे समय तक स्मृतियों में गूंजती रहती हैं। इस बीते साल हमारे खिलाड़ियों ने भी मैदान के भीतर और बाहर भी बहुत कुछ ऐसा किया जिनकी अनुगूंजें स्मृतियों पर लम्बे समय तक दस्तक देती रहेंगी। फिर वो मैरी कॉम द्वारा 6 विश्व खिताब जीतना हो,पंकज आडवाणी का 21 विश्व खिताब जीतना हो,सिंधु का डब्ल्यूटीए प्रतियोगिता जीतना हो,हिमा दास का जूनियर विश्व एथेलेटिक्स में स्वर्ण पदक जीतना हो,स्वप्ना का एशियाड में हेप्टाथलन में जीत हो,युवा क्रिकेटरों द्वारा चौथी बार जूनियर विश्व कप जीतना हो या युवा पृथ्वी शॉ का शानदार प्रदर्शन हो, ये सब 2018 के खेल पृष्ठ की ऐसी इबारतें हैं जो आसानी से नहीं मिट पाएंगी। लेकिन मेरे तईं खेल के मैदान से सबसे महत्वपूर्ण घटना 'मिताली-पोवार विवाद' है।
          दरअसल भारत में  खिलाड़ियों के साथ पक्षपात,भेदभाव और अन्याय कोई नयी या अजूबी चीज नहीं है। इस तरह की खबरें आम हैं। और ये स्थानीय स्तर से लेकर राष्ट्रीय स्तर तक एक सी है। महिला खिलाड़ियों के साथ सेक्सुअल उत्पीड़न की खबरें भी इसमें शामिल हैं। लेकिन दुःख की बात ये है कि अन्याय और भेदभाव की खबरें जितनी आम हैं,उनके प्रतिकार की खबरें उतनी ही कम। इस तरह के भेदभाव या अन्याय के खिलाफ आवाज़ यदा कदा ही सुनाई देती हैं। अगर कोई आवाज़ उठी भी तो वो अंज़ाम तक पहुंची हो ऐसा उदाहरण बिरला ही होगा। और ये विवाद एक ऐसा ही बिरला उदहारण है।

           वेस्टइंडीज में नवम्बर में खेले गए आई सी सी टी20 विश्व कप में मिताली भारतीय टीम की एक महत्वपूर्ण सदस्य थीं। वे पहले तीन मैचों में प्लेइंग इलेवन में थीं। न्यूज़ीलैंड के खिलाफ पहले मैच में बल्लेबाज़ी का उनका नम्बर नहीं आया। उसके बाद पकिस्तान और आयरलैंड के खिलाफ दोनों मैचों में अर्ध शतक लगाए। तीन मैच जीतकर भारत का सेमीफाइनल में स्थान पक्का हो गया था। इसलिए ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ अंतिम लीग मैच में उनको ड्राप कर दिया गया। यहां तक तो ठीक था,पर अगला मैच इंग्लैंड के खिलाफ सेमीफाइनल मैच में भी उनको नही खिलाया गया। संयोग से ये मैच भारत हार गया। इसके तुरंत बाद सोशल मीडिया में उनकी मैनेजर  की तरफ से उनके साथ  भेदभाव के आरोप लगाए गए और इस तरह से मामले ने तूल पकड़ा। अंततः बीसीसीआई ने मामले का संज्ञान लिया। मिताली ने अपने खिलाफ लगातार उपेक्षा और भेदभाव किए जाने को तर्कपूर्ण ढंग से पेश किया। पोवार का कोच के रूप में कॉन्ट्रैक्ट आगे ना बढ़ाने का निर्णय लिया गया और डब्ल्यू वी रमन को नया कोच नियुक्त कर दिया। मिताली को एकदिवसीय टीम का और हरमनप्रीत को टी20 टीम का कप्तान बनाए रखा गया।एक प्रतिकार अपने अंजाम तक पहुंचा।  
                  दरअसल इस विवाद के कई कोण हैं एक कोण डायना एडुल्जी का है। एक दूसरा कोण हरमनप्रीत कौर का है। यही वो कोण है जिसकी वजह से ये विवाद इतना महत्वपूर्ण समझ में आता है। ये विवाद हरमनप्रीत और मिताली के बीच मनमुटाव का भी था जिसमें कोच पोवार और एडुल्जी ने हरमनकौर का साथ दिया। हरमन कौर और मिताली समकालीन भारतीय महिला क्रिकेट टीम की सबसे चमकती स्टार हैं। दोनों का भारतीय क्रिकेट को महत्वपूर्ण योगदान है। दोनों दो टीमों की कप्तान हैं। अतः ये दो बड़े व्यक्तित्वों की टकराहट है। दो बड़े खिलाड़ियों के अहम की टकराहट है। दो विपरीत मिज़ाजों के खिलाड़ियों की टकराहट है। मिताली अपेक्षाकृत बड़े फॉरमेट वाले क्रिकेट की सम्पूर्ण खिलाड़ी हैं।वे बहुत ही एलिगेंट बैट्समैन हैं। वे क्रिकेट की शास्त्रीय और इलीट परम्परा की सबसे बड़ी खिलाड़ी हैं।वे अपनी बैकग्राउंड से,अपने पहनावे,आचरण,हाव भाव,चहरे मोहरे और खेल सभी से इलीट क्लास की प्रतिनिधि खिलाड़ी हैं। जबकि हरमनप्रीत कौर अपेक्षाकृत छोटे फॉरमेट की सबसे बड़ी खिलाड़ी हैं। दरअसल वे अपने सम्पूर्ण व्यक्तित्व  और खेल से क्रिकेट के जनसाधारण स्वरुप की सबसे प्रतिनिधि खिलाड़ी हैं। वे दोनों महिला क्रिकेट की सुनील गावस्कर और कपिल देव हैं। हरमनप्रीत कौर और मिताली के बीच टकराव  80 के दशक में गावस्कर और कपिल देव के बीच की टकराहट की याद दिलाती है। जिस तरह से क्रिकेट के जन साधारण स्वरुप ने अभिजात्य स्वरुप को रिप्लेस कर दिया और गावस्कर और कपिल देव इस प्रक्रिया के एक रूपक की तरह हैं जहां अंततः कपिल ने गावस्कर से बागडोर कपिल देव के हाथ में आई।ठीक वैसे ही  जल्द ही हरमनप्रीत कौर मिताली को रिप्लेस  देंगी। गावस्कर और कपिल देव की तरह ही मिताली और हरमनप्रीत कौर महिला क्रिकेट की दो सबसे महत्वपूर्ण बिंदु हैं। कपिल देव ने ठीक वहां से शुरू किया था जहाँ गावस्कर ने छोड़ा था। इसी तरह हरमनप्रीत कौर ठीक वहीं से शुरू कर रही हैं जहां मिताली अपनी पारी ख़त्म कर रही हैं। दो समकालीन व्यक्तित्वों में टकराहट नई नहीं है। हम गावस्कर-कपिल देव के बीच द्वन्द को जानते ही हैं। अभी हाल ही में बैडमिंटन में साइना-सिंधु के बीच टकराव को भी जानते हैं। लेकिन ये टकराव कहीं भी खेल के विकास में बाधक नहीं बनता बल्कि दोनों के द्वन्द से खेल आगे बढ़ता है। साइना भारतीय महिला बैडमिंटन को एक ऊंचाई प्रदान करती हैं और सिंधु उसे शिखर पर पहुंचा देती हैं।  दरअसल ये नए और पुराने का द्वन्द है। ये एक ही खेल के दो अलग अलग स्वरूपों के माहिरों का द्वन्द है जिससे खेल नए आयाम ग्रहण करता है और नयी भूमि भी। हमें उम्मीद रखनी चाहिए मिताली और हरमनप्रीत कौर के बीच ये द्वन्द भी भारतीय महिला क्रिकेट को नए आयाम प्रदान करेगा। अस्तु !  


















Thursday, 3 January 2019

अलविदा पितामह !


अलविदा पितामह !
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भारतीय क्रिकेट के पितामह रमाकांत आचरेकर  का अंतिम प्रयाण निसंदेह भारतीय क्रिकेट जगत के लिए एक बड़े दुःख की घड़ी है। लेकिन क्या ही संयोग है कि इस दुःख की बेला में ही भारतीय गुरु शिष्य परम्परा के खूबसूरत और मार्मिक दृश्य संभव हो पाते हैं। दरअसल ईश्वर मानव की अपनी कृति है जिसे वो अपनी कल्पना में इस मंशा से रचता है कि इहलौकिक जीवन से आगे पारलौकिक जीवन को सुखी और निरापद बना सके। लेकिन आचरेकर ने एक कदम और आगे जाकर एक वास्तविक ईश्वर को गढ़ा। शायद इस उम्मीद के साथ कि जब वो इस दुनिया से प्रयाण करेंगे तो वो ईश्वर उनके  पार्थिव शरीर को कंधा देकर जीवन  की अनंत यात्रा को सहज,सरल और निरापद बनाएगा। और जब उस ईश्वर ने अपने रचनाकार के पार्थिव शरीर का बोझ अपने काँधे धरा होगा तो उस अप्रतिम रचनाकार की आत्मा की आँखों से नेह की अमृत बूँदें बरस रही होंगी और वो अपार संतोष की अनुभूति से बादलों की तरह हलका महसूसते हुए अनंत में विलीन हो गयी होगी।
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अलविदा पितामह रमाकांत आचरेकर !