Tuesday, 6 August 2019


दरअसल ये उठे हुए हाथ भारतीय बैडमिंटन की सबसे बड़ी आश्वस्ति की तरह हैं कि 'हम हैं ना'.जिस समय साइना अपनी यात्रा का द्रुत पूरा कर चुकी हों और श्रीकांत व सिंधु अपने सम पर आकर द्रुत में आने की लय खोज रहे हों उस समय इस जोड़ी का विलंबित से उठान आपको आश्वस्त करता है कि ऊंचाइयों का एक बेहद खूबसूरत संगीत आपके दिलोदिमाग पर छा जाने वाला है।
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सात्विक-चिराग की जीत मुबारक! हिप हिप हुर्रे!

Tuesday, 23 July 2019


पुसरला वेंकट सिंधु निसंदेह भारतीय बैडमिंटन की एक  बड़ी उपलब्धि हैं जिन्होंने बैडमिंटन को नई ऊँचाई तक पहुंचाया है। लेकिन अपनी तमाम खूबियों और विशेषताओं के बावजूद वे एक अपूर्ण खिलाड़ी हैं। उनके खेल में निरंतरता की बेहद कमी हैं। वे पैचेज में बेहतरीन खेलती हैं। वे एक दिन बहुत अच्छा खेलेंगी और अगले दिन उतना ही बुरा। वे अक्सर ही महत्वपूर्ण मुक़ाबले में हार जाती हैं। आप चाहें तो उन्हें चोकर कह सकते हैं।

अभी हाल ही में सम्पन्न इंडोनेशिया ओपन इसका बड़ा उदाहरण है। पहले दो मुक़ाबलों में अनसीडेड खिलाड़ियों के विरुद्ध संघर्ष करती दिखाई दीं।पहले राउंड में ओहोरी को 11-21,21-15,21-15से जीतीं तो दूसरे राउंड में ब्लिचफेल्ट को 21-19,17-21,21-11 से जीतीं। उसके बाद वे गज़ब का शानदार खेलीं। क्वार्टर फाइनल में उन्होंने तीसरी सीड नोजोमो ओकुहारो को 21-14,21-7 से रौंद डाला। इतना ही नहीं उसके बाद सेमीफाइनल में भी उन्होंने दूसरी सीड चेन युफेई को भी आसानी से 21-19,21-10 से हरा दिया। और जब ये लगाने लगा कि अब वे इस साल का पहला खिताब जीत लेंगी तो फाइनल में बहुत ही आसानी से 15-21,14-21 से अकाने यामागुची से  हार गईं जिनसे  पिछले 4 मैच लगातार जीते थे।

शायद ये अपूर्णता ही सिंधु के खेल की खूबसूरती है कि तकनीकी के इस युग में वे मशीन नहीं बन सकीं।


ये लड़की तो पारस है


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कभी आप राष्ट्रिय राजमार्ग 37 से गुवाहाटी से पूरब की तरफ जोरहाट की यात्रा कीजिए। पूरे रास्ते दोनों तरफ दूर दूर तक धान के खेत और चाय के बागानों की कभी ना खत्म होने वाली एक गहरी हरियाली और उसके पार समानांतर चलती पहाड़ों की श्रृंखला से समृद्धि के साथ चलते कॉरीडोर का भ्रम उत्पन्न होता है। भ्रम इसलिए कि पहली नज़र में आपको उस हरियाली के नीचे अभावों,गरीबी,दुखों और शोषण का स्याह रंग दिखाई नहीं देता है। इसी राजमार्ग पर जब गुवाहाटी से लगभग सवा सौ किलोमीटर की यात्रा कर चुके होते हैं तो नौगांव ज़िला आता है। इसी ज़िले में एक गांव है ढिंग। और इसी गांव में  जोमाली और रोनजीत दास नाम की एक कृषक दंपति है जो धान उगाते हैं और मेहनत करके उसके हरे रंग को पका के सुनहरे रंग में बदल देते हैं पर अपनी किस्मत में सुखों के सुनहरे रंग लाने में लाख कोशिशों के बावजूद  कामयाब नहीं हो पाते। लेकिन वे संयोग से अपने यहां एक ऐसा पारस पत्थर उत्पन्न करते हैं जो भले ही धान के हरे रंग को सुनहरे रंग में ना बदल पाए पर जहां भी उसके चपल कदम पड़ते हैं धातुओं का रंग सुनहरा और रुपहला होने लगता है। उस पारस का नाम 'हिमा रोनजीत दास' है।

हिमा ने पिछले बीस दिनों में यूरोपीय सर्किट में दो सौ और चार सौ मीटर की रेस में पांच स्वर्ण पदक जीते। 18 साल की उम्र में टेम्पेरे में पिछले साल जब  वे अंडर 20 विश्व चैंपियनशिप में 400 मीटर का स्वर्ण  पदक जीत रहीं थीं तो वे एक इतिहास बना रहीं थीं। ऐसा करने वाले वे पहली भारतीय एथलीट थीं। तब से वे लगातार अच्छा प्रदर्शन कर रही हैं और आने वाले समय में वे एथेलेटिक्स में भारत की सबसे बड़ी उम्मीद बनकर उभरी हैं।
         
 फ़िलहाल वे अपने हाल के प्रदर्शन से चर्चा में हैं।दरअसल यूरोपीय सर्किट में ये प्रदर्शन अगर विशुद्ध खेल की दृष्टि से देखें तो कोई बड़ा प्रदर्शन नहीं है। जो भी स्वर्ण उन्होंने जीते उनमें से वे एक में भी अपना सर्वश्रेष्ठ समय नहीं  निकाल सकीं हैं। जिस 400 मीटर में उन्होंने गोल्ड जीता उसमें तीनों पदक भारतीय बालाओं ने जीते। विस्मया दूसरे और सरिता बेन गायकवाड़ तीसरे स्थान पर रहीं। दरअसल वे जिन प्रतियोगिताओं में भाग ले रहीं थी वे कोई बड़ी महत्वपूर्ण प्रतियोगिताएं थी ही नहीं और उसमें जो प्रतिद्वंदिता थी वो भी स्तरीय नहीं थी। इन प्रतियोगिताओं में अनस मोहम्मद ने भी स्वर्ण पदक जीते और अपने समय में सुधार किया। जबकि कई अन्य भारतीय खिलाड़ियों ने भी अच्छा प्रदर्शन किया। इन्हीं में से एक मे एम पी जाबिर ने 400 मीटर बाधा दौड़ में स्वर्ण जीता।फिलहाल जो प्रदर्शन है ,ये कटु सत्य है कि, उससे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पदक जीतने की कोई संभावना नहीं है मेरा मतलब ओलंपिक से या इसी स्तर की अन्य प्रतियोगिता से है। दरअसल इस तरह के टूर एथेलेटिक्स संघ द्वारा सांस्कृतिक आदान प्रदान और खिलाड़ियों को एक्सपोज़र देने के लिए होते हैं। निसंदेह इससे खिलाड़ियों को बेहतरीन एक्सपोसर मिलता है। वे उनके तौर तरीके,स्टाइल,तकनीकी और माहौल से रूबरू होते हैं और एक बड़े स्टेज पर स्वयं को प्रस्तुत करने को तैयार होते हैं और उससे जो अनुभव खिलाड़ी को प्राप्त होते हैं वो सबसे बड़ा फ़ायदा होता है। वे अभी 19 साल की हैं और आने वाले समय में अगर उन्हें सही ट्रेनिंग मिली तो निसंदेह वे बेहतर करेंगी। इस समय की सबसे बड़ी जरूरत है कि उन्हें उम्मीदों के अतिशय बोझ में दबने से बचाना है।

दरअसल उनका हालिया प्रदर्शन  इस बात के लिए रेखांकित किया जाना चाहिए कि सुदूर उत्तर पूर्व की 55 किलो और 5 फुट 5 इंच लंबी दुबली पतली सी लड़की जिसके पिता अपनी लड़की को सिर्फ इसलिए अपने से कई सौ किलोमीटर दूर भेज देते हैं कि उसे तीनों समय भरपेट  भोजन मिलेगा,वो आज  अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर एथेलेटिक्स में पदक जीतने की भारत की सबसे बड़ी आशा बन कर उभरी है। उसकी सफलता की कहानी स्वप्न सरीखी है। अभावों और विपरीत परिस्थितियों में हौसले और धैर्य को बनाये रख कर कैसे सफलता पाई जाती है,ये उससे सीखा जा सकता है। उस पर सोने में सुहागा ये कि एक स्टार बन जाने के बाद भी उसके भीतर की मानवीयता,उसके भीतर की खेल भावना मर नहीं जाती है। वो असम के लोगों के दुख दर्द को समझती है क्योंकि वो सब उसने खुद भोगा है और इसलिए अपनी सैलरी का आधा भाग असम के बाढ़ पीड़ितों के लिए दान कर देती है।
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उसकी सफलता और उदारता के लिए उसे सलाम करना तो बनता है ना।

Saturday, 20 July 2019

कुछ हार जीत ही होती हैं।


कुछ हार जीत ही होती हैं या कुछ जीत हार हो जाती हैं
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14 जुलाई को खेल इतिहास की पुस्तक में दो ऐसे पृष्ठ जुड़ रहे थे जिनके  हरूफ रोमांच की अतिरिक्त स्याही में डूबकर कुछ ज्यादा बड़े और मोटे हो गए थे। और क्या ही संयोग है कि ये घटनाएं एक ही शहर में एक ही समय पर कुछ ही दूरी पर घट रहीं थी और वो भी गज़ब की समानता के साथ। वो शहर था लंदन। और घटनाएं ! कहने की ज़रूरत नहीं क्रिकेट विश्व कप का फाइनल और विम्बलडन टेनिस ग्रैंड स्लैम का पुरुष फाइनल। 

दोनों फाइनल रोमांच की पराकाष्ठा थे और ये दोनों अपने अपने खेलों के 'मक्का'में यानी लॉर्ड्स के मैदान और विम्बलडन के आल इंग्लैंड क्लब के सेन्टर कोर्ट पर खेले जा रहे थे। लेकिन सबसे महत्वपूर्ण बात ये दोनों ही मैच अपने अपने विजेताओं की अपेक्षा हारने वालों के लिए यानी न्यूजीलैंड और फेडरर के याद किये जायेंगे। 
ये शायद इंग्लैंड का दुर्भाग्य ही है कि वे विश्व कप शुरू होने के 44 वर्षों बाद 12वे संस्करण में जीत हासिल कर रहे थे।और जीत भी कैसी कि जीत से पहले याद आये निर्धारित 50 ओवरों में टाई, उसके बाद सुपर ओवर में टाई,अधिक बाउंड्रीज से मैच के विजेता का निर्धारण, सुपर ओवर में ओवर थ्रो में बॉल का  बैट से लगकर चौका हो जाना और अंपायर द्वारा 5 की जगह 6 रन दे देना। दरअसल फाइनल के उस रोमांच और मैदान में घटने वाली इतनी घटनाओं के बीच इंग्लैंड की जीत गुम सी हो गई। 

तो दूसरी तरफ नोवाक जोकोविच की जीत से पहले फेडरर याद आएंगे,उनका फाइनल में शानदार खेल याद आएगा,उनका फाइनल तक का सफर याद आएगा,उनकी राफा के ऊपर जीत याद आएगी,याद आएगा 5 सेटों तक चला संघर्ष जो पांचवें सेट में 12-12 गेमों के बाद अंततः टाई ब्रेकर  निर्णीत हुआ और इन सब से पहले याद आएगा कि 38वर्ष की उम्र में भी फेडरर किसी युवा खिलाड़ी की तरह बल्कि उससे भी कहीं शानदार टेनिस खेल रहे थे।
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आधिकारिक विजेता भले ही नोवाक और इंग्लैंड हो पर मेरी ओर से विजेता फेडरर और न्यूजीलैंड भी बल्कि ही समझे जाएं।

Wednesday, 17 July 2019

जोड़ घटा बाकी


जोड़ घटा बाकी
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मौन की तरलता में
शब्द हैं कि घुले जाते हैं
और अर्थ हैं कि
इश्तेहार की तरह बहे जाते हैं।

कुछ अर्थ अपनी चीख में भी अनसुने रह गए
और दूसरे अर्थ अपने मौन में भी
सबसे ज्यादा सुने गए।

सुने गए अर्थ
जो सबसे भारी थे हवा हो गए रुई की तरह 
और सुने गए सबसे हल्के अर्थ
मन की सबसे भीतरी तहों में 
 दर्ज किए गए चोट की तरह।

बड़ी चोट करने वाले अर्थ निरर्थक पदबंधों की तरह  हल्की खराशों में अभिव्यक्त हुए 
और छोटी चोट वाले अर्थ 
लोकोक्तियों के तरह मर्म पर 
गहरे घाव से अंकित हुए ।

ये दीगर बात है समय के अंतराल में 
सभी ने अपने अर्थ खो दिए 
और एक मौन रिक्तता से 
निशान छोड़ गए 
अपनी विरासत में
पर कहीं दूर से लौट आने वाली अनुगूंज
अभी भी शेष है
उम्मीद की किरण सी
कि उनमें अर्थ लौट आएंगे 
एक दिन।

Tuesday, 16 July 2019



दुनिया की वे जगहें सबसे खूबसूरत होती हैं जहां प्रकृति की उदारता अपने सबसे तरल और मानवीय श्रम की गरिमा अपने सबसे सघन रूप में होती है।अम्बाला से पटियाला जाते हुए हाईवे के दोनों तरफ दूर दूर तक तक बारिश के पानी से लबालब भरे खेत और उसके ऊपर हाल ही में रोपी गई धान की पौध हरे रंग की चादर आदमी के पेट की भूख की कालिमा का सबसे सुंदर आवरण प्रतीत होता है। पहली नज़र में पटियाला शहर समृद्धि का बहता दरिया से लगता है और ये भी कि पंजाब के शहर किसी भी अन्य प्रान्त के शहरों की तुलना में अधिक सुनियोजित ढंग से विन्यस्त हैं।

Saturday, 29 June 2019

लम्हा लम्हा ज़िन्दगी यूं मचलती है

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"कोई अगर तुमसे पूछे 
मेरे बारे में
तो कहना एक लम्हा था
जो बीत गया
अगर कोई मुझसे पूछेगा 
तुम्हारे बारे में
तो मैं कहूंगा 
एक ही लम्हा था 
जो मैंने जी लिया"
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ये ज़िन्दगी आखिर लम्हों का जोड़ घटाव ही तो है,जमा  बाकी ही तो है। आप लम्हा लम्हा जीते जाते हो। एक लम्हा ज़िन्दगी में जुड़ता जाता है और एक लम्हा ज़िन्दगी कम होती जाती है। किसी लम्हे में पूरी ज़िंदगी जी ली जाती है और कोई एक लम्हा पूरी ज़िंदगी भी नही जिया जाता। एक लम्हे प्रेम के समंदर में डूब जाते हो तो एक लम्हे ग़म के दरिया में। एक लम्हा ख्वाब का,एक लम्हा खराशों का। एक लम्हा मुस्कुराती सुबह का,एक लम्हा उदास शाम का। एक खुशनुमा लम्हा आस का, एक उदास लम्हा निराशा का। 
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एक खुशनुमा लम्हे में कलम ने प्यार का शाहकार रचा अगले लम्हे एक राग ने धड़कना सिखाया और अगले लम्हे स्वर के दरिया में कल कल बह निकला।
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कुणाल-प्रशांत एक लम्हा शब्दों से प्रेम की इमारत बनाते हैं,उसे एक लम्हे में जावेद-मोहसिन अपनी धुन से रंग देते हैं तो प्रेम के अनेकों रंग बिखर बिखर जाते हैंऔर अगले लम्हे जब अरिजीत-श्रेया अपने सुरों की रोशनी से भर देते हैं तो वे रंग खिलखिला उठते हैं
     "तू इश्क़ के सारे रंग दे गया
      फिर खींच के अपने संग ले गया"
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#बॉलीवुड_गीत_7

Sunday, 23 June 2019

'तुमसा नहीं देखा'



         'पूर्ण' शब्द अपने आप में बहुत ही सकारात्मक होने के बावजूद अनेक संदर्भों में  उतना ही नकारात्मक लगने लगता है। एक ऐसा शब्द जो अक्सर खालीपन के गहरे भावबोध में धकेल देता है,कुछ छूट जाने का अहसास कराता है और मन को  अन्यमनस्यकता से भर भर देता है। पिछले दिनों जब युवराज सिंह मुम्बई के एक होटल में जब अपनी मैदानी खेल पारी के पूर्ण होने की घोषणा कर रहे थे तो केवल ये घोषणा ही उनके फैन्स के दिलों में गहन उदासी और खालीपन का भाव नहीं भर रही थी बल्कि वो जगह भी,जहां वे ये घोषणा कर रहे थे,उनके दुख का सबब भी बन रही थी। निसंदेह ये नितांत दुर्भाग्यपूर्ण ही था युवराज जैसे प्रतिभावान खिलाड़ी को जिस पारी के पूर्ण होने की घोषणा खेल मैदान में  गेंद और बल्ले से करनी थी वो एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में माइक के ज़रिए कर रहा था।
              यूं तो उनके खेल आंकड़े स्वयं ही बयान देते हैं कि वे भारतीय क्रिकेट के और खासकर छोटे प्रारूप वाली क्रिकेट के एक बड़े नहीं बहुत बड़े खिलाड़ी हैं। लेकिन उनका ये 'बड़ापन' इन आंकड़ों का मोहताज है ही नहीं। दरअसल वे आंकड़ों के नहीं उपस्थिति के खिलाड़ी हैं। उनका व्यक्तित्व इतना आकर्षक है कि वे मैदान पर अपनी उपस्थिति भर से दर्शकों के दिल में चुपके से घुस जाते हैं और फिर अपने सकारात्मक हावभाव,अथलेटिसिज्म और कलात्मक खेल से दिमाग पर छा जाते हैं। उनके चेहरे पर फैली  स्मित मुस्कान और मैदान पर उनकी गतिविधियों से इतनी पॉज़िटिव ऊर्जा निसृत होती कि दर्शकों के दिलोदिमाग उससे ऐसे आवृत हो जाते कि उन्हें कुछ और नहीं सूझता और उनके प्यार में पड़ जाते।
              वे एक आल राउंडर थे। आल राउंडर मने ऐसे खिलाड़ी जो खेल के हर महकमे में बराबर की दखल और दक्षता रखता हो। और उन जैसा खिलाड़ी एक शानदार आल राउंडर ही हो सकता था। वे आला दर्जे के कलात्मक बल्लेबाज़,अव्वल दर्जे के बेहतरीन क्षेत्ररक्षक और एक अच्छे गेंदबाज़ थे। एक खिलाड़ी के रूप में उनके व्यक्तित्व का कोई एक कुछ हद अनाकर्षक पहलू था तो वो उनका बॉलिंग एक्शन था अन्यथा उन्हें बैटिंग और फील्डिंग करते देखना अपने आप में किसी ट्रीट से कम नहीं होता। वे मोहम्मद कैफ और सुरेश रैना के साथ मिलकर क्षेत्ररक्षकों की ऐसी त्रयी बनाते हैं जिसने केवल फील्डिंग के दम पर भारतीय क्रिकेट की तस्वीर बदल दी। सन 2000 के बाद से क्रिकेट की सफलताओं में फील्डिंग का भी उतना ही योगदान है जितना बैटिंग और बॉलिंग का और निसंदेह इसके श्रेय का बड़ा हिस्सा युवराज के खाते में आता है। युवराज पॉइंट गली या कवर के क्षेत्र में एक ऐसी अभेद्य दीवार थे जिसे किसी भी बैट्समैन के लिए भेद पाना दुष्कर होता था। वे चीते की फुर्ती से गेंद पर झपटते और बल्लेबाजों को  क्रीज के बिल में ही बने रहने को मजबूर कर देते और यदि गलती से गेंद  हवा में जाती तो उसका पनाहगाह सिर्फ उनके हाथ होते। और जब बल्ला उनके हाथों में होता तो बाएं हाथ से बल्लेबाज़ी की सारी एलिगेंस मानो उनके खेल में साकार हो उठती। वे बॉल के जबरदस्त हिटर थे और पावर उनका सबसे बड़ा हथियार। एक ओवर में छह छक्के और 12 गेंदों में फिफ्टी उनके हिस्से में नायाब रिकॉर्ड हैं। लेकिन उनकी पावर हिटिंग  रॉ नही थी।उसमें अद्भुत लालित्य और कलात्मकता होती। वो इस कदर मंजी होती कि देखने वाले को उनके चौके छक्के बहती हवा से सहज लगते।मानो उसमे शक्ति लगाई ही नहीं। उनके कवर में पंच आंखों के लिए ट्रीट होते और और उनके पसंदीदा पुल शॉट नायाब तोहफा। 
          वे जब भी मैदान में होते गतिशील रहते,वे अदम्य उत्साह शक्ति से भरे होते, ऊर्जा उनसे छलक छलक जाती।ये उन जैसे खिलाड़ी का ही माद्दा था जो कैंसर जैसी बीमारी से लड़कर  खेल में शानदार वापसी कर सका। मां बाप के अलगाव की त्रासदी से जूझते हुए वे जिस व्यक्तित्व और और खिलाड़ी के रूप में उभरते हैं और भारतीय क्रिकेट परिदृश्य पर छा जाते हैं वो अपने आप मे बेमिसाल है।
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खेल मैदान से अलविदा भारतीय क्रिकेट के युवराज।बहुत आए और गए पर 'तुमसा नहीं देखा'।

Saturday, 15 June 2019

क्वाही का जादू बनाम चोटों का दंश



लगभग 15 दिन पहले जब एनबीए फाइनल्स गोल्डन स्टेट्स वारियर्स और टोरंटो रप्टर्स के बीच होना तय पाया गया था उस समय बास्केटबॉल के सभी बड़े विशेषज्ञ और जानकार ये अटकललें लगा रहे थे की 'बेस्ट ऑफ सेवन' का फाइनल्स आखिर कितने गेमों में खत्म हो जाएगा।ज़्यादातर विशेषज्ञों का मानना था कि ये फाइनल्स 6 गेमों में समाप्त होगा।और अमेरिका के कैलिफोर्निया के ओरेकल एरीना में बृहस्पतिवार की रात्रि में रप्टर्स टीम वारियर्स को 114 के मुकाबले 110 अंको से हराकर एनबीए 2019 का समापन किया तो विशेषज्ञों के अटकलें सच्चाई में तब्दील हो गईं थीं।बस फ़र्क़ सिर्फ इतना था कि जीतना वारियर्स को था जीत रप्टर्स गई।
दरअसल रप्टर्स लगभग आधी रात को जब 4 के मुकाबले 2 गेमों से वारियर्स को हराकर एनबीए के नए चैंपियन बन रहे थे तो तो वे वहां से हज़ारों मील दूर टोरंटो में खुशियों और उत्साह का सवेरा ला रहे थे। ये पहला अवसर था जब लैरी ओ ब्रायन ट्रॉफी देश से बाहर की यात्रा कर रही है।टोरंटो रप्टर्स एकमात्र विदेशी फ्रेंचाइजी है और इसके 24 साल के इतिहास में पहली बार टीम फाइनल्स में पहुंची और ट्रॉफी अपने नाम की।
12 महीने पहले लियोनार्ड क्वाही के फ्री एजेंट हो जाने के बाद जब रप्टर्स ने सान एंटोनियो स्पर्स से अपने लिए ट्रेड किया तो शायद ही किसी को ये अनुमान हो कि वे एक इतिहास की निर्मिती करने जा रहे हैं। वे उन्हें उनके शानदार खेल के लिए फाइनल्स का एमवीपी (मोस्ट वैलुएबल प्लेयर) घोषित किया गया तो ऐसा करने वाले एनबीए इतिहास के अब्दुल जब्बार क्रीम और लेब्रोन जेम्स के बाद ऐसे तीसरे खिलाड़ी थे जो दो अलग अलग टीमों से फाइनल्स  एमवीपी घोषित किया गया।दरअसल उन्होंने अपने खेल की शानदार कलाओं से वारियर्स के किले थॉम्पसन,डुरंट और स्टीफन करी की कलाओं की चमक को इस कदर फीका कर दिया कि खुद तो पूर्णिमा के चाँद से एनबीए के आसमान में छा गए और बाकी खिलाड़ी दूज और तीज की चंद्र कला भर से रह गए।  इतना ही नहीं जब क्वाही जब रप्टर्स को जॉइन कर रहे थे उन्होंने शहयड ही सोचा होगा कि वे एक इतिहास को दोहराते हुए एक उम्मीदों के  बड़े संहारक के रूप में स्थापित हो जाएंगे। 2012 में वे सान एंटोनियो स्पर्स की और से फाइनल्स मियामी हीट के विरुद्ध खेल रहे थे। मियामी हीट में उस समय लेब्रोन जेम्स और ड्वाने वेड जैसे खिलाड़ी खेल रहे थे। उस समय स्पर्स ने हीट को हराकर लगातार तीसरे साल चैंपियन बनने से रोक दिया था।और आज ठीक उसी तरह का कारनामा दोहरा रहे थे वारियर्स को लगातार तीसरे साल और पिछले पांच ससलों में चौथी बार चैंपियन बनने से रोक दिया।
इसमें कोई शक नही रप्टर्स की ये जीत जितनी क्वाही,सीएकम,लारी और मार्क गसोल के खेल की वजह से है उतनी ही वारियर्स के सबसे उम्दा खिलाड़ी दो बार के एमवीपी केविन डुरंट तथा अन्य खिलाड़ियों की चोट के कारण भी है। पर आदुनिक खेलों में चोट एक अनिवार्य चीज है और जीत तो जीत होती है।एनबीए को एक नया चैंपियन मुबारक।

Monday, 10 June 2019

राफा द गैलक्टिको ऑफ टेनिस




राफा द 'गैलक्टिको' ऑफ टेनिस
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राफेल नडाल के 12 वीं बार 'कूप डी मस्केटीएर' ट्रॉफी जीतने के बाद उनसे हारने वाले युवा थिएम कह रहे थे 'राफा हमारे खेल के लीजेंड हैं और ये (12बार फ्रेंच ओपन जीतना) अवास्तविक(unreal) है , तो राफा को  मस्केटीएर ट्रॉफी प्रदान करने के बाद रॉड लेबर ने ट्वीट किया कि 'ये विश्वास से परे(beyond belief) है।' दरअसल राफा का उस समय वहां होना ही अपने आप मे अविश्वास से परे होना था। वे पीले रंग की टी शर्ट पहने थे। जैसे ही जीते तो पीठ के बल कोर्ट पर लेट गए।और वे जब उठे तो लाल मिट्टी उनकी पीली शर्त पर लिपटी थी। उस समय राफा अस्त होने से ठीक पहले के सूर्य के समान लग रहे थे जिसकी स्वर्णिम आभा दिन भर की ओजपूर्ण परिश्रम के कारण रक्तिम आभा में बदल जाती है। उस रक्तिम आभा वाले सूर्य को उस मैदान में खड़े देखना वास्तव में अविश्वसनीय था जिसके खेल के प्रकाश में टेनिस खेल के आकाश के सारे तारे छुप जाते हैं। बिला शक वे 'किंग ऑफ क्ले' है,मिट्टी की सतह के खेल साम्राज्य के चक्रवर्ती सम्राट जिसकी जीत के अश्वमेध अश्व को पकड़ने की हिम्मत ना तो फेडरर और जोकोविच जैसे पुराने यशश्वी सम्राटों में है और ना थिएम,सितसिपास और ज्वेरेव जैसे युवा राजकुमारों में। ऐसा प्रतीत होता है कि फिलिप कार्टियर मैदान की लाल मिट्टी से उनका इतना  आत्मीय लगाव है की वो भी उनके रक्त की तरह उनमें अतिशय उत्साह की ऑक्सीजन से युक्त कर राफा को अपराजेय बना देती है। भले ही रियल मेड्रिड मेरी सबसे नापसंद टीम रही हो पर उनका एक फ्रेज तो अपने सबसे पसंदीदा खिलाड़ी के लिए उधार लिया ही जा सकता है।दरअसल वे टेनिस के 'गैलेक्टिको' हैं। सबसे अलग। सबसे सुपर।
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राफा को फ्रेंच ओपन की 12वीं और ग्रैंड स्लैम की कुल 18वीं जीत की बहुत मुबारकां।

Sunday, 9 June 2019

ये मृत्यु का महाउत्सव था



ये मृत्यु का महाउत्सव था
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(आज आईएमए द्वारा पासिंग आउट परेड आयोजित की गई जिसका आकाशवाणी देहरादून द्वारा सजीव प्रसारण किया गया। मैं भी आकाशवाणी टीम का सदस्य था और इस महत्वपूर्ण आयोजन को देखने का सुअवसर मिला।इस दौरान कारगिल समेत तमाम युद्धों में वीरगति को प्राप्त होने वाले जवान होंट करते रहे)

किसी भी संस्था के प्रशिक्षुओं का अपनी उपाधि प्राप्त करने या प्रशिक्षण समाप्त करने के बाद खुशी मनाना स्वाभाविक है और उनके नियोक्ताओं द्वारा उन्हें समारोहपूर्वक विदा म भी। सिर्फ इसीलिए नही कि उन्होंने अपना लक्ष्य सफलतापूर्वक पूरा किया है बल्कि इसलिए भी कि वे एक ऐसी दुनिया में प्रवेश जहां उनके सपने साकार रूप होने जा रहे होते हैं। जहां उनके सपनों को पंख लगने जो हैं और उनकी उड़ान के लिए अनंत आकाश है। वे जीवन को भरपूर जीने जा रहे हैं। वो जीवन का उल्लास है। वे जीवन का उत्सव मनाया रहे होते हैं।

पर क्या वास्तव में  जीवन के इस उल्लास का उत्सव आईएमए के ये प्रशिक्षु भी मनाते हैं,वे प्रशिक्षु जो युद्ध के लिए प्रशिक्षित होते हैं,जो युद्ध की रणनीतियों में दक्षता हासिल करते हैं।युद्ध जो विनाश का पर्याय हैं। युद्ध जो मृत्यु का सहोदर है। वे तो नियति से वायदा करते हैं। वायदा किसी भी परिस्थिति में मृत्यु को गले लगाने का। युद्ध को सीखते और उसमें निष्णात होते जाने की प्रक्रिया में वे युद्ध की निस्सारता को समझ रहे होते होंगे और उसी प्रक्रिया में ज़िन्दगी के सबसे बड़े सत्य से भी परिचित हो रहे होते होंगे।वे जान रहे होते होंगे कि जीवन तो मिथ्या है।मृत्यु ही एकमात्र सत्य है। और जब वे प्रशिक्षण के बाद जीवन की कर्मभूमि में उतर रहे जोते हैं तो निश्चित ही जीवन का नही मृत्यु का महा उत्सव मना रहे होते होंगे। बिल्कुल आम भारतीय जैसे।जैसे वो सुख दुख में समदर्शी रहता है। वो दुख में भी सुख की तरह उत्सव मनाता है।वो पूर्णिमा के उजाले की तरह अमावस की स्याह रात का उत्सव भी मनाता हैं। और मृत्यु का मूल राग करुणा का राग है।और जब ये प्रशिक्षु महा उत्सव मना रहे होते हैं तो तमाम उल्लास,हर्ष,उत्साह,खुशियों और मुस्कराहटों के बावजूद एक करुण संगीत नेपथ्य में तैर रहा होता है एक ऐसा करुण संगीत जो हर पल आपको हर जगह मृत्यु की उपस्थिति का एहसास करा रहा होता है। हाँ ये ज़रूर होता है कि आपकी देशप्रेम की अमूर्त भावना वहां उपस्थित स्थूल उपादानों से मिलकर हिलोरें मारने लगती है।
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क्या युद्ध इतने ज़रूरी होते हैं और उनके बिना भी कोई दुनिया संभव है।


Friday, 17 May 2019

ये रंगों का बयान है


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टेस्ट मैच क्रिकेट खेल का मूल प्रारूप है। पांच दिन का ये प्रारूप इस खेल का सबसे शांत,उबाऊ और नफासत से भरा है जिसमें खिलाड़ी सफेद कपड़े पहनते हैं। ये रंग खेल के उस प्रारूप का सबसे प्रतिनिधि रंग है। मैदान में घास को छोड़कर सफेद जूतों व कपड़ों और हल्के क्रीम कलर या ऑफ व्हाइट कलर के बल्लों और विकटों के बीच बस एक ही चटख  लाल रंग होता है गेंद का। इस प्रारूप में सफेद रंग के बीच जिस अनुपात में लाल रंग होता है,मैदान में बस उतना ही रोमांच और उत्साह होता है।

 फिर टेस्ट क्रिकेट की नीरसता को तोड़ने के लिए सीमित ओवरों वाला एकदिवसीय प्रारूप आया। अब क्रिकेट में गज़ब के  रोमांच और उत्साह का समावेश हो गया। नफासत की जगह भदेसपन लेने लगा। भद्रजनों का खेल आमजनों का खेल होने लगा। तो इसी के साथ रंगों का अनुपात भी बदल गया। मैदान में रंग बिखरने लगे। सफेद कपड़े रंगीन कपड़ों में बदल गए और बॉल का रंग लाल से सफेद हो गया। अब रंगीन कपड़ों के बीच जिस अनुपात में बॉल का सफेद रंग होता है मैदान में नीरसता की भी बस उतनी ही गुंजाइश बची रह गई।

लेकिन शायद अभी भी एक कमी बाकी थी। इन रंगों में चमक की कमी थी,रंगों में ग्लेज़ नही था क्योंकि खेल के रोमांच और उत्साह में ग्लैमर की कमी थी। तब फटाफट प्रारूप टी ट्वेंटी आया।इसमें रोमांच,जोश,जुनून और गति का विस्फोट हुआ और ग्लैमर का समावेश हुआ तो कपड़ों के थोड़े फीके और कम चमक वाले रंग चटक होने लगे,रंगों की चमक और ग्लेज़ सहसा ही जोश और जुनून के अनुपात में बढ़ गया।
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क्या ही कमाल है कि रंग क्रिकेट के क्रमिक  बदलाव के सबसे गाढ़े प्रतीक हैं। निसंदेह ये देखना रोचक होगा कि आगे इसके और छोटे होते प्रारूप पर रंग कैसे अपना बयान बदलेंगे।

Monday, 6 May 2019

कि हमने एक मिथक बनते देखा है






कि हमने एक मिथक बनते देखा है
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30 जून 2018 को रूस के कजान स्टेडियम में फुटबॉल विश्व कप के दूसरे दौर में ही फ्रांस ने अर्जेंटीना को हराकर बाहर कर दिया। मैच समाप्त होने के बाद एक खिलाड़ी उदास सा धीमे धीमे कदमों से बाहर जा रहा था। उसने एक बार भी पीछे मुड़कर नहीं देखा। ये लियोनेस मेस्सी थे। दरअसल ये किसी खिलाड़ी का जाना नहीं था बल्कि करोड़ों फुटबॉल प्रेमियों के इष्ट देवता का समय से पूर्व रूठ कर जाने जैसा था। अब आप ही सोचिए अगर कोई गणपत बप्पा को चतुर्थी के दिन अपने घर स्थापित करता है तो फिर अनंत चतुर्दशी के दिन विधि विधान से विसर्जित करता है ना या फिर नवरात्र में दुर्गा की स्थापना करता है तो नवमी की पूजा के बाद ही विसर्जित करते हैं ना। तो फिर मेस्सी 15 जुलाई से पहले बिना जुले रीमे ट्रॉफी के बैगर कैसे जा सकता था। पर ऐसा हुआ। मेस्सी को समय से पहले ही रुखसत होना पड़ा। शायद मेस्सी की अनचाही विदाई के दुख के कारण बहते आंसुओं से ही उस दिन कज़ान के वातावरण में कुछ ज़्यादा नमी रही होगी,कराहों से हवा में सरसराहट कुछ तेज हुई होगी,हार की तिलमिलाहट से सूरज का ताप कुछ अधिक तीखा रहा होगा,दुःख से सूख कर मैदान की घास कुछ ज़्यादा मटमैली हो गयी होगी और कजान एरीना से बाहर काजिंस्का नदी वोल्गा नदी से गले लग कर जार जार रोई होगी।

लेकिन बीते बुधवार को कैम्प नोउ के मैदान में मेस्सी के जादू को देखकर बार्सिलोना में ही नही बल्कि कजान की धूप में भी मुलामियत पसर गई होगी,हवा में मुस्कराहटों का संगीत तैर गया होगा,मैदान की घास फिर से हरी हो गई होगी और हां कजिंस्का नदी फिर वोल्गा के गले लगी होगी और इस बार खुशी के आंसू बहाए होंगे।
दरअसल इस शाम बार्सिलोना एफ सी की टीम अपने मैदान कैम्प नोउ में चैंपियंस लीग के सेमीफाइनल के पहले चरण के मैच में लिवरपूल की टीम को होस्ट कर रही थी। पिछले विश्व कप की असफलता को भुला कर मेस्सी इस सीजन अपने पूरे रंग में आ चुके थे। और अब मैच दर मैच अपना जादू बिखेरा रहे थे। इस मैच से पहले वे इस सीजन 46गोल कर चुके थे। बार्सिलोना को स्पेनिश लीग का खिताब दिला चुके थे। और....और इस मैच में अपने खेल के जादू से पिछले साल की उपविजेता लिवरपूल की टीम को लगभग बाहर ही नहीं कर रहे थे बल्कि दर्शकों को हिप्नोटाइज़ कर रहे थे और अपने खेल कैरियर का एक और लैंडमार्क स्थापित कर रहे थे। जब 75वें मिनट में अपना पहला और टीम का दूसरा गोल कर रहे थे तो ये अपने क्लब के लिए 599वां गोल था। और उसके बाद 83वें मिनट में मेस्सी का ट्रेडमार्क गोल आया। उनका 600वां गोल दरअसल इससे कम शानदार नहीं ही होना चाहिए था। ये एक फ्री किक थी। वे 35 मीटर दूरी से गोल के लगभग बाएं पोल के सामने से किक ले रहे थे। सामने चार विपक्षी खिलाड़ियों की मजबूत दीवार। गोल पर सबसे महंगे और शानदार गोलकीपर एलिसन मुस्तैद। ये एक असंभव कोण था। लेकिन मेस्सी के लिए नहीं। मेस्सी ने किक ली। बॉल एक तीव्र आर्च बनाती हुए सामने खिलाड़ियों की दीवार के सबसे बाएं खिलाड़ी के ऊपर से गोल पोस्ट के पास जब पहुंची तो एक क्षण को लगा कि बॉल गोलपोस्ट से बाहर। पर ये क्या! बॉल तीक्ष्ण कोण से दांई ओर ड्रिफ्ट हुई और गोल के ऊपरी बाएं कोने से होती हुई जाल में जा धंसी। ये गोल नहीं था। एक खूबसूरत कविता थी जिसे केवल मेस्सी के कलम सरीखे पैर फुटबॉल के शब्दों से विपक्षी गोल के श्यामपट पर लिख सकते थे। दरअसल कोई एक चीज कला और विज्ञान दोनों एक साथ कैसे हो सकती है,इसे मेस्सी के फ्री किक गोलों को देखकर समझा जा सकता है। वे विज्ञान की परफेक्ट एक्यूरेसी के साथ अद्भुत कलात्मकता से अपनी पूर्णता को प्राप्त होते हैं। इस गोल के बाद एक खेल पोर्टल जब ये ट्वीट करता है कि "लिटिल जीनियस डिफाइज लॉजिक" तो आप समझ सकते हैं क्या ही खूबसूरत गोल रहा होगा।और 600 गोल के लैंडमार्क को प्राप्त करने के लिए इससे कम खूबसूरत गोल की दरकार हो सकती है भला।
ओह ! लव यू मेस्सी !
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दरअसल जब आप मेस्सी को खेलते देख रहे होते हैं तो एक खिलाड़ी को,एक फुटबॉल जीनियस या लीजेंड भर को नहीं देख रहे होते हैं बल्कि भविष्य के एक मिथक को बनते महसूस कर रहे होते हो। जब इस मैच को देखने के बाद गैरी लिनेकर जैसा फुटबॉलर ये कह सकता है कि 'मैं इतना भाग्यशाली हूँ कि अपने ग्रैंड चिल्ड्रेन्स को बता पाऊंगा मैंने मेस्सी को खेलते देखा है" तो आप भी अपने को सौभाग्यशाली मानिए कि आपने मेस्सी को खेलते देखा है,कि फुटबॉल के मैदान में एक मिथक को बनते देखा है।