Saturday, 16 June 2018

विश्व कप फुटबॉल 2018_2

कम ऑन मेस्सी!अब तुम्हारी बारी है!हम जानते हैं तुम कर सकते हो! 
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फीफा वर्ल्ड 2018 की और विशेष तौर पर एक मेज़बान लिए इससे बेहतर शुरुआत और कुछ नहीं  हो सकती थी। संक्षिप्त  लेकिन शानदार उद्घाटन समारोह के बाद जिस तरह से विश्व रैंकिंग में 70वीं पायदान वाली और इस कप की सबसे निचली रैंकिंग वाली रूस की टीम ने अपने से ऊँची रैंकिंग वाली (67वीं) टीम सऊदी अरब  खिलाफ गोलों की जैसी आतिशबाज़ी की वो ये बताने के लिए पर्याप्त था कि ये विश्व कप कैसा होने जा रहा है। उसने सऊदी अरब को 5-0 से रौंद कर उन आलोचकों को भी करारा जवाब दिया जो कह रहे थे कि ये रूस की अब तक की सबसे कमज़ोर टीम है। लेव याशिन जैसे महानतम गोलकीपर वाली इस टीम में अभी भी बहुत कुछ बचा है। स्थानापन्न चेरीशेव ने दो शानदार गोल कर बताया कि वे चोटिल स्टार प्लेमेकर जागोेव के विकल्प हो सकते हैं,तो गोलोविन ने अंतिम क्षणों में फ्री किक से गोल  चमत्कृत कर डेविड बेकहम और मेस्सी की याद दिला दी। पहले दिन के इस मैच ने जो मोमेंटम बनाया वो अगले दिन उरुग्वे-मिस्र और ईरान-मोरक्को मैच में बना रहा। पर इसका चरम स्पेन-पुर्तगाल मैच में आकर मानो ठहर गया हो। ये एक क्लासिक मैच था जिसमें वैसा फुटबॉल था जिसके लिए वर्ल्ड कप जाना जाता है,जिसके लिए दुनिया दीवानी है। 3-3 की बराबरी पर छूटे इस मैच में वो सब कुछ था जो फुटबॉल में होता है या हो सकता है । 90 मिनट में 6 गोल। वाओ औसतन हर 15 मिनट में गोल। और 4 मैचों में 13 गोल। वाह ये भी शानदार। 

             दरअसल 3-2 से 88वें मिनट तक बढ़त लिए हुए स्पेन की टीम और उसकी जीत के बीच में क्रिश्चियानो रोनाल्डो थे।  उस समय उन्होंने फ्री किक से शानदार गोल करके पुर्तगाल को बराबरी पर ला दिया।रोनाल्डो ने हैट्रिक की। ये उनके अंतर्राष्ट्रीय मैच में 46वें किक पर गोल था। इससे पहले 45 किक जाया गए थे। 
                रोनाल्डो ने तो कर दिखाया। कम ऑन मेस्सी। हम रोनाल्डो से नहीं तुमसे चाहते है वो सब जो और कोई भी कर सकता है और वो भी जो और कोई भी  नहीं कर सकता। जो अब तक बार्सिलोना के लिए किया है वो भी और वो भी जो अभी तक अर्जेंटीना के लिए नहीं कर सके हो। तुम्हारे हाथ में फीफा वर्ल्ड कप ट्रॉफी देखने सुन्दर दृश्य इस वर्ल्ड कप नहीं तो नहीं हो सकता। समय हाथ रेत की तरह फिसल रहा है।  अंतिम मौक़ा है। कम ऑन मेस्सी ! हम जानते हैं तुम कर सकते हो ! 
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विश्व कप फुटबॉल 2018_2 

Tuesday, 12 June 2018

लाल बजरी के चक्रवर्ती सम्राट का अश्वमेध यज्ञ जारी है







              लाल बजरी के चक्रवर्ती सम्राट का अश्वमेध यज्ञ जारी है 
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                         कई बार किसी व्यक्तित्व और उसकी उपलब्धियों के लिए बड़े शब्द भी अपूर्ण से लगने लगते हैं। जब आप राफेल नडाल को 'किंग ऑफ़ क्ले' कहकर सम्बोधित करते हो तो किंग शब्द ही छोटा महसूस होने लगता है।खेल की दुनिया में और खासकर टेनिस की दुनिया में 'राफा' और 'क्ले' एक दूसरे के पूरक हैं। एक है तो दूसरा है। एक के बिना मानो दूसरे का कोई अस्तित्व ही नहीं।  मोंटे कार्लो से लेकर पेरिस के रोलां गैरों तक लाल /भूरी मिट्टी पर खेल का जो साम्राज्य है,दरअसल राफेल नडाल उसके चक्रवर्ती सम्राट है। एक ऐसा अपराजेय सम्राट जिसकी कीर्ति चारों दिशाओं में फ़ैली है और जिसने अपनी इस कीर्ति को अनंत समय तक बनाये रखने के लिए एक अश्वमेध यज्ञ शुरू किया हुआ है। इस यज्ञ का अश्व यानी उनका खेल निर्मुक्त निर्द्वन्द समय की सीमाओं को लाँघता चला जा रहा है जिसे बांधने की शक्ति या हुनर किसी में है ही नहीं।
                          11 फ्रेंच ओपन,11मोंटे कार्लो ओपन,11 बार्सेलोना,8 रोम मास्टर्स और डेविस कप के क्ले पर खेले हर मैच में जीत। ये आंकड़े अपने आप में अविश्वसनीय लगते हैं। फ्रेंच में उनका रिकॉर्ड 86-2  का है यानी यहां खेले 86 में से केवल 2 मैच हारे। इस रविवार जब वे फिलिप कार्टियर कोर्ट में डोमिनिक थिएम के खिलाफ फाइनल खेलने उतरे तो ये उम्मीद थी कि ये एक ज़ोरदार मुक़ाबला होगा क्योंकि पिछले दो सालों में क्ले कोर्ट में जिस खिलाड़ी से दो बार हारे वो और कोई नहीं थीएम ही थे। पिछले साल रोम मास्टर्स में और इस बार मेड्रिड ओपन में। लेकिन अपने 11वे फ्रेंच आपने ग्रैंड स्लैम के लिए उन्होंने थीएम को 64,6-3,6-2 से लगभग रौंद ही डाला। 

                स्पेन एक ऐसा देश है जिसमें एक लाख से भी ज़्यादा क्ले कोर्ट हैं।वे बचपन से उस पर खेलते आये हैं। आखिर मिट्टी पर खेल नडाल के खून में जो है। वे उस मिट्टी के कण कण से वाक़िफ़ हैं।वे उसमें और मिट्टी उनमे रच बस गयी है। इसीलिए उसके मिज़ाज़ को उनसे बेहतर कौन समझ सकता है। उसका व्यवहार ही उन्हें और उनके खेल को रास आता है। मिट्टी की सतह पर घास या कृत्रिम सतह की तुलना में रूक कर थोड़ा धीमी आती है। जिससे उनकी चपलता और फुर्ती को गेंद पर नियंत्रण बनाने में आसानी होती है और उसके बाद वे अपने ट्रेडमार्क मारक टॉप स्पिन फोरहैंड शॉट खेलते हैं। टॉप स्पिन गेंद टप्पा खाने के बाद तेजी से आगे की ओर स्किट करती है और थोड़ा ज़्यादा ऊंची भी आती है जिसका कोई जवाब विपक्षी खिलाड़ी के पास नहीं होता। वे ना गेंद को और ना खेल को नियंत्रित कर पाते हैं। लाल सतह पर राफा के नियंत्रण को इस तथ्य से समझा जा सकता है कि 17 और 18  में फ्रेंच ओपन में केवल एक सेट खोया इस साल के क्वार्टर फाइनल में स्वार्त्ज़मान के खिलाफ। दरअसल उनका खेल इतना लयबद्ध होता है मानो अपने इस कभी ना ख़त्म होने वाले अश्वमेध यज्ञ में मंत्रोचार कर रहे हों। उनके खेल की आभा सूरज की तरह इतनी दीप्त होती है कि उसकी रोशनी में बाकी कुछ नहीं सूझता।  
    











Saturday, 9 June 2018

वारियर्स




इस जून आसमान से तो ठीक वैसी ही आग बरस रही है जैसी उम्मीद थी। पर ज़मीन से जिस आग के निकलने की उम्मीद थी,वैसी निकली नहीं। खेल के मैदान में खिलाड़ियों के कौशल,हुनर,जोश और ज़ज्बे की टकराहटों से निकली आग में वो तपिश महसूस ही नहीं हुई। अगर पेरिस के रोलां गैरों की लाल मिट्टी पर नडाल केवल एक सेट की कीमत पर फाइनल में पहुँच गए तो एनबीए का फाइनल 'एंटी क्लाईमैक्स' का और दो देसी कहावतों 'अकेला चना भाड़ नहीं फोड़ सकता' तथा 'संगठन में ही शक्ति है' का महज़ एक नैरेटिव बन कर रह गया।


                                                      आज सुबह जब क्वीकें लॉन्स एरिना के सेंटर कोर्ट में लेब्रोन जेम्स की अगुआई में क्लीवलैंड कैवेलियर्स की टीम बेस्ट ऑफ़ सेवन के फाइनल्स के चौथे गेम में खेलने उतरी होगी तो उसके दिमाग में लैरी ओ ब्रायन ट्रॉफी से ज़्यादा अपना सम्मान बचाने की चिंता रही होगी। वे सीरीज में 3-0 से पिछड़ रहे थे।दूसरी और वारियर्स ये गेम जीत कर ट्रॉफी पर पिछले चार सालों में तीसरी बार और लगातार दूसरी बार अपने नाम कर लेने को बेताब होंगे। अंततः बाज़ी वारियर्स ने मारी और 108-85 से जीत कर लगभग एकतरफा मुक़ाबले में कैवेलियर्स को 4-0  से हरा दिया।पिछले चार सालों से एनबीए फाइनल्स का ठिकाना क्वीकें  लॉन्स और ओरेकल एरिना के सेंटर कोर्ट ही होते आये हैं। 2014-15 और 2015-16 के पहले दो मुकाबले जहाँ इन दो टीमों के साथ साथ स्टीफन करी और लेब्रोन जेम्स के मध्य प्रतिद्वंदिता के लिए भी याद किये जाते हैं तो 2016-17 का मुकाबला केविन डुरंट  और लेब्रोन जेम्स की ऐतिहासिक प्रतिद्वंदिता के लिए याद किया जाता है। लेकिन 2017-18 के इस सीजन में ये मुकाबला एनबीए के समकालीन इतिहास की सबसे शानदार टीम गोल्डन स्टेट वारियर्स और महानतम खिलाड़ी लेब्रोन जेम्स के बीच तब्दील हो गया था। 


                             जेम्स का ये लगातार आठवां और कुल मिलाकर नवां फाइनल्स था। उन्होंने अकेले अपने डैम पर कैवेलियर्स को ईस्टर्न कांफेरेंस के फाइनल में ही नहीं पहुँचाया बल्कि उसे जीता कर एक बार फिर फाइनल्स में वारियर्स के मुक़ाबिल कैवेलियर्स को खड़ा कर दिया। फाइनल्स के पहले ही मुकाबले में जब खेल अतिरिक्त समय तक पहुंचा तो लगा मुकाबले की तपिश बहुतों को झुलसा देने वाली है। लेकिन यहां एंटी क्लाइमेक्स होता है और अगले तीन तीन गेम में कैवेलियर्स आत्म समर्पण कर देती है। ऐसा लगने लगा टीम का बोझ अकेले ढ़ोते ढ़ोते मानो लेब्रोन की सांस फूल गयी हो। उनका मुकाबला  करी,थॉम्पसन,डुरंट और ड्रेमोन्ड ग्रीन की अभेद्य दीवार से था और इस दीवार को भेद पाना उनके अकेले के बस की बात नहीं था। वारियर्स ने कैवेलियर्स को हराकर बताया कि टीम गेम में कोई एक खिलाड़ी मायने नहीं रखती बल्कि पूरी टीम का प्रयास मायने रखता है।
फिलहाल इस सुनहरी टीम को सुनहरी सफलता की सुनहरी बधाई।

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 और हाँ, नियति बेजाँ क्रूर भी होती है। 2012 में लेब्रोन मियामी हीट्स के लिए खेल रहे थे और डुरंट ओकलाहामा सिटी थंडर्स के लिए।उस समय लेब्रोन ने डुरंट को अपनी पहली रिंग से वंचित कर दिया था। समय बदला।डुरंट  2016-17 में वारियर्स  की टीम में शामिल हुए और एक बार फिर फाइनल्स में लेब्रोन के मुक़ाबिल हुए। बार नियति डुरंट के साथ थी। उसने रिंग ही नहीं जीती बल्कि फाइनल्स के एमवीपी भी बने।नियति यहीं नहीं रुकी।डुरंट ने पिछले साल वाला कारनामा फिर दोहराया।लेब्रोन के मुक़ाबिल एक और रिंग जीती,एक बार फिर फाइनल्स के एमवीपी करार दिए गए। 
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पर ! आह,ये क्या ! रोलां गैरों के फिलिप कार्टियर मैदान पर स्लोअने स्टीफेंस की हार ! इस हार ने तो मानो वारियर्स की जीत की तपिश को मंद ही कर दिया। पर विश्वास है कल नडाल की जीत इस कमी की भरपाई कर पाएगी। और विशवास मानिये नडाल की लाल बजरी पर 11वीं जीत के बाद कल फिर यहीं आपसे मुलाक़ात होगी। 

Tuesday, 29 May 2018

तेरे काँधे का जो तिल है

    
 तेरे काँधे का जो तिल है 
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त्रयी मिल कर ख्वाबों का एक अम्बर रचती है।जिसमें यूँ तो हर युवा चाहतों की उड़ान भरता है पर निम्न मध्यम वर्ग का युवा तो अपना अक्स ही खोजने लगता है।मोहब्बत का हर उपमान है इसमें। खुशियां हैं,ग़म हैं। अम्बर है,समंदर है।तिल है,दिल है। सर्दियाँ है,गर्मियां है,बरसात है।सावन भी है और नदिया भी। कुमकुम हैं, बाली है, जुड़ा है। फूल है और भूल भी। सूरज,चाँद और तारे तो होंगे ही।हाँ, बड़े बड़े सपने और वादें नहीं हैं,बल्कि छोटी छोटी चाहतें हैं, खुशियां हैं। सर्दियों में अम्बिया की और गरमियों में मूंगफलियों की चाहत है। बरसात में धूप की इच्छा है,चेहरे पर मुस्कान की तमन्ना है और मालपुए की चाहत है।
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कलम मोहब्बत की जो रागिनी रचती है उसमें शहनाई,ढोलक और करतल लोकवाद्य उल्लास और उमंग की बारिश करते हैं तो सुर गा उठते हैं --
       'आज से मेरी सारी खुशियाँ तेरी हो गईं 
        आज से तेरे सारे ग़म मेरे हो गए.....' 
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मुनीर कौसर अपनी कलम से जिस दिल को आकार देती हैं उसे अमित त्रिवेदी अपने साज़ों से धड़कना सिखाते हैं और फिर अरिजीत उसे अपने सुरों से खुशियों के समन्दर में डुबो देते हैं।
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बॉलीवुड गीत _5 




Sunday, 20 May 2018

वो






वो 

मेरी ख़ुशी था वो 
बसाया था आँखों में 
एक रंगीन ख्वाब सा। 
एक ग़म आया 
बह गया आसूं बनकर
किसी अजनबी सा। 

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Tuesday, 17 April 2018

राष्ट्रमंडलीय खेल 2018

                          
   
         
                                    राष्ट्रमंडलीय खेल 2018
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गोल्ड कोस्ट ऑस्ट्रेलिया में समाप्त 21वें राष्ट्रमंडलीय खेलों में भारत ने 26 स्वर्ण सहित 66 पदक जीते। इन पदकों में से 12 गोल्ड सहित २७ पदक लड़कियों ने जीते। अगर मिश्रित स्पर्धाओं के पदक भी इसमें मिला दिए जाए तो ये संख्या 30 के पार पहुँच जाती है।मनु भाकर,पूनम, मीरा चानू,संजीता,साइना,मनिका,मेहुली,सिंधु,हिना,श्रेयशी,विनेश,मेरी कॉम तक तमाम लड़कियों ने शानदार प्रदर्शन किया और भारत को गौरवान्वित किया। दरअसल लड़कियों द्वारा जीते गए हर पदक के पीछे उनके जोश ज़ुनून, जज़्बे,संघर्ष,कठोर परिश्रम,उनके द्वारा देखे गए सपनों और उन सपनों के साकार करने की अलहदा अलहदा कहानी हैं। 16 वर्षीया मनु भाकर से लेकर 35 वर्षीया मेरी कॉम तक ने ये बताया कि उम्र उनके लिए सिर्फ एक नम्बर भर हैं। मनु जैसी किशोरियों ने बताया कि इस दुपट्टा ओढ़ना सीखने के बजाय दुनिया जीतने की कोशिश मायने रखती हैं तो 35 वर्षीया मेरी कॉम ने बताया जिस उम्र में वे अपनी इच्छाओं को,अपने सपनों को,अपनी काबिलियत को अपने परिवार के लिए खूंटी पर टांग देती हैं उस समय भी दुनिया जीती जा सकती है। बस अपने पर भरोसा करने की ज़रुरत भर है। उन्होंने दिखाया कि अगर हम आधी दुनिया हैं और आधी दुनिया चाहिए तो उस दायित्व को निभाने की काबिलियत भी उनमें हैं। उनके हौसलों और जज़्बे को सलाम। 
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और हाँ अगर आपकी सुनने सुनाने में भी दिलचस्पी है तो ट्यून कीजिये आकाशवाणी इलाहाबाद 292.4 मीटर /1026 किलोहर्ट्ज़ पर कल रात्रि 10 बजे खेल दर्पण जो कि कामनवेल्थ खेलों पर ही केंद्रित है। इस कार्यक्रम के मेहमान हैं पूर्व अंतर्राष्ट्रीय होके खिलाड़ी श्रीमती पुष्पा श्रीवास्तव,टेबल टेनिस कोच ज़नाब इबादुर रहमान और खेल समीक्षक और लेखक श्री राजकुमार चोपड़ा। 



Sunday, 15 April 2018

चुपके से


                                    चुपके से
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"फरवरी की सर्दियों की धूप में
मुंदी मुंदी अँखियों से देखना
हाथ की आड़ से
निमि निमि ठण्ड और आग में
हौले हौले मारवा के राग में
मीर की बात हो
दिन भी ना डूबे
रात ना आये
शाम कभी ना ढले
शाम ढले तो सुबह ना आये
रात ही रात चले"
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उफ्फ ! क्या ही कमाल है ! आखिर ये होता कैसे है ! कि दिल में लावा सी पिघली हसरतें ज़िंदगी के सफों पर दर्ज़ होती जाती हैं ! रोशनाई की जगह प्यार बूँद बूँद कलम से रिसता है और शब्द शब्द ज़िंदगी बुनती चलती जाती है... और जब ये  रिसाव साज़िन्दों की उँगलियों के इशारों पर चलते साज़ों पर नदी सा बहता हुआ किसी बालसुलभ बुनावट वाली सधी ठहरी गंभीर आवाज़ की उष्मा से भाप बन कर उड़ता है और फिर बूँद बूँद मन पर बरसता हैं तो ज़िंदगी का सागर अनगिनत कही अनकही कहानियाँ से भरता जाता है !

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गुलज़ार के शब्द शब्द भँवरे रहमान के राग राग उपवन में साधना के गले से झरते फूल फूल सुरों पर गुंजन करते हैं 'चुपके से, रात की चादर तले' !
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बॉलीवुड सांग _4 





Monday, 26 March 2018

फिर छिड़ी रात बात फूलों की

   





 फिर छिड़ी रात बात फूलों की
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   फारुख शेख बेहद उम्दा कलाकार थे। वे समानांतर सिनेमा के  ही नहीं थे बल्कि व्यावसायिक फिल्मों के भी सफल और लोकप्रिय कलाकार थे और साथ ही साथ थिएटर में भी उतने ही सक्रिय। फारुख पहली बार 1973 में बड़े परदे पर आए थे 'ग़रम हवा' में।
                              ये मोहभंग का काल था। आज़ादी के बाद जिस तरह उम्मीदें युवाओं ने की थी वो अभी भी दूर की कौड़ी थी। स्थापित संस्थाओं से उनका विश्वास उठ रहा था। व्यवस्था के खिलाफ असंतोष और गुस्सा पनप रहा था। उसी साल एक फिल्म आयी थी 'जंजीर'।अमिताभ बच्चन एक ईमानदार पुलिस इंस्पेक्टर की भूमिका निभाते हैं जो बेईमान व्यवस्था का शिकार होता है जिसके प्रति उसके मन में ज़बरदस्त आक्रोश और गुस्सा है। इसी के बूते वो व्यवस्था से टकराता है। अपनी 'एंग्री यंग मैन' की भूमिका में गज़ब के लोकप्रिय होते हैं और अगले 10  सालों में महानायक के रूप में उभरते हैं। ये मुख्य धारा के सिनेमा का सबसे लोकप्रिय ट्रेंड बनता है। 
                                  सत्तर और अस्सी के दशक में जब अमिताभ और विनोद खन्ना जैसे कलाकार 'एंग्री यंग मैन' और 'ही मैन' की छवियों के साथ धमाल कर रहे थे,फारुख शेख अपनी सौम्य सहज छवि के साथ लोकप्रिय हो रहे थे और दर्शकों के मन में घर बना रहे थे। दरअसल असंतोष और मोहभंग के उस दौर में भी मध्य वर्ग के युवाओं का एक बड़ा वर्ग उस असंतोष का हिस्सा नहीं बन पा रहा था। अर्थगत दबाव में उसके सपने बहुत बड़े नहीं थे। एक अदद नौकरी और एक छोटा सुखी परिवार उसके स्वार्थ के उच्चतम बिंदु थे जिसमें व्यवस्था से टकराने का ना तो माद्दा था और ना ही अवकाश।भावुक रोमान से भरे वे युवा अमिताभ और विनोद खन्ना से कहीं अधिक फारुख शेख की शख्सियत और उन किरदारों से अपना तादात्मय स्थापित कर पाते थे जो उन्होंने 'चश्मेबद्दूर' और 'साथ साथ' जैसी फिल्मों में निभाए थे। भोली भाली साधारण सूरत वाला ये कलाकार महान छवि की निर्मिति नहीं करता था।वो किसी और दुनिया का ना होकर वो अपने बीच का ही चरित्र लगता जिसमें वे खुद को जी सकते थे और जीते भी थे। फारुख से जुड़ाव का एक और कारण भी था। वे अपने चरित्र को अंडरप्ले करते हुए कभी भी लाऊड ना होते हुए भी अपनी साधारणता के बावजूद बहुत ग्रेसफुल और आभिजात्य से लबरेज दिखाई देते। अपनी मध्यवर्गीय पहचान को उच्च वर्गीय पहचान में तब्दील करने के आकांक्षी युवा को ये निश्चित ही आकर्षित करता था। 

                            लेकिन अभी भी फ्रेम कम्प्लीट नहीं होता है। इसमें एक अदद नायिका की कमी है। और तब नायिका के रूप में दीप्ति नवल का प्रवेश होता है। फारुख की तरह ही भोली भाली,मासूम लेकिन गरिमामय आभा से युक्त।किशोर और युवा वर्ग की आधी अधूरी कच्ची पक्की रोमानी कल्पनाओं का फ्रेम ही तब जाकर पूरा होता है जब उसमें प्रेम का रंग भरता है। इसीलिये ये एक सदाबहार जोड़ी बन जाती है और दसियों फिल्में एक साथ करते हैं।   

                       फारुख लगातार एक कलाकार के रूप में परिपक्व होते जाते हैं और 2010 में आकर उन्हें राष्ट्रीय पुरस्कार मिलता है। पर यादें तो इतनी जड़ और ढीट हैं कि सत्तर और अस्सी के दशक के फारुख ही दिल में समाए हैं किसी खिले फूल की तरह। सच में जब भी किसी बज़्म में तेरा ज़िक्र होता है तो लगता है 'फिर छिड़ी रात बात फूलों की'।
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जन्मदिन मुबारक। जहां भी रहो खुदा की इनायत रहे।


Sunday, 25 March 2018

इस बसंत


इस बसंत
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इस बसंत
तेरी याद
नरम गरम धूप सी
कभी सरसों के फूलों की
पीली नरम आंच सी
कभी पलाश के फूलों की
लाल दहकती आग सी 
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Thursday, 22 March 2018

होना




होना 
हक़ीक़त ना सही

स्वप्न बन रहो

सच ना सही

झूठ बन रहो

आस ना सही

निराशा बन रहो

फूल ना सही

शूल बन रहो

दोस्त ना सही

दुश्मन बन रहो

हर पक्ष का एक प्रतिपक्ष होता है

पक्ष ना सही
प्रतिपक्ष बन रहो
बस बने रहना
बने रहना ही
दुनिया की सबसे बड़ी नेमत

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क्या पूर्ण रूपेण निरपेक्ष भी कुछ होता है ?







Tuesday, 6 March 2018

क्रिकेट कथा वाया यादों की गलियां




 क्रिकेट कथा वाया  यादों की गलियां 
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               वर्तमान चाहे कितना भी अच्छा क्यूँ ना हो शायद ये अतीत के प्रति मोहग्रस्तता है कि अतीत कहीं बेहतर नज़र आता है। अब क्रिकेट को ही लीजिए। भारतीय क्रिकेट टीम के दक्षिण अफ़्रीकी के हालिया दौरे पर मिली शानदार सफलता के बाद आप मान सकते हैं कि ये भारत की अब तक की सर्वश्रेष्ठ क्रिकेट टीम है क्यूंकि इस प्रदर्शन ने दिखाया कि वे अपने देश की पाटा पिचों पर ही नहीं बल्कि तेज़ और उछाल वाली पिचों पर उतनी ही कुशलता के साथ खेल सकते हैं। सौरव गांगुली के साथ भारतीय क्रिकेट का जो रूपांतरण शुरू होता है उसे महेंद्र सिंह धोनी ने आगे बढ़ाया और विराट कोहली ने अपने अंजाम तक पहुंचा दिया।इन तीनों के नेतृत्व में भारतीय क्रिकेट टीम ने शानदार रिकॉर्ड जीतें दर्ज़ की हैं और वो भी खेल के हर फॉर्मेट में। 
             लेकिन इस सब के बावजूद इनमें से कोई भी जीत टेस्ट क्रिकेट में 1971 में अजित वाडेकर के नेतृत्व में इंग्लैंड में 1-0 की जीत और सीमित ओवरों के फॉर्मेट में 1983 के विश्व कप की जीत का मुक़ाबला नहीं कर सकती। आप इससे असहमत हो सकते हैं पर मेरे लिए यही सच है। 1971-72 में 7-8 साल की उम्र में उस जीत का सबक स्मृतियों पर ऐसा दर्ज़ हुआ कि बाद की कोई जीत मिटाने की तो बात छोड़िए ओवरलैप या ओवरशैडो भी नहीं कर पाई।और फिर उसके लगभग 12 वर्षों बाद 1983 के विश्व कप की जीत 1971 की जीत के समानांतर ऐसी दर्ज़ हुई कि बाद की कोई जीत उसे छू भी नहीं पाती। किसी ने उस जीत के बारे में सपने में भी नहीं सोचा होगा। शायद ख़ुद खिलाड़ियों ने भी नहीं। उसी विश्व कप में ज़िंबाबवे से लीग मैच था। भारत ने 17 रनों पर 5 विकेट खो दिए थे। तब कपिल देव ने 175 रनों की एक अद्भुत पारी खेली थी।सड़क पर एक पेड़ के नीचे सांस थाम कर वो पारी सुनी थी।उस पारी से बेहतर पारी हो सकती है क्या कोई ! उस जैसा रोमांच कोई दूसरी पारी पैदा नहीं कर सकी,यहां तक की सचिन,सहवाग और शर्मा के एक दिवसीय मैचों के दोहरे शतक भी। और फिर कोई भी स्पिनर बेदी प्रसन्ना चंद्रशेखर और वेंकट की चौकड़ी से बेहतर हो सकते हैं जब वे दोनों छोरों से गज़ब की लय के साथ बॉलिंग करते तो लगता मानो कोई तान छेड़ दी गयी हो।और फिर एकनाथ सोलकर को याद कीजिये। फॉरवर्ड शार्ट लेग पर बल्लेबाज़ से एक हाथ की दूरी पर बिना हेलमेट पहने मैच दर मैच जैसे कैच वे पकड़ते मो कैफ से लेकर रैना और कोहली तक कोई पकड़ पाता। आबिद अली याद हैं क्या आपको !दर्शकों की मांग पर जिस तरह  छक्के लगा कर जो रोमांच पैदा करते क्या सहवाग सचिन या धोनी या कोहली कर पाते!और हाँ विश्वनाथ जैसी कलात्मक और मोहिंदर जैसी सहज लयात्मक बैटिंग कोई दूसरा कर पाता ! ये कुछ उदाहरण भर हैं। सत्तर और अस्सी के दशक में बेशक़ भारतीय क्रिकेट आज जैसी बुलंदियों पर नहीं थी ,सफलता के सोपान बेहद कम थे लेकिनखेल अपनी कलात्मकता में और अपने क्लासिक मिजाज़ में बुलंदियों पर था।
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Monday, 5 March 2018

ऐसा भी कहीं होता है क्या ?

                 
                            
ऐसा भी कहीं होता है क्या ? 
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                                       अगर ऊंचा उठने के लिए ऊंचाई अनंत है तो गिरने के लिए अतल गहराई भी है। ये बात वेस्टइंडीज क्रिकेट टीम से बेहतर कौन समझ सकता है। किसी समय में अजेय समझी जाने वाली 'महान टीम' आज अपने पराभव के चरम पर है।ये टीम और कितने रसातल में जाएगी इसका अनुमान लगाना कठिन है।  दो बार की विश्व चैम्पियन वेस्ट इंडीज की क्रिकेट टीम को आईसीसी विश्व कप के लिए अहर्ता पाने के लिए अब क्रिकेट का ककहरा सीखने वाली टीमों के साथ दो दो हाथ करने होंगे। 
                       
                इस टीम का पराभव कोई एक दो दिन की परिघटना नहीं है। ये एक लम्बी प्रक्रिया है। शायद 1983 के विश्व कप के फाइनल में भारत के हाथों हार वो बिंदु है जहां से इस टीम की प्रगति का ग्राफ नीचे की दिशा में मुड़ता है। पर कहते हैं ना मरा हाथी भी सवा लाख का होता है। अगले एक दशक तक उस टीम का कोई सानी नहीं था।लेकिन उसकी श्रेष्ठता में जो सेंध लग चुकी थी उसे रोका नहीं जा सकता था।उसका पराभव निश्चित था और हुआ। लेकिन ये इस हद तक होगा इसकी कल्पना भी नहीं की थी और सच तो ये है कि इस पर आज भी विश्वास नहीं होता। दरअसल इस टीम की सफलता के चरमोत्कर्ष के समय की स्मृतियाँ मेरे दिमाग पर इस कदर हावी हैं और जड़ हो चुकी हैं कि आज की दुर्दशा भी उनको रिप्लेस नहीं कर पातीं।
                            जब भी क्रिकेट में वेस्टइंडीज का नाम आता है तो ज़ेहन में क्वींस पार्क ओवल त्रिनिदाद , किंग्स्टन ओवल बारबोदास,जार्जटाउन गुयाना ,सबीना पार्क किंग्स्टन जमैका, एंटीगुआ के उन मैदानों का अक्स उभरता है जिनमे 22 गज़ की एक खेल पट्टी होती थी जिससे दुनिया भर के बल्लेबाज़ खौफ खाते थे और ये मैदान खेल के मैदान कम और युद्ध के मैदान अधिक लगते थे। तेज़ रफ़्तार और उछाल भरी गेंदों से विपक्षी टीम के बल्लेबाज़ों का शरीर ही घायल नहीं होता बल्कि उनकी रूह भी काँप उठती। तो दूसरी ओर विपक्षी गेंदबाज़ों पर इस कदर प्रहार होता कि वे त्राहीमाम त्राहीमाम कर उठते।
                              वेस्टइंडीज क्रिकेट का मतलब मेरे लिए आज भी एंडी रॉबर्ट्स,माइकेल होल्डिंग,जोएल गार्नर,मेलकॉम मार्शल,कॉलिन क्राफ्ट,कोर्टने वाल्श होता है और इसका मतलब क्लाइव लॉयड,गॉर्डन ग्रीनिज,विवियन रिचर्ड्स,गारफील्ड सोबर्स,एल्विन कालीचरण,डेस्मंड हेंस,रिची रिचर्डसन होता है और इसका मतलब जीत और सिर्फ जीत होता है।  ये निसंदेह आश्चर्य की बात है कि जहाँ के लोगों के खून में क्रिकेट रचा बसा हो,क्रिकेट जीवन का अभिन्न अंग हो वहाँ क्रिकेट की ऐसी दुर्दशा। उफ़्फ़ कितना दुःखद और अवसाद का वायस है ये सब। जब ये सब मेरे लिए इतना पीड़ादायक है तो ज़रा सोचिये उन लोगों की जिनके जीवन में क्रिकेट इतने गहरे उतरा है कि उन्होंने 1962 में 5 साल में ही वेस्टइंडीज की 'पोलिटिकल आइडेंटिटी' के ख़त्म होने के बावजूद आज तक वेस्टइंडीज को 'क्रिकेट आइडेंटिटी' बनाये रखा है।   

  
             

Friday, 17 November 2017

रियली वी मिस यू इटली इन रशिया

                          

रियली वी मिस यू इटली इन रशिया

  'द आर्किटेक्ट' के नाम से प्रसिद्द इटली के आंद्रे पिरलो दुनिया के महानतम मिडफ़ील्डरों में से एक हैं।वे इटली की उस टीम के सदस्य थे जिसने 2006  में चौथी और आख़िरी बार फुटबॉल विश्व कप जीता था।वे 2001  से 2011 तक वे एसी मिलान के लिए खेले और सान सीरो उनका अपना पसंदीदा होम स्टेडियम था। 6 नवम्बर को जिस समय वे अपने 18 साल के गौरवशाली प्रोफेशनल कॅरियर की समाप्ति की घोषणा कर रहे थे उस समय उन्होंने सोचा भी नहीं होगा कि ठीक आठ दिन बाद 14 नवम्बर को उनका अपना सान सीरो स्टेडियम फुटबॉल महाशक्ति के रूप में अर्जित इटली के गौरव की कब्रगाह बन रहा होगा और उसकी प्रतिष्ठा धूल धूसरित हो रही होगी।केवल इटलीवासियों का ही नहीं बल्कि इटली की फुटबॉल के लाखों प्रसंशकों के भी दिल टूट रहे होंगे और वे हतप्रभ से हताश-निराश हो रहे होंगे।2018 के विश्व कप फाइनल्स में बहुत कुछ होगा पर इटली नहीं होगा। वो इटली जो फुटबॉल को जीता है और फुटबॉल में जीता है। जो अपने बेजोड़ अभेद्य रक्षण के लिए जाना जाता है। रक्षण जो 'कैटेनेसिओ' यानी 'द चेन ' के नाम से जग प्रसिद्द है। रक्षण जिसने जीनो डॉफ और बुफों जैसे गोलकीपर दिए और फ्रैंको बरेसी,पाओलो माल्दीनी,फैबिओ कैनावरो और चेलिनी जैसे डिफेंडर भी। 

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 उस दिन सान सीरो स्टेडियम में इटली की टीम 2018 के विश्व कप में खेलने की अहर्ता पाने के लिए अपना अंतिम मैच स्वीडन से खेल रही थी। स्वीडेन की टीम ने पहले चरण में स्टॉकहोम में इटली पर  1-0 की बढ़त बना ली थी और अब इटली को क्वालीफाई करने के लिए ये मैच हर हाल में जीतना था।पर मैच 0-0  से अनिर्णीत रहा। जैसे ही मैच समाप्त हुआ,75 हज़ार दर्शकों से खचाखच भरा सान सीरो स्टेडियम में गहरा सन्नाटा पसर गया,दर्शकों के चहरे शोक से मलिन हो गए,इनमें बहुत से चहरे ऐसे भी थे जिनकी आँखें अपने हीरो और इटली टीम के कप्तान 39 वर्षीय जियानलुइगी बुफों की आँखों की तरह ही बरस रही थी।बुफों इटली के ही नहीं विश्व के श्रेष्ठ गोलकीपर हैं।उनकी आँखों  से दुःख और ग्लानि बह रहे थे और ठीक वैसे ही उनके समर्थकों की आँखों से भी। इटली की टीम 1958 के बाद 60 सालों में पहली बार विश्व कप फाइनल्स की दौड़ से बाहर हो चुकी थी।

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आखिर ऐसा क्या हुआ कि रोबर्टो बैजियो,डिनो रॉस,डेल पिएरो,फैबिओ कनवारो,माल्दीनी,फ्रांसिस्को टोटी, पाओलो रोसी,डीनो जॉफ,क्रिस्चियन विएरी जैसे खिलाडी देने वाले देश की टीम को।वो शायद उनका दिन नहीं था। उस अनिर्णीत मैच में 24 के मुकाबले 76 प्रतिशत समय में गेंद पर कब्जा इटली का रहा,उन्होंने  कुल मिलाकर 27 शॉट गोल दागे और 40 क्रॉस शॉट लिए पर गोल नहीं कर पाए।   उनके पास कोई शानदार फिनिशर नहीं था और जो था उस पर कोच वेंचुरा का विश्वास नहीं था। लोरेंजो इन्सिग्ने नेपोली की टीम से खेलने वाले इटली के सबसे प्रतिभावान अटैकिंग मिडफील्डर हैं। उन्हें वेंचुरा ने स्वीडन के खिलाफ मैदान में उतारा ही नहीं और प्रथम चरण के मैच में भी उन्हें 14 मिनट खेलने का मौक़ा दिया। जिस समय टीम को जीत चाहिए थी उस समय वेंचुरा ने रक्षात्मक रणनीति अपनाई और इसी कारण वे भीषण आलोचना का केंद्र भी बने। 
                            
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दरअसल 2006 में विश्व कप जीतने के ही टीम अपने रंग में नहीं है। अगले दो विश्व कप 2010 और 2014 के लिए क्वालीफाई तो किया पर पहले  आगे नहीं बढ़ सकी। यूरोपियन कप में भी 2008 और 2016  में क्वार्टर फाइनल से आगे नहीं बढ़ सकी। 2006 के बाद एकमात्र उल्लेखनीय उपलब्धि 2012 के यूरोपियन कप के फाइनल तक पहुंचना था। जब 2016  में विश्व कप के लिए इटली ने अपना अभियान शुरू किया तो जियान पिएरो वेंचुरा को कोच बनाया जो इटली के अब तक के सबसे उम्रदराज़ कोच हैं।वे अपनी टीम को प्रेरित करने में खासे नाकाम रहे। दरअसल उनमें वो जज़्बा और जोश था ही नहीं जो टीम को प्रेरणा से भर सके। वे टीम के लिए नयी और चातुर्यपूर्ण नीति नहीं बना सके।वे नए ऊर्जावान प्रतिभाशाली खिलाड़ियों को टीम में  शामिल करने से बचते रहे  और उनकी टीम वेटेरन खिलाड़ियों से भरी रही।
                                            

बुफों जिन्होंने विश्व कप फाइनल्स के बाद संन्यास लेने की घोषणा की थी,इस हार के बाद तुरंत अपने रिटायरमेंट के घोषणा कर दी। ये अजब संयोग था कि इटली के दूसरे महान गोलकीपर  कप्तान डीनो जॉफ ने भी अपने अंतिम मैच में स्वीडन से 2-0 से हारने के बाद संन्यास की घोषणा की थी। बुफों के साथ ही डिफेंडर आंद्रे बरजागली और मिडफील्डर डेनियल डी रोस्सी ने भी खेल को विदा कह दिया। ये तीनों ही 2006 विश्व विजेता टीम के सदस्य थे। साथ ही एक और वेटेरन डिफेंडर चेलिनी ने भी संन्यास की घोषणा कर दी है।इनसे जो वैक्यूम टीम में बनेगा उसे भरने के लिए तमाम युवा और जोशीले खिलाड़ी खड़े हैं जिनमें दोन्नारुममे,गैग्लिआर्डिनि,फेडेरिको चैसा,आंद्रे कोंटीऔर लोरेंजो पैलेग्रिनी प्रमुख हैं।जो भी हो ये खेल है। खेल में उतार चढ़ाव आते रहते है।ये आशा की जानी चाहिए कि इतावली फुटबॉल के इस विध्वंस से ही पुनर्निर्माण का रास्ता निकलेगा और एक बार फिर इतावली फुटबॉल शिखर पर पहुंचेगी। 
       
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जो हो ये भविष्य के गर्त में है। फिलहाल सत्य यही है चमकीली रॉयल ब्लु रंग की जर्सी वाले मॉडल सरीखे इतावली खिलाड़ी 2018 में रूस के मैदानों में पसीना बहाते नहीं दिखाई देंगे और ना ही 'फ्रैटेली डी इटालिया' कानों में गूंजेगा। रियली वी मिस यू इटली इन रशिया 2018,वी मिस यू। 


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दास्तान-ए-फुटबॉल विश्व कप 2018_1