Sunday, 6 January 2019

खेल बनाम खेल




खेल बनाम खेल
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यूँ तो समय के पंख होते हैं। पल गुज़रा नहीं कि इतिहास बन गया। तो साल 2018 को गुज़रे 6 दिन होने को आए हैं और अब वो भी बीती बात लगता है। पर अभी इतना भी नहीं बीता कि उसकी बात ही ना हो या वो याद ही ना आए। दरअसल स्मृतियों के रेत में समय के कुछ पग इतने गहरे धंसे होते हैं कि उनके चिह्न मिटाए नहीं मिटते और उन पदचापों की अनुगूँज बहुत लम्बे समय तक स्मृतियों में गूंजती रहती हैं। इस बीते साल हमारे खिलाड़ियों ने भी मैदान के भीतर और बाहर भी बहुत कुछ ऐसा किया जिनकी अनुगूंजें स्मृतियों पर लम्बे समय तक दस्तक देती रहेंगी। फिर वो मैरी कॉम द्वारा 6 विश्व खिताब जीतना हो,पंकज आडवाणी का 21 विश्व खिताब जीतना हो,सिंधु का डब्ल्यूटीए प्रतियोगिता जीतना हो,हिमा दास का जूनियर विश्व एथेलेटिक्स में स्वर्ण पदक जीतना हो,स्वप्ना का एशियाड में हेप्टाथलन में जीत हो,युवा क्रिकेटरों द्वारा चौथी बार जूनियर विश्व कप जीतना हो या युवा पृथ्वी शॉ का शानदार प्रदर्शन हो, ये सब 2018 के खेल पृष्ठ की ऐसी इबारतें हैं जो आसानी से नहीं मिट पाएंगी। लेकिन मेरे तईं खेल के मैदान से सबसे महत्वपूर्ण घटना 'मिताली-पोवार विवाद' है।
          दरअसल भारत में  खिलाड़ियों के साथ पक्षपात,भेदभाव और अन्याय कोई नयी या अजूबी चीज नहीं है। इस तरह की खबरें आम हैं। और ये स्थानीय स्तर से लेकर राष्ट्रीय स्तर तक एक सी है। महिला खिलाड़ियों के साथ सेक्सुअल उत्पीड़न की खबरें भी इसमें शामिल हैं। लेकिन दुःख की बात ये है कि अन्याय और भेदभाव की खबरें जितनी आम हैं,उनके प्रतिकार की खबरें उतनी ही कम। इस तरह के भेदभाव या अन्याय के खिलाफ आवाज़ यदा कदा ही सुनाई देती हैं। अगर कोई आवाज़ उठी भी तो वो अंज़ाम तक पहुंची हो ऐसा उदाहरण बिरला ही होगा। और ये विवाद एक ऐसा ही बिरला उदहारण है।

           वेस्टइंडीज में नवम्बर में खेले गए आई सी सी टी20 विश्व कप में मिताली भारतीय टीम की एक महत्वपूर्ण सदस्य थीं। वे पहले तीन मैचों में प्लेइंग इलेवन में थीं। न्यूज़ीलैंड के खिलाफ पहले मैच में बल्लेबाज़ी का उनका नम्बर नहीं आया। उसके बाद पकिस्तान और आयरलैंड के खिलाफ दोनों मैचों में अर्ध शतक लगाए। तीन मैच जीतकर भारत का सेमीफाइनल में स्थान पक्का हो गया था। इसलिए ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ अंतिम लीग मैच में उनको ड्राप कर दिया गया। यहां तक तो ठीक था,पर अगला मैच इंग्लैंड के खिलाफ सेमीफाइनल मैच में भी उनको नही खिलाया गया। संयोग से ये मैच भारत हार गया। इसके तुरंत बाद सोशल मीडिया में उनकी मैनेजर  की तरफ से उनके साथ  भेदभाव के आरोप लगाए गए और इस तरह से मामले ने तूल पकड़ा। अंततः बीसीसीआई ने मामले का संज्ञान लिया। मिताली ने अपने खिलाफ लगातार उपेक्षा और भेदभाव किए जाने को तर्कपूर्ण ढंग से पेश किया। पोवार का कोच के रूप में कॉन्ट्रैक्ट आगे ना बढ़ाने का निर्णय लिया गया और डब्ल्यू वी रमन को नया कोच नियुक्त कर दिया। मिताली को एकदिवसीय टीम का और हरमनप्रीत को टी20 टीम का कप्तान बनाए रखा गया।एक प्रतिकार अपने अंजाम तक पहुंचा।  
                  दरअसल इस विवाद के कई कोण हैं एक कोण डायना एडुल्जी का है। एक दूसरा कोण हरमनप्रीत कौर का है। यही वो कोण है जिसकी वजह से ये विवाद इतना महत्वपूर्ण समझ में आता है। ये विवाद हरमनप्रीत और मिताली के बीच मनमुटाव का भी था जिसमें कोच पोवार और एडुल्जी ने हरमनकौर का साथ दिया। हरमन कौर और मिताली समकालीन भारतीय महिला क्रिकेट टीम की सबसे चमकती स्टार हैं। दोनों का भारतीय क्रिकेट को महत्वपूर्ण योगदान है। दोनों दो टीमों की कप्तान हैं। अतः ये दो बड़े व्यक्तित्वों की टकराहट है। दो बड़े खिलाड़ियों के अहम की टकराहट है। दो विपरीत मिज़ाजों के खिलाड़ियों की टकराहट है। मिताली अपेक्षाकृत बड़े फॉरमेट वाले क्रिकेट की सम्पूर्ण खिलाड़ी हैं।वे बहुत ही एलिगेंट बैट्समैन हैं। वे क्रिकेट की शास्त्रीय और इलीट परम्परा की सबसे बड़ी खिलाड़ी हैं।वे अपनी बैकग्राउंड से,अपने पहनावे,आचरण,हाव भाव,चहरे मोहरे और खेल सभी से इलीट क्लास की प्रतिनिधि खिलाड़ी हैं। जबकि हरमनप्रीत कौर अपेक्षाकृत छोटे फॉरमेट की सबसे बड़ी खिलाड़ी हैं। दरअसल वे अपने सम्पूर्ण व्यक्तित्व  और खेल से क्रिकेट के जनसाधारण स्वरुप की सबसे प्रतिनिधि खिलाड़ी हैं। वे दोनों महिला क्रिकेट की सुनील गावस्कर और कपिल देव हैं। हरमनप्रीत कौर और मिताली के बीच टकराव  80 के दशक में गावस्कर और कपिल देव के बीच की टकराहट की याद दिलाती है। जिस तरह से क्रिकेट के जन साधारण स्वरुप ने अभिजात्य स्वरुप को रिप्लेस कर दिया और गावस्कर और कपिल देव इस प्रक्रिया के एक रूपक की तरह हैं जहां अंततः कपिल ने गावस्कर से बागडोर कपिल देव के हाथ में आई।ठीक वैसे ही  जल्द ही हरमनप्रीत कौर मिताली को रिप्लेस  देंगी। गावस्कर और कपिल देव की तरह ही मिताली और हरमनप्रीत कौर महिला क्रिकेट की दो सबसे महत्वपूर्ण बिंदु हैं। कपिल देव ने ठीक वहां से शुरू किया था जहाँ गावस्कर ने छोड़ा था। इसी तरह हरमनप्रीत कौर ठीक वहीं से शुरू कर रही हैं जहां मिताली अपनी पारी ख़त्म कर रही हैं। दो समकालीन व्यक्तित्वों में टकराहट नई नहीं है। हम गावस्कर-कपिल देव के बीच द्वन्द को जानते ही हैं। अभी हाल ही में बैडमिंटन में साइना-सिंधु के बीच टकराव को भी जानते हैं। लेकिन ये टकराव कहीं भी खेल के विकास में बाधक नहीं बनता बल्कि दोनों के द्वन्द से खेल आगे बढ़ता है। साइना भारतीय महिला बैडमिंटन को एक ऊंचाई प्रदान करती हैं और सिंधु उसे शिखर पर पहुंचा देती हैं।  दरअसल ये नए और पुराने का द्वन्द है। ये एक ही खेल के दो अलग अलग स्वरूपों के माहिरों का द्वन्द है जिससे खेल नए आयाम ग्रहण करता है और नयी भूमि भी। हमें उम्मीद रखनी चाहिए मिताली और हरमनप्रीत कौर के बीच ये द्वन्द भी भारतीय महिला क्रिकेट को नए आयाम प्रदान करेगा। अस्तु !  


















Thursday, 3 January 2019

अलविदा पितामह !


अलविदा पितामह !
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भारतीय क्रिकेट के पितामह रमाकांत आचरेकर  का अंतिम प्रयाण निसंदेह भारतीय क्रिकेट जगत के लिए एक बड़े दुःख की घड़ी है। लेकिन क्या ही संयोग है कि इस दुःख की बेला में ही भारतीय गुरु शिष्य परम्परा के खूबसूरत और मार्मिक दृश्य संभव हो पाते हैं। दरअसल ईश्वर मानव की अपनी कृति है जिसे वो अपनी कल्पना में इस मंशा से रचता है कि इहलौकिक जीवन से आगे पारलौकिक जीवन को सुखी और निरापद बना सके। लेकिन आचरेकर ने एक कदम और आगे जाकर एक वास्तविक ईश्वर को गढ़ा। शायद इस उम्मीद के साथ कि जब वो इस दुनिया से प्रयाण करेंगे तो वो ईश्वर उनके  पार्थिव शरीर को कंधा देकर जीवन  की अनंत यात्रा को सहज,सरल और निरापद बनाएगा। और जब उस ईश्वर ने अपने रचनाकार के पार्थिव शरीर का बोझ अपने काँधे धरा होगा तो उस अप्रतिम रचनाकार की आत्मा की आँखों से नेह की अमृत बूँदें बरस रही होंगी और वो अपार संतोष की अनुभूति से बादलों की तरह हलका महसूसते हुए अनंत में विलीन हो गयी होगी।
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अलविदा पितामह रमाकांत आचरेकर !