Wednesday, 4 December 2019

मेस्सी के प्यार में पड़कर



साल के सर्वश्रेष्ठ फुटबॉल खिलाड़ी के खिताब 'बैलन डी ओर' की घोषणा किए जाने से एक दिन पहले रविवार को लियोनेल मेस्सी एटलेटिको मेड्रिड के विरुद्ध मैच खेल रहे थे। मैच खत्म होने में केवल पांच मिनट शेष रहते दोनों टीमें बिना गोल किए बराबरी पर थी कि मेस्सी ने सुआरेज के साथ मिलकर एक शानदार मूव बनाया। मेस्सी लगभग मध्य रेखा से बॉल ड्रिबल करते हुए  पेनाल्टी बॉक्स तक आए, बॉक्स  के बाहर सुआरेज को पास देकर अपने लिए जगह बनाई, सुआरेज ने पास वापस  मेस्सी को दिया और मेस्सी ने बाएं पैर से गेंद जाल में टांग दी। ये दरअसल ना केवल उनकी टीम बार्सिलोना के लिए विजयी गोल था बल्कि अपनी टीम के लिए उनका 614 वां गोल था। इस  मैच के तुरंत बाद रियल मेड्रिड के महान गोलकीपर और क्रिस्टियानो रोनाल्डो के साथी खिलाड़ी रहे इकेर कैसिलास ट्वीट कर मेस्सी को सर्वकालीन सर्वश्रेष्ठ खिलाड़ी बता रहे थे। प्रकारान्तर से वे शायद ये भविष्यवाणी करना चाह रहे थे कि कल 'बैलन डी ओर' का खिताब मेस्सी को ही मिलने जा रहा है। और फिर अगले दिन इस खिताब के लिए वोटिंग में मेस्सी के बाद दूसरे स्थान पर आने वाले डच खिलाड़ी वर्जिल वान डिक मेस्सी को बधाई देते हुए कह रहे थे "मुझे गर्व है पिछला साल मेरे लिए असाधारण उपलब्धियों वाला रहा , पर दुर्भाग्य ये है कि इस समय मेस्सी जैसे अति मानवीय(unnatural)खिलाड़ी मौजूद हैं।" जब वे ऐसा कह रहे थे तो वे केवल सच्चाई बयां कर रहे थे,अतिशयोक्ति कतई नहीं थी उसमें। निसंदेह मेस्सी हमारे समय के सबसे प्रतिभाशाली खिलाड़ी हैं। हमारे समय के जिन लोगों ने ध्यानचंद या फिर डॉन ब्रेडमैन या फिर पेले को या फिर माइकेल जॉर्डन को सजीव(लाइव) खेलते हुए नहीं देखा है,उन लोगों को मायूस होने की कतई ज़रूरत नहीं है क्योंकि उन्होंने मेस्सी को खेलते हुए देखा है ना। और ऐसा मैं नहीं कह रहा हूँ बल्कि इंग्लैंड के महान फुटबॉल खिलाड़ी गैरी लिनेकर कहते हैं कि "मैं इतना भाग्यशाली हूँ कि अपने ग्रैंड चिल्ड्रन्स को बता पाऊंगा कि मैंने मेस्सी को खेलते हुए देखा है।"

 आखिर मिथक बनते कैसे हैं। यही ना कि उन मिथकीय चरित्र के जीवन में कुछ अविश्वसनीय घटित होता है। 24 जून 1987 को दक्षिण अमेरिकी देश अर्जेंटीना के मध्य प्रान्त सांता फे के मध्यवर्गीय चेतना वाले सबसे बड़े शहर रोसारियो में जन्मे बहुत ही प्रतिभाशाली बालक लियोनेल आंद्रेस मैस्सी को फुटबॉल से प्रेम हो जाता है। परन्तु 10 साल की उम्र होते होते उसे 'ग्रोथ हार्मोन्स डेफिशियेंसी' बीमारी होती है। इसका खर्च ना परिवार उठाने की स्थिति में है और ना आर्थिक मंदी से जूझते देश अर्जेंटीना का कोई फुटबॉल क्लब। तब बार्सिलोना फुटबॉल क्लब के खेल निदेशक कार्ल रिक्सेस उसकी प्रतिभा को पहचानते हैं,उसके साथ अनुबंध करते है और उसके इलाज का प्रबंध  भी। मैस्सी स्पेन आ जाता है। साल था 2000। ये नई सदी की शुरुआत ही नहीं थी बल्कि एक नए मिथक के जन्म लेने की शुरुआत भी थी। मेस्सी में दक्षिण अमेरिकी फुटबॉल की कलात्मकता और एलेगेंस तो जन्मजात थी ही,बस उसमें अब यूरोपीय फुटबॉल की पावर और स्पीड  का ऐसा ब्लेंड हो जाना था जिससे मेस्सी की कलात्मकता में ग़ज़ब की लय और रवानी आ जानी थी और एक सर्वश्रेष्ठ फुटबॉलर का जन्म होना था।
     मेस्सी के इस ब्लेंड को देखना है तो याद कीजिये इस साल मई में खेले गए चैंपियंस ट्रॉफी के सेमीफाइनल के पहले चरण का मैच। बार्सिलोना एफ सी की टीम अपने मैदान कैम्प नोउ में लिवरपूल की टीम को होस्ट कर रही थी। पिछले विश्व कप की असफलता को भुला कर मेस्सी इस सीजन अपने पूरे रंग में आ चुके थे। और अब मैच दर मैच अपना जादू बिखेरा रहे थे। इस मैच से पहले वे इस सीजन 46गोल कर चुके थे। बार्सिलोना को स्पेनिश लीग का खिताब दिला चुके थे। और....और इस मैच में अपने खेल के जादू से पिछले दर्शकों को हिप्नोटाइज़ कर रहे थे और अपने खेल कैरियर का एक और लैंडमार्क स्थापित कर रहे थे। जब 75वें मिनट में अपना पहला और टीम का दूसरा गोल कर रहे थे तो ये अपने क्लब के लिए 599वां गोल था। और उसके बाद 83वें मिनट में मेस्सी का ट्रेडमार्क गोल आया। उनका 600वां गोल दरअसल इससे कम शानदार नहीं ही होना चाहिए था। ये एक फ्री किक थी। वे 35 मीटर दूरी से गोल के लगभग बाएं पोल के सामने से किक ले रहे थे। सामने चार विपक्षी खिलाड़ियों की मजबूत दीवार। गोल पर सबसे महंगे और शानदार गोलकीपर एलिसन मुस्तैद। ये वही एलिसन थे जिन्हें इस वर्ष के सर्वश्रेष्ठ गोलकीपर के लिए याशीन ट्रॉफी मिली है। ये एक असंभव कोण था। लेकिन मेस्सी के लिए नहीं। मेस्सी ने किक ली। बॉल एक तीव्र आर्च बनाती हुए सामने खिलाड़ियों की दीवार के सबसे बाएं खिलाड़ी के ऊपर से गोल पोस्ट के पास जब पहुंची तो एक क्षण को लगा कि बॉल गोलपोस्ट से बाहर। पर ये क्या! बॉल तीक्ष्ण कोण से दांई ओर ड्रिफ्ट हुई और गोल के ऊपरी बाएं कोने से होती हुई जाल में जा धंसी। ये गोल नहीं था। एक खूबसूरत कविता थी जिसे केवल मेस्सी के कलम सरीखे पैर फुटबॉल के शब्दों से विपक्षी गोल के श्यामपट पर लिख सकते थे। दरअसल कोई एक चीज कला और विज्ञान दोनों एक साथ कैसे हो सकती है,इसे मेस्सी के फ्री किक गोलों को देखकर समझा जा सकता है। वे विज्ञान की परफेक्ट एक्यूरेसी के साथ अद्भुत कलात्मकता से अपनी पूर्णता को प्राप्त होते हैं। इस गोल के बाद एक खेल पोर्टल जब ये ट्वीट करता है कि "लिटिल जीनियस डिफाइज लॉजिक" तो आप समझ सकते हैं क्या ही खूबसूरत गोल रहा होगा।और 600 गोल के लैंडमार्क को प्राप्त करने के लिए इससे कम खूबसूरत गोल की दरकार हो सकती है भला। दरअसल यही मेस्सी का जादू है जो सर चढ़ कर बोलता है।
 असाधारण प्रतिभा वो होती है जो किसी सजीव चीज में ही नहीं निर्जीव में भी जान फूंक दे। बैजू बावरा और तानसेन के बारे में कहा जाता है कि वे जब गाते तो वे अपने गायन से दीपक जलास देते   या फिर वर्षा करा देते। ये उनके संगीत और प्रतिभा का कमाल था। ध्यानचंद के बारे में कहा जाता है कि वे इतनी कमाल की ड्रबलिंग किया करते थे कि बॉल हमेशा स्टिक से चिपकी रहती थी। आप इसको यूं भी कह सकते हो कि उनके असाधारण खेल से मंत्रमुग्ध हो वो गेंद ही उनकी स्टिक से अलग ही ना होना चाहती हो या फिर क्रिकेट बॉल डॉन ब्रेडमैन के खेल पर रीझ कर हर बार उनके बल्ले के स्वीट स्पॉट पे आकर उनके बल्ले के उस स्वीट स्पॉट की आवाज पर झूम झूमकर मैदान में चारों और बिखर जाना चाहती हो। और फिर ऐसा क्यों नहीं हो सकता कि फुटबॉल खेल की हर चीज मेस्सी के प्यार में ना पड़ गयी हो। फिर वो गेंद हो या गोल पोस्ट। मैदान की लाइन्स हो या घास या फिर स्वयं मैदान ही क्यों ना हो। और ये सब अपने महबूब की हार पर दुखी और महबूब की जीत पर खुश होते होंगे तो और क्या करते होंगे। याद कीजिए रूस में तातारिस्तान की राजधानी कजान  में खेले गए विश्व कप फुटबॉल का वो प्री क्वार्टर फाइनल मैच जिसमें अर्जेंटीना फ्रांस से हार कर विश्वकप से बाहर हो रहा था। वो शाम जो कयामत की शाम थी जिसमें लोगों ने एक क्लासिक मैच देखा। उन्होंने उम्मीदों के उफान को देखा और उसे बहते हुए भी देखा। लोग अर्जेंटीना को मेस्सी के लिए जीतता देखना चाहते थे तो खुद मेस्सी अर्जेंटीना के लिए जीतना चाहता था। मेस्सी ने अपना सब कुछ झोंक दिया। उसने कुल मिला कर दो असिस्ट किये। लेकिन अर्जेंटीना और जीत के बीच 19 साल का नौजवान एमबापा आ खड़ा हुआ। उसने केवल दो गोल ही नहीं दागे बल्कि एक पेनाल्टी भी अर्जित की। उसकी गति के तूफ़ान में अर्जेंटीना का रक्षण तिनके सा उड़ गया। मेस्सी का अर्जेंटीना 4 के मुकाबले 3 गोल से हार गया। लोगों की उम्मीदें हार गई। हताश निराश मेस्सी मैदान से बाहर निकले तो एक बार भी पीछे मुड़कर नहीं देखा। मानो वे इस असफलता को पलटकर देखना ही नहीं चाहते थे। और तब मेस्सी के प्यार में पड़ी तमाम चीजे दुख में भीग भीग जा रही थीं। निश्चित ही उस दिन बहते  आंसुओं से कज़ान के वातावरण में कुछ ज़्यादा नमी रही होगी,कराहों से हवा में सरसराहट कुछ तेज हुई होगी,हार की तिलमिलाहट से सूरज का ताप कुछ अधिक तीखा रहा होगा,दुःख से सूख कर मैदान की घास कुछ ज़्यादा मटमैली हो गयी होगी और कजान एरीना से बाहर काजिंस्का नदी वोल्गा नदी से गले लग कर जार जार रोई होगी। यकीन मानिए जब  मेस्सी का कोई शॉट गोल पोस्ट मिस करता होगा  तो गोल पोस्ट उस दिशा में ना खिसक पाने का मलाल करता होगा। या फिर जब उसके शॉट्स मैदान से बाहर जा रहे होते है तो ज़रूर लाइन्स मन मसोस कर रह जाती होंगी कि क्यों ना हम थोड़ा सा दांई या बांई ओर खिसक गए। और फिर उन गेंदों का क्या जिनको मेस्सी के पैरों ने छुआ ही नहीं, उन गोलपोस्ट्स का क्या जिनमें मेस्सी गोल नहीं दाग पाए और उन फुटबॉल मैदानों  का क्या जहां मेस्सी ने कभी खेला ही नहीं।
फिलहाल तो मेस्सी के प्यार में पड़े वे सारे फुटबॉल मैदान , वो गेंद, वो गोलपोस्ट्स, वो फिजाएं उल्लास में डूब डूब जा रहे होंगे जो मेस्सी को छठवीं बार 'बैलन डी ओर' जिताने के सहभागी बने और जो उस के भागी नहीं बन सके वे भविष्य में इसके जादू को महसूसने को लालायित हो रहे होंगे।
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मैस्सी को 6 बैलन डी ओर' खिताब जीतने पर बहुत बधाई।

Sunday, 22 September 2019

पंघल के पंच



रूस के एकातेरिनबर्ग में विश्व बॉक्सिंग चैंपियनशिप में 52 किलोग्राम वर्ग में अमित पंघल ने अपना पहला ही मुकाबला जीता था कि उन्होंने  प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी को जन्मदिन की बधाई देते हुए ट्वीट किया कि वो पदक जीत कर उनके(प्रधानमंत्री) हाथों से केक खाएंगे। उनका ये विश्वास दरअसल उनकी कड़ी मेहनत और 2017 से अब तक उनको मिली अभूतपूर्व सफलता से उपजा था। उस विश्वास को उन्होंने टूटने नहीं दिया और इस विश्व प्रतियोगिता में रजत पदक प्राप्त किया। वे विश्व मुक्केबाजी प्रतियोगिता के फाइनल में पहुंचने वाले पहले भारतीय मुक्केबाज बने। 

और जब वे फाइनल में ओलंपिक चैंपियन उज्बेकिस्तान के शाखोबिदिन जोइरोव से हारे तो वे लड़कर हारे और कड़े संघर्ष के बाद हारे। हारने के  बाद वे एक बार फिर दुनिया से कह रहे थे'मेरे पंच थोड़े से कमज़ोर रहे। मैं अपनी कमजोरी जनता हूँ और उन पर काम करूंगा। जब जोइरोव से अगली बार मुकाबला होगा तो मैं जोइरोव को  हराऊंगा।' जब वे ऐसा कह रहे थे तो निश्चित रूप से ये उनका बड़बोलापन नहीं था बल्कि ये भी उसी उनकी योग्यता,अनथक परिश्रम और हालिया सफलताओं से उपजा आत्मविश्वास था जिसके बल पर वे सफलता के इस मुकाम पर अब तक पहुंचे हैं। महत्वपूर्ण बात ये है कि वे अपनी जीत से अपनी कमियों को विस्मृत नहीं करते और अपनी हार से मायूस या हतोत्साहित नहीं होते बल्कि उसके उलट उससे सबक लेते हैं और अपनी सफलता की सीढ़ी बना लेते हैं। 

23 साल का ये युवा सैनिक इस हद तक अभ्यास करता है कि कोच को 'बस भी कर' बोलना पड़ता है। उनका ये जूनून निश्चित ही एक सुनहरे भविष्य की आश्वस्ति देता है। 
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यानि केवल लुहार और सुनार के प्रहारों से ही तमगे नहीं बनते हैं बल्कि पंघल जैसे मुक्केबाजों के दमदार मुक्कों से भी ये तमगे आकार लेते हैं।
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अमित पंघल को बहुत शुभकामनाएं।

Saturday, 14 September 2019

ये आपकी अपनी ज़िंदगी के खोए पन्नों के पते हैं



              सुश्री मीनू खरे विज्ञान में प्रशिक्षित हैं और लंबे समय से आकाशवाणी में कार्यरत हैं। निश्चित ही इन दोनों ने उनके स्वयं को अभिव्यक्त करने के तरीके को परिष्कृत और परिमार्जित किया होगा और एक दिशा दी होगी। शायद यही कारण है कि वे बड़ी से बड़ी बात को भी कम से कम शब्दों में कहना पसंद करती हैं और कहती भी हैं। और इसीलिये जब उन्होंने अपने अंतस को अभिव्यक्त करना चाहा तो इसके लिए  कहने की सबसे छोटी फॉर्म हाइकू को चुनती हैं जो उसके सबसे अनुकूल था। सोने पे सुहागा ये कि वे संगीत में प्रशिक्षित हैं जो उनकी संवेदना को ना केवल रागात्मकता प्रदान करता है बल्कि उनकी संवेदना को तीक्ष्णता और सूक्ष्मता भी प्रदान करता है। 
               वे लिखती हैं 'विशाल पुल/और नीचे बहती/ सूखी सी नदी' तो क्या ही ख़ूबसूरत बिम्ब बनाती हैं। एक तरफ वे उस यथार्थ को बयां कर रही होती हैं कि किस तरह हमारी बड़ी बड़ी नदियां मर रहीं हैं,बरसात को छोड़ कर बाकी समय उनमें पानी ना के बराबर होता है और उनके चौड़े पाटों पर बने विशाल पुल निरर्थक से लगते हैं। लेकिन उसी समय वे एक और गंभीर बात भी कह रही होती हैं कि किस तरह मनुष्य अंदर से खोखला होता जा रहा है,संवेदनहीन होता जा रहा है,उनकी संवेदनाएं सूख रही हैं और दूसरी तरफ भौतिक उपादानों से  बाह्याडंबर के विशाल पुल निर्मित कर रहा होता है। दरअसल वे एक बहुत ही पैनी,सूक्ष्म और चौकन्ना दृष्टि अपने आस पास घट रही घटनाओं पर और साथ ही अपने समय की विसंगतियों और विद्रूपताओं पर रखती हैं, उसे महसूसती हैं और अभिव्यक्ति देती हैं। उनकी इन अभिव्यक्तियों  का पता है उनका अभी हाल ही में आया संग्रह 'खोयी कविताओं के पते'। इस संग्रह में अनेकानेक विषयों पर रचित हायकू हैं। किसी भी संवेदनशील व्यक्ति की सबसे पहले नज़र अपने आस पास के वंचित,शोषित,मज़दूर की तरफ जाती है और वे जब भी उनकी तरफ देखती हैं कुछ मार्मिक रचती हैं- 'रोटी गोल थी/मुफ़लिसी नुकीली/चुभी पेट में' या फिर  'बोझ नहीं ये/कई पेट हैं लड़े/सिर पर मेरे'। इसे पढ़ते हुए अनायास ही स्व. नंदल हितैषी की कविता रिक्शावाला याद आ जाती है। वे लिखते हैं- 'रिक्शा पैर से नहीं पेट से चलती है'। वे सामाजिक सरोकारों से हमेशा जुड़ी रहीं,केवल लेखन के स्तर पर ही नहीं बल्कि व्यावहारिक स्तर पर भी। उन्होंने इन मुद्दों पर रेडियो के लिए तमाम प्रोग्राम भी बनाए और पुरस्कृत भी हुए। वे लिखतीं हैं-'बिटिया रानी/कभी गेट से विदा/कभी पेट से' या फिर 'कामकाजी स्त्री/दो नावों में सवार/फिर भी पर' या फिर 'बड़ी उदासी/ हैं सात समंदर/ धरती प्यासी'। 
               उनकी अभिव्यक्ति की रेंज बहुत ही विस्तृत है। वे हर समसामयिक विषय और समस्याओं पर लिखती हैं बहुत ही खूबसूरती से लिखती हैं।उनका संग्रह'खोयी कविताओं के पते' दरअसल आपकी अपनी ज़िंदगी के खोए पन्ने के पते हैं। जब आप इन कविताओं को पढ़ रहे होते हैं तो आप अपने आस पास के परिवेश को महसूस रहे होते हैं और खुद अपने ज़िन्दगी के खोए पन्नों के पतों से रूबरू हो रहे होते हैं। 
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इन पतों को एक बार ढूंढने का प्रयास आप भी जरूर करें।

Tuesday, 10 September 2019

राफा द ग्रेट



रविवार की रात को न्यूयॉर्क के आर्थर ऐश स्टेडियम में  33 साल के राफेल नडाल और उनसे 10 साल छोटे 23 साल के डेनिल मेडवेदेव जब यूएस ओपन के फाइनल में आमने सामने थे तो ये केवल एक फाइनल मैच भर नहीं था बल्कि समय के दो अंतरालों के बीच द्वंद था,बीतते जाते और और आने वाले के बीच रस्साकशी थी, पुराने और नए के बीच संघर्ष था,दरअसल ये अनुभव और युवा जोश के बीच का महासंग्राम था। आने वाले नए के पास पर्याप्त समय होने से उपजी बेपरवाही तो है पर स्वयं को स्थापित करने की आतुरता भी है लेकिन बीतते जाते पुराने में मुट्ठी से समय रेत की तरह फिसलते जाने के अहसास से उपजी अधीरता है। उसमें बीतते समय के साथ चीज़ों को दोनों हाथों से समेटते जाने की लालसा है और वो हर चीज़ को पूरे जोश और जूनून से समेट लेने की  चाहना है,लालसा है। दरअसल  एक खिलाड़ी के जीवन में 30 साल की उम्र एक ऐसी विभाजक रेखा है जहां से उसकी ढलान शुरू हो जाती है। और तब खिलाड़ी के भीतर शीघ्रातिशीघ्र बहुत कुछ सिद्ध करने का एक आग्रह पैदा होता है। कुछ खिलाड़ियों के भीतर का ये आग्रह आग बन जाती है और तब राफेल नडाल और रोजर फेडरर और हां जोकोविच जैसे खिलाड़ी खेल दुनिया को मिलते हैं।

जोकोविच(32साल),राफा(33साल)और फेडरर(38साल) तीनों ने मिलकर इस शताब्दी के 19 सालों में 55 ग्रेंड स्लैम अपने नाम किये हैं और इनमें से 13 खिताब 30 साल की उम्र के बाद। पिछले 12 ग्रैंड स्लैम इन तीनों ने ही जीते। इन 12 फाइनल मुक़ाबलों में केवल चार बार 1990 के बाद जन्मे खिलाड़ी फाइनल में चुनौती देने में सक्षम हुए पर हर बार उन्हें मुँह की खानी पड़ी। दरअसल इन तीनों खिलाड़ियों की प्रतिभा और अनुभव का आभामंडल इतना प्रकाशवान है कि जो भी उनकी तरफ नज़र भरकर देखता है उसकी आंखें इस कदर चुंधिया जाती हैं कि उसे कोई रास्ता ही नहीं सूझता और असफलता के बियावान में भटक जाता है।

तो बात कल के मैच की। ये फाइनल ग्रैंड स्लैम के सबसे शानदार मैचों में एक था। 4 घंटे 52 मिनट चले इस मैच की अवधि ही इस संघर्ष की तीव्रता और गहनता का वक्तव्य है। ये यूएस ओपन के फाइनल का दूसरा दूसरा सबसे लंबा मैच था। मेडवेदेव ने पहले ही गेम में ब्रेक पॉइंट लेकर अपने इरादे ज़ाहिर कर दिए थे और तीसरे गेम में राफा की सर्विस ब्रेक भी कर दी। लेकिन अगले ही गेम में राफा ने मेडवेदेव की सर्विस ब्रेक कर दी तो लगा कि दर्शकों को कैसा शानदार मैच मिलने जा रहा है। हालांकि जब राफा ने पहले दो सेट जीत लिए तो लगा कि यहां भी कनाडा ओपन की कहानी दोहराई जाने वाली है जहाँ राफा ने फाइनल में मेडवेदेव को 6-3,6-0 से हरा दिया था। मैच समाप्ति के पश्चात इंटरव्यू में मेडवेदेव ने कहा कि कि इस स्टेज (दो सेट से पिछड़ने के बाद)पर आकर वे रनर्स अप स्पीच के बारे में सोचने लगे थे।यानी उस समय उन्हें लग गया था कि अब उनके पास कुछ खोने के लिए कुछ नहीं है और शायद इस निश्चिंतता ने ही उनके खेल को एक उचांई की और ले जाने में मदद की होगी और अगले दो सेट उन्होंने जीतकर बताया कि एक महीने के अंदर सेंट लॉरेंस नदी से लेकर हडसन नदी तक बहुत पानी बह चुका है और अब अब वे वो नहीं रहे जो मांट्रियल में थे।वे बेहतर तैयारी के साथ और हार्डकोर्ट पर 22-2 के इस साल के सबसे सफल खिलाड़ी के रूप में फ्लशिंग मीडोज पहुंचे थे। तभी तो 5वें और अंतिम सेट में 5-2 से पिछड़ने के बाद भी उन्होंने हार नही मानी और 5-4 के स्कोर के बाद 10वें गेम में ब्रेक पॉइंट लेकर स्कोर 5-5 कर ही दिया था कि राफा का अनुभव काम आया और अभी तक एकदम बराबरी को अपने पक्ष में मोड़ दिया। अंततः राफा ने 7-5,6-3,5-7,4-6,6-4 से मैच जीतकर एक इतिहास की निर्मिति की। हां इस मैच ने पुराने को बताया कि नए का आगमन बस कुछ समय का फेर है तो पुराने ने नए से कहा देखा पुराने को खारिज किया जाना कितना कठिन होता है।


जो भी हो 33 वर्ष की उम्र में राफा की 19वीं ग्रैंड स्लैम जीत अविस्मरणीय है जो फेडरर की सर्वाधिक 20 जीतों से एक कम है। जिस तरह से राफा अभी खेल रहे हैं आने वाले समय में वे कई और ग्रैंड स्लैम जीतने वाले हैं,ये तय है। दरअसल उन्होंने अपने खेल में समयानुरूप परिवर्तन किए हैं। समय की शानदार शिड्यूलिंग की है। और चोटों से उबर कर शानदार वापसी की है। 

जो भी हो राफा, फेडरर और जोकोविच ऐसे विशाल वटवृक्ष हैं जिन्होंने अपनी प्रतिभा और अनुभव की छांव से पूरे टेनिस जगत को इस तरह से घेर रखा है कि नवोदित खिलाड़ियों को उनकी छाया से बाहर आने और स्वयं को मजबूत दरख़्त बनाने में  लंबी जद्दोजहद करनी पड़ेगी।

फिलहाल तो राफा को 19वीं जीत मुबारक और ये भी कि जीत की संख्या की ये बाली (टीन)उम्र खत्म होने को है और इस संख्या को युवावस्था में पहुंचाने की अग्रिम शुभकामनाएं कबूल हों।

Sunday, 8 September 2019

ये नए के आने और पुराने के जाने की पदचाप है!




ये नए के आने और पुराने के जाने की पदचाप है!
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जिस तरह अभी हाल ही में 13 जून को  कनाडा की टीम टोरंटो रप्टर्स ओकलैंड के ओरेकल अरीना में तीन बार की चैंपियन गोल्डन स्टेट वारियर्स की मेजबान टीम को छठे गेम में हरा कर पहली बार एनबीए का खिताब जीतने के कारनामे को अंजाम दे रही थी,ठीक उसी तरह 19 साल की बियांका अन्द्रीस्क्यु कनाडा के लिए एक और इतिहास रच रही थीं। वे आर्थर ऐश सेन्टर कोर्ट में अमेरिका की सेरेना विलियम्स को 6-3,7-5 से हरा कर केवल अपना पहला ग्रैंडस्लैम ही नहीं जीत रही थीं बल्कि कोई ग्रैंड स्लैम जीतने वाली पहली कनाडाई खिलाड़ी भी बन रही थीं। जो हैशटैग #wethenorth रप्टर्स के साथ लोकप्रिय हुआ था वो अब बियांका के लिए #shethenorth के नाम से नए सिरे से ट्रेंड और लोकप्रिय हो चला है।

बियांका केवल एक इतिहास ही नहीं रच रही थीं बल्कि वे फिर फिर इतिहास को दोहरा रही थीं। वे रप्टर्स की तरह अमेरिका में मेजबान प्रतिद्वन्दी को हराकर पहली कनाडाई होने का कारनामा दोहरा रही थीं तो वे पिछले साल के फाइनल को भी दोहरा रही थीं। याद कीजिये 2018 के फाइनल में बियांका की तरह ही युवा ओसाका ने सेरेना को हरा कर उनको 24वां ग्रैंडस्लैम  जीतने से ही नहीं रोका था बल्कि ग्रैंडस्लैम जीतने वाली पहली जापानी खिलाड़ी बनी थीं। दोनों बार अनुभव पर जोश भारी पड़ा। जिस समय 1999 में सेरेना ने अपना पहला ग्रैंड स्लैम जीता था उस समय बियांका ने जन्म भी नहीं लिया था। और ये भी आपके सपने पूरे तभी होंगे जब उन्हें देखोगे और प्रयास करोगे। बियांका प्रेस वार्ता में बता रही थीं कि 15 साल की उम्र में उन्होंने यूएस की जीत की राशि का एक फेक चेक स्वयं से भरकर अपने पास रखा हुआ है तो शायद उन्हें इस बात का अनुमान हो चला था कि जल्द ही 3.5 मिलियन डॉलर राशि का असली चेक भी उनके हाथ आने वाला है।

बियांका की ये जीत इसलिए भी उल्लेखनीय है कि पिछले साल वे इस प्रतियोगिता के लिए क्वालीफाई भी नहीं कर सकी थीं। लेकिन इस साल फरवरी से वे शानदार फॉर्म में चल रहीं हैं। दरअसल उन्होंने सेरेना को उनके हथियारों से ही मात दी। उन्होंने सर्व और वॉली का शानदार खेल दिखाया। उन्होंने सेरेना की तरह तेज़ सर्विस की और बहुत ही शक्तिशाली फोरहैंड वॉली लगाईं। उन्होंने पहला सेट आसानी से 6-3 से जीत लिया।उसके बाद दूसरे सेट में भी 5-1 से आगे थीं और 40-30 पर चैंपियनशिप के लिए सर्व कर रहीं थीं जिसे सेरेना ने अपने शानदार फोरहैंड शॉट से बचा लिया। इस एक शॉट ने सेरेना में जान डाल दी और सेरेना ने अगले चार गेम जीतकर स्कोर 5-5 की बराबरी पर ला दिया। अब लगा कि सेरेना गेम में वापसी कर चुकी हैं। सेरेना ऐसा पहले कई बार कर चुकी थीं। पर बियांका ने अपना संयम बनाये रखा।उन्होंने अगले दो गेम ही नहीं जीते बल्कि एक इतिहास रचा और एक इतिहास बनने से रोक दिया।युवा जोश से अनुभव हार गया। पुराने ने नए को रास्ता दिया। और पिछले पांच सालों में यूएस चैंपियनशिप को महिला वर्ग में पांचवा चैंपियन मिला।

बियांका को जीत मुबारक!
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तो फिर सेरेना का क्या?

सेरेना के हिस्से एक बार फिर निराशा हाथ लगी! वे एक बार फिर 24वां ग्रैंड स्लैम जीत कर मार्गरेट कोर्ट की बराबरी करने में असफल रहीं। पर वे असफल भर हुईं पिछले तीन बार के तरह। 2017 में बच्चे को जन्म देने के बाद उन्होंने कोर्ट पर वापसी की। इन दो सालों में चार बार ग्रैंड स्लैम के फाइनल में पहुंची(2018/2019 के विम्बलडन और यूएस ओपन में)पर हर बार हार गईं। वे हारीं,पर हारने से कुछ नहीं होता,हार मानने से होता है। और उन्होंने हार मानी क्या? उन्होंने कहा कि वो फिर लौटकर आएंगी। दरअसल वे अफ्रीकी अमेरिकन समुदाय के संघर्ष और जिजीविषा का प्रतिनिधि चेहरा हैं जिसे उस समुदाय ने अमेरिका में पिछले 500 सालों में रहते हुए दिखाया है। पहले अफ्रीकी अमेरिकन ग्रैंडस्लैम विजेता आर्थर ऐश के नाम वाला ये टेनिस अरीना दरअसल अफ्रीकी अमेरिकनों के जीवन का शाहाकार सा प्रतीत होता है और जब भी कोई अफ्रीकी अमेरिकन वहां खेलता है तो उसके हाथ में थमा रैकेट किसी माउथ ऑर्गन सा लगता है जिससे एफ्रो अमेरिकन के चट्टानी जीवन का ब्लूज संगीत निसृत होता रहता है।

निसंदेह सेरेना चैंपियन खिलाड़ी है। वो एक दिन फिर लौटकर आएगी,चैंपियन की तरह चैंपियन बनकर।
से

सेरेना को शुभकामनाएं!
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तो क्या समय फिर लौट कर आएगा!

Sunday, 25 August 2019

हौंसलों की ये उड़ान बरकरार रहे


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भारतीय समाज की एक बहुत ही सुस्थापित परंपरा है किसी भी विशेष अवसर अपने निकटस्थ लोगों को स्वर्णाभूषण भेंट करने की। और आज जब अपनी माँ के जन्मदिन पर पुसरला वेंकट सिंधु   विश्व विजेता बनकर अपनी मेहनत से अर्जित सोने के तमगे को मां के माथे सजा रहीं थीं तो किसी खिलाड़ी द्वारा मां को दी गई इससे खूबसूरत
भेंट और कुछ नहीं हो सकती थी।
  
स्विट्ज़रलैंड की खूबसूरत वादियों में  बसे बासेल शहर में सिंधु जब विश्व बैडमिंटन चैंपियनशिप के फाइनल में जापान की नोजोमी ओकुहारा को 21-7 और 21-7  हरा रही थीं तो हौंसलों,संघर्ष,लगन,परिश्रम और प्रतिभा से लिखी जा रही एक लंबी कथा की अनेक उपकथाओं में से सबसे महत्वपूर्ण उपकथा का एक खूबसूरत उपसंहार लिख रही थीं। दरअसल ये उपकथा 2017 में ग्लासगो में शुरू हुई थी और वाया नानजिंग बासेल पहुंची थी। और इस खूबसूरत उपसंहार के लिए राइन नदी के किनारे बसे बासेल जैसी खूबसूरत जगह से बेहतर जगह और कौन सी हो सकती थी।

2017 की विश्व चैंपियनशिप ग्लासगो में हुई थी और फाइनल सिंधु और ओकुहारा के बीच खेला गया था। ये ऐतिहासिक और अद्भुत मैच था। 111 मिनट चला ये मैच अब तक का सबसे लंबा मैच था जिसमें बैडमिंटन खेल अपनी संपूर्णता में उपस्थित था। इसमें दोनों खिलाड़ियों के कौशल,प्रतिभा,क्षमता,तकनीक,स्टेमिना,धैर्य का श्रेष्ठ निदर्शन था। उस मैच में एक रैली 73 शॉट्स की थी। इतने शॉट्स में तो कई बार पूरा गेम ही खत्म हो जाता है। एक अन्य रैली 53 शॉट्स की थी। उस मैच का स्कोर ओकुहारा के पक्ष में था 21-19,20-22 और 22-20। तकनीकी रूप से वहां ओकुहारा जीती ज़रूर थीं,लेकिन अगर आप स्कोर पर एक नज़र डालें तो समझ आएगा कि दरअसल ये एक अनिर्णीत संघर्ष था जिसे आगे जाकर खत्म होना था। उसके बाद 2018 में नानजिंग एक बार फिर सिंधु  कारोलिना मारन से फाइनल में हार गईं। और तब 2019 में बासेल आया। यहां का फाइनल 2017 के ग्लास्गो के फाइनल का रेप्लिका था। पुसरला वेंकट सिंधु और नोजोमी ओकुहारा के मध्य। ये मैच बिल्कुल वहीं से शुरू हुआ जहां ग्लास्गो में खत्म हुआ था या यूं कहें अनिर्णीत छूटा था। यहां पहले ही पॉइंट के लिए 22 शॉट्स की रैली हुई। ये अंक जीता ओकुहारा ने। लगा यहां भी ग्लास्गो दोहराया जाने वाला है। लेकिन सिंधु कुछ और ही तय करके आईं थीं। ओकुहारा को अगला अंक जीतने के लिए 8 अंकों तक इंतज़ार करना पड़ा। तब स्कोर हुआ 8-2 और उसके बाद 16-4 और फिर 21-7 सिंधु के पक्ष में। दूसरे गेम की कहानी भी अलग नहीं थी।दूसरा गेम भी 21-7 से जीत कर सिंधु ने  बताया कि मैच कैसे खत्म किया जाता है।5 फुट 11 इंच लंबी सिंधु ने अपने कद की भांति खेल के स्तर को भी इतना ऊंचा उठा दिया कि प्रतिपक्षी एकदम बौना होकर रह गया। सिंधु ने पूरे मैच में बहुत ही आक्रामक खेला। उन्होंने ओकुहारा को डीप थर्ड में खिलाया और बीच कोर्ट से पूरे खेल को नियंत्रित किया। ओकुहारा ने नेट पर सिंधु की कमज़ोरी का फायदा उठाने की कोशिश की। पर सिंधु ने नेट पर भी कोई मौका प्रतिद्वंदी को नहीं दिया। और अपने तमगे के  रुपहले रंग को सुनहरे रंग में तब्दील कर दिया। ये 2017 के अनिर्णीत मैच का निर्णायक अंत था। 

दरअसल खेल में या तो आप अपनी मेहनत से दक्षता अर्जित करते हैं या आपमें जन्मजात प्रतिभा होती है। अर्जित दक्षता वाले खिलाड़ी के प्रदर्शन में एक निरंतरता रहती है।उसके प्रदर्शन में ऊंच नीच कम रहती है। लेकिन जन्मजात प्रतिभावान खिलाड़ी के प्रदर्शन निरंतरता की कमी होती है। सिंधु एक ऐसी ही प्रातिभावान खिलाड़ी हैं। वे अक्सर शानदार प्रदर्शन करते करते अचानक से महत्वपूर्ण मौके पर चूक जातीं।
लेकिन इस समय वे खेल के चर्मोत्कर्ष पर हैं।आपको याद होगा इससे पहले इंडोनेशिया ओपन के क्वार्टर फाइनल में ओकुहारा को 21-14,21-7 से और सेमी फाइनल में चेन यू फेई को 21-19,21-10 से रौंद दिया था,हालांकि वे फाइनल में यामुगुची से हार गई। जो शानदार प्रदर्शन उन्होंने इंडोनेशिया में किया था वो उन्होंने यहां जारी रखा। यहां सेमी फाइनल में चेन युफेई को 21-7,21-14 से और फाइनल में ओकुहारा को 21-7,21-7 से निर्ममता से रौंद डाला।

दरअसल ये सिंधु की प्रतिभा का विस्फोट है जिसमें चीन और जापान की इस खेल में बादशाहत,महानऔर समृद्ध परंपरा और दर्प चूर चूर होकर बिखर गया और धूल धुसरित हो गया। और उसके विध्वंस पर भारतीय बैडमिंटन के  नए युग का आरंभ होगा। और बासेल और स्विट्जरलैंड के लिए सिर्फ इतना ही कि उन्होंने ये सोचा और समझा कि सिंधु के पास रुपहला रंग पहले से बहुतायत में है और खुद उनके यहां भी पहाड़ों पर बर्फ की चादर पर पसरा रुपहला रंग भी बहुतायत में है तो क्यों ना उस रुपहली चादर पर सूर्य की किरणों से जो सुनहरा रंग छिटका छिटका फिरता है,उसे बटोर कर अपने इस खूबसूरत मेहमान को भेंटकर विदा किया जाय।
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सिंधु को ये अविस्मरणीय जीत मुबारक!

Tuesday, 6 August 2019


दरअसल ये उठे हुए हाथ भारतीय बैडमिंटन की सबसे बड़ी आश्वस्ति की तरह हैं कि 'हम हैं ना'.जिस समय साइना अपनी यात्रा का द्रुत पूरा कर चुकी हों और श्रीकांत व सिंधु अपने सम पर आकर द्रुत में आने की लय खोज रहे हों उस समय इस जोड़ी का विलंबित से उठान आपको आश्वस्त करता है कि ऊंचाइयों का एक बेहद खूबसूरत संगीत आपके दिलोदिमाग पर छा जाने वाला है।
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सात्विक-चिराग की जीत मुबारक! हिप हिप हुर्रे!

Tuesday, 23 July 2019


पुसरला वेंकट सिंधु निसंदेह भारतीय बैडमिंटन की एक  बड़ी उपलब्धि हैं जिन्होंने बैडमिंटन को नई ऊँचाई तक पहुंचाया है। लेकिन अपनी तमाम खूबियों और विशेषताओं के बावजूद वे एक अपूर्ण खिलाड़ी हैं। उनके खेल में निरंतरता की बेहद कमी हैं। वे पैचेज में बेहतरीन खेलती हैं। वे एक दिन बहुत अच्छा खेलेंगी और अगले दिन उतना ही बुरा। वे अक्सर ही महत्वपूर्ण मुक़ाबले में हार जाती हैं। आप चाहें तो उन्हें चोकर कह सकते हैं।

अभी हाल ही में सम्पन्न इंडोनेशिया ओपन इसका बड़ा उदाहरण है। पहले दो मुक़ाबलों में अनसीडेड खिलाड़ियों के विरुद्ध संघर्ष करती दिखाई दीं।पहले राउंड में ओहोरी को 11-21,21-15,21-15से जीतीं तो दूसरे राउंड में ब्लिचफेल्ट को 21-19,17-21,21-11 से जीतीं। उसके बाद वे गज़ब का शानदार खेलीं। क्वार्टर फाइनल में उन्होंने तीसरी सीड नोजोमो ओकुहारो को 21-14,21-7 से रौंद डाला। इतना ही नहीं उसके बाद सेमीफाइनल में भी उन्होंने दूसरी सीड चेन युफेई को भी आसानी से 21-19,21-10 से हरा दिया। और जब ये लगाने लगा कि अब वे इस साल का पहला खिताब जीत लेंगी तो फाइनल में बहुत ही आसानी से 15-21,14-21 से अकाने यामागुची से  हार गईं जिनसे  पिछले 4 मैच लगातार जीते थे।

शायद ये अपूर्णता ही सिंधु के खेल की खूबसूरती है कि तकनीकी के इस युग में वे मशीन नहीं बन सकीं।


ये लड़की तो पारस है


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कभी आप राष्ट्रिय राजमार्ग 37 से गुवाहाटी से पूरब की तरफ जोरहाट की यात्रा कीजिए। पूरे रास्ते दोनों तरफ दूर दूर तक धान के खेत और चाय के बागानों की कभी ना खत्म होने वाली एक गहरी हरियाली और उसके पार समानांतर चलती पहाड़ों की श्रृंखला से समृद्धि के साथ चलते कॉरीडोर का भ्रम उत्पन्न होता है। भ्रम इसलिए कि पहली नज़र में आपको उस हरियाली के नीचे अभावों,गरीबी,दुखों और शोषण का स्याह रंग दिखाई नहीं देता है। इसी राजमार्ग पर जब गुवाहाटी से लगभग सवा सौ किलोमीटर की यात्रा कर चुके होते हैं तो नौगांव ज़िला आता है। इसी ज़िले में एक गांव है ढिंग। और इसी गांव में  जोमाली और रोनजीत दास नाम की एक कृषक दंपति है जो धान उगाते हैं और मेहनत करके उसके हरे रंग को पका के सुनहरे रंग में बदल देते हैं पर अपनी किस्मत में सुखों के सुनहरे रंग लाने में लाख कोशिशों के बावजूद  कामयाब नहीं हो पाते। लेकिन वे संयोग से अपने यहां एक ऐसा पारस पत्थर उत्पन्न करते हैं जो भले ही धान के हरे रंग को सुनहरे रंग में ना बदल पाए पर जहां भी उसके चपल कदम पड़ते हैं धातुओं का रंग सुनहरा और रुपहला होने लगता है। उस पारस का नाम 'हिमा रोनजीत दास' है।

हिमा ने पिछले बीस दिनों में यूरोपीय सर्किट में दो सौ और चार सौ मीटर की रेस में पांच स्वर्ण पदक जीते। 18 साल की उम्र में टेम्पेरे में पिछले साल जब  वे अंडर 20 विश्व चैंपियनशिप में 400 मीटर का स्वर्ण  पदक जीत रहीं थीं तो वे एक इतिहास बना रहीं थीं। ऐसा करने वाले वे पहली भारतीय एथलीट थीं। तब से वे लगातार अच्छा प्रदर्शन कर रही हैं और आने वाले समय में वे एथेलेटिक्स में भारत की सबसे बड़ी उम्मीद बनकर उभरी हैं।
         
 फ़िलहाल वे अपने हाल के प्रदर्शन से चर्चा में हैं।दरअसल यूरोपीय सर्किट में ये प्रदर्शन अगर विशुद्ध खेल की दृष्टि से देखें तो कोई बड़ा प्रदर्शन नहीं है। जो भी स्वर्ण उन्होंने जीते उनमें से वे एक में भी अपना सर्वश्रेष्ठ समय नहीं  निकाल सकीं हैं। जिस 400 मीटर में उन्होंने गोल्ड जीता उसमें तीनों पदक भारतीय बालाओं ने जीते। विस्मया दूसरे और सरिता बेन गायकवाड़ तीसरे स्थान पर रहीं। दरअसल वे जिन प्रतियोगिताओं में भाग ले रहीं थी वे कोई बड़ी महत्वपूर्ण प्रतियोगिताएं थी ही नहीं और उसमें जो प्रतिद्वंदिता थी वो भी स्तरीय नहीं थी। इन प्रतियोगिताओं में अनस मोहम्मद ने भी स्वर्ण पदक जीते और अपने समय में सुधार किया। जबकि कई अन्य भारतीय खिलाड़ियों ने भी अच्छा प्रदर्शन किया। इन्हीं में से एक मे एम पी जाबिर ने 400 मीटर बाधा दौड़ में स्वर्ण जीता।फिलहाल जो प्रदर्शन है ,ये कटु सत्य है कि, उससे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पदक जीतने की कोई संभावना नहीं है मेरा मतलब ओलंपिक से या इसी स्तर की अन्य प्रतियोगिता से है। दरअसल इस तरह के टूर एथेलेटिक्स संघ द्वारा सांस्कृतिक आदान प्रदान और खिलाड़ियों को एक्सपोज़र देने के लिए होते हैं। निसंदेह इससे खिलाड़ियों को बेहतरीन एक्सपोसर मिलता है। वे उनके तौर तरीके,स्टाइल,तकनीकी और माहौल से रूबरू होते हैं और एक बड़े स्टेज पर स्वयं को प्रस्तुत करने को तैयार होते हैं और उससे जो अनुभव खिलाड़ी को प्राप्त होते हैं वो सबसे बड़ा फ़ायदा होता है। वे अभी 19 साल की हैं और आने वाले समय में अगर उन्हें सही ट्रेनिंग मिली तो निसंदेह वे बेहतर करेंगी। इस समय की सबसे बड़ी जरूरत है कि उन्हें उम्मीदों के अतिशय बोझ में दबने से बचाना है।

दरअसल उनका हालिया प्रदर्शन  इस बात के लिए रेखांकित किया जाना चाहिए कि सुदूर उत्तर पूर्व की 55 किलो और 5 फुट 5 इंच लंबी दुबली पतली सी लड़की जिसके पिता अपनी लड़की को सिर्फ इसलिए अपने से कई सौ किलोमीटर दूर भेज देते हैं कि उसे तीनों समय भरपेट  भोजन मिलेगा,वो आज  अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर एथेलेटिक्स में पदक जीतने की भारत की सबसे बड़ी आशा बन कर उभरी है। उसकी सफलता की कहानी स्वप्न सरीखी है। अभावों और विपरीत परिस्थितियों में हौसले और धैर्य को बनाये रख कर कैसे सफलता पाई जाती है,ये उससे सीखा जा सकता है। उस पर सोने में सुहागा ये कि एक स्टार बन जाने के बाद भी उसके भीतर की मानवीयता,उसके भीतर की खेल भावना मर नहीं जाती है। वो असम के लोगों के दुख दर्द को समझती है क्योंकि वो सब उसने खुद भोगा है और इसलिए अपनी सैलरी का आधा भाग असम के बाढ़ पीड़ितों के लिए दान कर देती है।
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उसकी सफलता और उदारता के लिए उसे सलाम करना तो बनता है ना।

Saturday, 20 July 2019

कुछ हार जीत ही होती हैं।


कुछ हार जीत ही होती हैं या कुछ जीत हार हो जाती हैं
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14 जुलाई को खेल इतिहास की पुस्तक में दो ऐसे पृष्ठ जुड़ रहे थे जिनके  हरूफ रोमांच की अतिरिक्त स्याही में डूबकर कुछ ज्यादा बड़े और मोटे हो गए थे। और क्या ही संयोग है कि ये घटनाएं एक ही शहर में एक ही समय पर कुछ ही दूरी पर घट रहीं थी और वो भी गज़ब की समानता के साथ। वो शहर था लंदन। और घटनाएं ! कहने की ज़रूरत नहीं क्रिकेट विश्व कप का फाइनल और विम्बलडन टेनिस ग्रैंड स्लैम का पुरुष फाइनल। 

दोनों फाइनल रोमांच की पराकाष्ठा थे और ये दोनों अपने अपने खेलों के 'मक्का'में यानी लॉर्ड्स के मैदान और विम्बलडन के आल इंग्लैंड क्लब के सेन्टर कोर्ट पर खेले जा रहे थे। लेकिन सबसे महत्वपूर्ण बात ये दोनों ही मैच अपने अपने विजेताओं की अपेक्षा हारने वालों के लिए यानी न्यूजीलैंड और फेडरर के याद किये जायेंगे। 
ये शायद इंग्लैंड का दुर्भाग्य ही है कि वे विश्व कप शुरू होने के 44 वर्षों बाद 12वे संस्करण में जीत हासिल कर रहे थे।और जीत भी कैसी कि जीत से पहले याद आये निर्धारित 50 ओवरों में टाई, उसके बाद सुपर ओवर में टाई,अधिक बाउंड्रीज से मैच के विजेता का निर्धारण, सुपर ओवर में ओवर थ्रो में बॉल का  बैट से लगकर चौका हो जाना और अंपायर द्वारा 5 की जगह 6 रन दे देना। दरअसल फाइनल के उस रोमांच और मैदान में घटने वाली इतनी घटनाओं के बीच इंग्लैंड की जीत गुम सी हो गई। 

तो दूसरी तरफ नोवाक जोकोविच की जीत से पहले फेडरर याद आएंगे,उनका फाइनल में शानदार खेल याद आएगा,उनका फाइनल तक का सफर याद आएगा,उनकी राफा के ऊपर जीत याद आएगी,याद आएगा 5 सेटों तक चला संघर्ष जो पांचवें सेट में 12-12 गेमों के बाद अंततः टाई ब्रेकर  निर्णीत हुआ और इन सब से पहले याद आएगा कि 38वर्ष की उम्र में भी फेडरर किसी युवा खिलाड़ी की तरह बल्कि उससे भी कहीं शानदार टेनिस खेल रहे थे।
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आधिकारिक विजेता भले ही नोवाक और इंग्लैंड हो पर मेरी ओर से विजेता फेडरर और न्यूजीलैंड भी बल्कि ही समझे जाएं।

Wednesday, 17 July 2019

जोड़ घटा बाकी


जोड़ घटा बाकी
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मौन की तरलता में
शब्द हैं कि घुले जाते हैं
और अर्थ हैं कि
इश्तेहार की तरह बहे जाते हैं।

कुछ अर्थ अपनी चीख में भी अनसुने रह गए
और दूसरे अर्थ अपने मौन में भी
सबसे ज्यादा सुने गए।

सुने गए अर्थ
जो सबसे भारी थे हवा हो गए रुई की तरह 
और सुने गए सबसे हल्के अर्थ
मन की सबसे भीतरी तहों में 
 दर्ज किए गए चोट की तरह।

बड़ी चोट करने वाले अर्थ निरर्थक पदबंधों की तरह  हल्की खराशों में अभिव्यक्त हुए 
और छोटी चोट वाले अर्थ 
लोकोक्तियों के तरह मर्म पर 
गहरे घाव से अंकित हुए ।

ये दीगर बात है समय के अंतराल में 
सभी ने अपने अर्थ खो दिए 
और एक मौन रिक्तता से 
निशान छोड़ गए 
अपनी विरासत में
पर कहीं दूर से लौट आने वाली अनुगूंज
अभी भी शेष है
उम्मीद की किरण सी
कि उनमें अर्थ लौट आएंगे 
एक दिन।

Tuesday, 16 July 2019



दुनिया की वे जगहें सबसे खूबसूरत होती हैं जहां प्रकृति की उदारता अपने सबसे तरल और मानवीय श्रम की गरिमा अपने सबसे सघन रूप में होती है।अम्बाला से पटियाला जाते हुए हाईवे के दोनों तरफ दूर दूर तक तक बारिश के पानी से लबालब भरे खेत और उसके ऊपर हाल ही में रोपी गई धान की पौध हरे रंग की चादर आदमी के पेट की भूख की कालिमा का सबसे सुंदर आवरण प्रतीत होता है। पहली नज़र में पटियाला शहर समृद्धि का बहता दरिया से लगता है और ये भी कि पंजाब के शहर किसी भी अन्य प्रान्त के शहरों की तुलना में अधिक सुनियोजित ढंग से विन्यस्त हैं।

Saturday, 29 June 2019

लम्हा लम्हा ज़िन्दगी यूं मचलती है

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"कोई अगर तुमसे पूछे 
मेरे बारे में
तो कहना एक लम्हा था
जो बीत गया
अगर कोई मुझसे पूछेगा 
तुम्हारे बारे में
तो मैं कहूंगा 
एक ही लम्हा था 
जो मैंने जी लिया"
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ये ज़िन्दगी आखिर लम्हों का जोड़ घटाव ही तो है,जमा  बाकी ही तो है। आप लम्हा लम्हा जीते जाते हो। एक लम्हा ज़िन्दगी में जुड़ता जाता है और एक लम्हा ज़िन्दगी कम होती जाती है। किसी लम्हे में पूरी ज़िंदगी जी ली जाती है और कोई एक लम्हा पूरी ज़िंदगी भी नही जिया जाता। एक लम्हे प्रेम के समंदर में डूब जाते हो तो एक लम्हे ग़म के दरिया में। एक लम्हा ख्वाब का,एक लम्हा खराशों का। एक लम्हा मुस्कुराती सुबह का,एक लम्हा उदास शाम का। एक खुशनुमा लम्हा आस का, एक उदास लम्हा निराशा का। 
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एक खुशनुमा लम्हे में कलम ने प्यार का शाहकार रचा अगले लम्हे एक राग ने धड़कना सिखाया और अगले लम्हे स्वर के दरिया में कल कल बह निकला।
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कुणाल-प्रशांत एक लम्हा शब्दों से प्रेम की इमारत बनाते हैं,उसे एक लम्हे में जावेद-मोहसिन अपनी धुन से रंग देते हैं तो प्रेम के अनेकों रंग बिखर बिखर जाते हैंऔर अगले लम्हे जब अरिजीत-श्रेया अपने सुरों की रोशनी से भर देते हैं तो वे रंग खिलखिला उठते हैं
     "तू इश्क़ के सारे रंग दे गया
      फिर खींच के अपने संग ले गया"
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#बॉलीवुड_गीत_7