Friday, 17 May 2019

ये रंगों का बयान है


--------------------
टेस्ट मैच क्रिकेट खेल का मूल प्रारूप है। पांच दिन का ये प्रारूप इस खेल का सबसे शांत,उबाऊ और नफासत से भरा है जिसमें खिलाड़ी सफेद कपड़े पहनते हैं। ये रंग खेल के उस प्रारूप का सबसे प्रतिनिधि रंग है। मैदान में घास को छोड़कर सफेद जूतों व कपड़ों और हल्के क्रीम कलर या ऑफ व्हाइट कलर के बल्लों और विकटों के बीच बस एक ही चटख  लाल रंग होता है गेंद का। इस प्रारूप में सफेद रंग के बीच जिस अनुपात में लाल रंग होता है,मैदान में बस उतना ही रोमांच और उत्साह होता है।

 फिर टेस्ट क्रिकेट की नीरसता को तोड़ने के लिए सीमित ओवरों वाला एकदिवसीय प्रारूप आया। अब क्रिकेट में गज़ब के  रोमांच और उत्साह का समावेश हो गया। नफासत की जगह भदेसपन लेने लगा। भद्रजनों का खेल आमजनों का खेल होने लगा। तो इसी के साथ रंगों का अनुपात भी बदल गया। मैदान में रंग बिखरने लगे। सफेद कपड़े रंगीन कपड़ों में बदल गए और बॉल का रंग लाल से सफेद हो गया। अब रंगीन कपड़ों के बीच जिस अनुपात में बॉल का सफेद रंग होता है मैदान में नीरसता की भी बस उतनी ही गुंजाइश बची रह गई।

लेकिन शायद अभी भी एक कमी बाकी थी। इन रंगों में चमक की कमी थी,रंगों में ग्लेज़ नही था क्योंकि खेल के रोमांच और उत्साह में ग्लैमर की कमी थी। तब फटाफट प्रारूप टी ट्वेंटी आया।इसमें रोमांच,जोश,जुनून और गति का विस्फोट हुआ और ग्लैमर का समावेश हुआ तो कपड़ों के थोड़े फीके और कम चमक वाले रंग चटक होने लगे,रंगों की चमक और ग्लेज़ सहसा ही जोश और जुनून के अनुपात में बढ़ गया।
---------------------------
क्या ही कमाल है कि रंग क्रिकेट के क्रमिक  बदलाव के सबसे गाढ़े प्रतीक हैं। निसंदेह ये देखना रोचक होगा कि आगे इसके और छोटे होते प्रारूप पर रंग कैसे अपना बयान बदलेंगे।

Monday, 6 May 2019

कि हमने एक मिथक बनते देखा है






कि हमने एक मिथक बनते देखा है
--------------------------------------
30 जून 2018 को रूस के कजान स्टेडियम में फुटबॉल विश्व कप के दूसरे दौर में ही फ्रांस ने अर्जेंटीना को हराकर बाहर कर दिया। मैच समाप्त होने के बाद एक खिलाड़ी उदास सा धीमे धीमे कदमों से बाहर जा रहा था। उसने एक बार भी पीछे मुड़कर नहीं देखा। ये लियोनेस मेस्सी थे। दरअसल ये किसी खिलाड़ी का जाना नहीं था बल्कि करोड़ों फुटबॉल प्रेमियों के इष्ट देवता का समय से पूर्व रूठ कर जाने जैसा था। अब आप ही सोचिए अगर कोई गणपत बप्पा को चतुर्थी के दिन अपने घर स्थापित करता है तो फिर अनंत चतुर्दशी के दिन विधि विधान से विसर्जित करता है ना या फिर नवरात्र में दुर्गा की स्थापना करता है तो नवमी की पूजा के बाद ही विसर्जित करते हैं ना। तो फिर मेस्सी 15 जुलाई से पहले बिना जुले रीमे ट्रॉफी के बैगर कैसे जा सकता था। पर ऐसा हुआ। मेस्सी को समय से पहले ही रुखसत होना पड़ा। शायद मेस्सी की अनचाही विदाई के दुख के कारण बहते आंसुओं से ही उस दिन कज़ान के वातावरण में कुछ ज़्यादा नमी रही होगी,कराहों से हवा में सरसराहट कुछ तेज हुई होगी,हार की तिलमिलाहट से सूरज का ताप कुछ अधिक तीखा रहा होगा,दुःख से सूख कर मैदान की घास कुछ ज़्यादा मटमैली हो गयी होगी और कजान एरीना से बाहर काजिंस्का नदी वोल्गा नदी से गले लग कर जार जार रोई होगी।

लेकिन बीते बुधवार को कैम्प नोउ के मैदान में मेस्सी के जादू को देखकर बार्सिलोना में ही नही बल्कि कजान की धूप में भी मुलामियत पसर गई होगी,हवा में मुस्कराहटों का संगीत तैर गया होगा,मैदान की घास फिर से हरी हो गई होगी और हां कजिंस्का नदी फिर वोल्गा के गले लगी होगी और इस बार खुशी के आंसू बहाए होंगे।
दरअसल इस शाम बार्सिलोना एफ सी की टीम अपने मैदान कैम्प नोउ में चैंपियंस लीग के सेमीफाइनल के पहले चरण के मैच में लिवरपूल की टीम को होस्ट कर रही थी। पिछले विश्व कप की असफलता को भुला कर मेस्सी इस सीजन अपने पूरे रंग में आ चुके थे। और अब मैच दर मैच अपना जादू बिखेरा रहे थे। इस मैच से पहले वे इस सीजन 46गोल कर चुके थे। बार्सिलोना को स्पेनिश लीग का खिताब दिला चुके थे। और....और इस मैच में अपने खेल के जादू से पिछले साल की उपविजेता लिवरपूल की टीम को लगभग बाहर ही नहीं कर रहे थे बल्कि दर्शकों को हिप्नोटाइज़ कर रहे थे और अपने खेल कैरियर का एक और लैंडमार्क स्थापित कर रहे थे। जब 75वें मिनट में अपना पहला और टीम का दूसरा गोल कर रहे थे तो ये अपने क्लब के लिए 599वां गोल था। और उसके बाद 83वें मिनट में मेस्सी का ट्रेडमार्क गोल आया। उनका 600वां गोल दरअसल इससे कम शानदार नहीं ही होना चाहिए था। ये एक फ्री किक थी। वे 35 मीटर दूरी से गोल के लगभग बाएं पोल के सामने से किक ले रहे थे। सामने चार विपक्षी खिलाड़ियों की मजबूत दीवार। गोल पर सबसे महंगे और शानदार गोलकीपर एलिसन मुस्तैद। ये एक असंभव कोण था। लेकिन मेस्सी के लिए नहीं। मेस्सी ने किक ली। बॉल एक तीव्र आर्च बनाती हुए सामने खिलाड़ियों की दीवार के सबसे बाएं खिलाड़ी के ऊपर से गोल पोस्ट के पास जब पहुंची तो एक क्षण को लगा कि बॉल गोलपोस्ट से बाहर। पर ये क्या! बॉल तीक्ष्ण कोण से दांई ओर ड्रिफ्ट हुई और गोल के ऊपरी बाएं कोने से होती हुई जाल में जा धंसी। ये गोल नहीं था। एक खूबसूरत कविता थी जिसे केवल मेस्सी के कलम सरीखे पैर फुटबॉल के शब्दों से विपक्षी गोल के श्यामपट पर लिख सकते थे। दरअसल कोई एक चीज कला और विज्ञान दोनों एक साथ कैसे हो सकती है,इसे मेस्सी के फ्री किक गोलों को देखकर समझा जा सकता है। वे विज्ञान की परफेक्ट एक्यूरेसी के साथ अद्भुत कलात्मकता से अपनी पूर्णता को प्राप्त होते हैं। इस गोल के बाद एक खेल पोर्टल जब ये ट्वीट करता है कि "लिटिल जीनियस डिफाइज लॉजिक" तो आप समझ सकते हैं क्या ही खूबसूरत गोल रहा होगा।और 600 गोल के लैंडमार्क को प्राप्त करने के लिए इससे कम खूबसूरत गोल की दरकार हो सकती है भला।
ओह ! लव यू मेस्सी !
------------------------
दरअसल जब आप मेस्सी को खेलते देख रहे होते हैं तो एक खिलाड़ी को,एक फुटबॉल जीनियस या लीजेंड भर को नहीं देख रहे होते हैं बल्कि भविष्य के एक मिथक को बनते महसूस कर रहे होते हो। जब इस मैच को देखने के बाद गैरी लिनेकर जैसा फुटबॉलर ये कह सकता है कि 'मैं इतना भाग्यशाली हूँ कि अपने ग्रैंड चिल्ड्रेन्स को बता पाऊंगा मैंने मेस्सी को खेलते देखा है" तो आप भी अपने को सौभाग्यशाली मानिए कि आपने मेस्सी को खेलते देखा है,कि फुटबॉल के मैदान में एक मिथक को बनते देखा है।

Friday, 3 May 2019

भोर

   

ये तो तय है कि दिन के सारे निश्चय जो सांझ की संभावनाओं में डूब रहे हैं,वे अंततः रात्रि की अनिश्चितताओं में घुल जाएंगे।बस देखना ये है कि उम्मीद के जुगनू,तारे और एक चाँद सारे मिल के अनिश्चितताओं का भार भोर के नए स्वप्नों के उगने तक ढो पाते हैं कि नहीं।
----------------------------------------------
"चल ए नज़ीर इस तरह से कारवाँ के साथ।
जब तू न चल सके तो तेरी दास्ताँ चले।"
                                           नज़ीर
----------------------------------------------
तो ये भी तय रहा कि सकारात्मक सोच हमें मानुस बनाए रखेगी।





Wednesday, 1 May 2019

साक्षात्कार _1



   
साक्षात्कार_1
--------------
थ्रीश कपूर देश के जाने माने छायाकार हैं। प्रकृति के सबसे कोमल और सुकुमार चितेरे सुमित्रा नंदन पंत की जन्मभूमि कौसानी उनकी जन्म और कर्मस्थली दोनों है। शायद  ये उस धरती का ही कमाल है कि वे भी प्रकृति को अपने कैमरे में उतनी ही खूबसूरती से पकड़ते हैं। वे खुद  हिमालय के प्रेम में दीख पड़ते हैं।
                                       

वे हिमालय में और हिमालय उनमें घुल गया है। उन्होंने हिमालय की और उसके जीवन की अद्भुत छटा को किसी कुशल चित्रकार की तरह अपने कैमरे के माध्यम से उकेरा है। इसके लिए उन्होंने हिमालय की लंबी लंबी यात्राएं की,उसके हर रंग को कैमरे की नज़र से देखा और फिर उसे  संजोया है। उनके चित्र हिमालय के सौंदर्य और उसके जीवन के जीवंत दस्तावेज हैं। उस पर कमाल ये कि वे जितने बड़े कैमरे के उस्ताद  हैं उतने ही सहज और सरल इंसान। उनसे मुलाकात एक उपलब्धि की तरह है।


अभी वे दून में थे। मैंने अपने कार्यक्रम के लिए उनसे एक बातचीत रिकॉर्ड की। उनसे बातचीत की है हमारे साथी अनिल भारती जी ने। इस बातचीत का प्रसारण होगा शनिवार 4 मई को प्रातः साढ़े आठ बजे आकाशवाणी देहरादून एफ एम 100.5 मेगाहर्ट्ज़ पर।


उम्मीद है ये सिलसिला आगे भी जारी रहेगा और अपने दो बहुत ही पंसदीदा छायाकारों से आपकी मुलाकात की कोशिश रहेगी। जिस तरह थ्रीश हिमालय के छायाकार हैं डॉ सुनील उमराव संगम के छायाकार हैं। वे गंगा,और अदृश्य सरस्वती के पवित्र संगम स्थली के तपस्वी हैं। उनमें संगम क्षेत्र के हर क्षण,हर रंग,हर रूप को अपने कैमरे में समा लेने की दीवानगी है तो दूसरी ओर  सर नॉस्टेल्जिया के छायाकार हैं। 'हर बीत रही चीज़' को पहचानने और कैमरे से पकड़ने की उनमें गज़ब की योग्यता और ललक है। निसंदेह उनके फोटो तमाम बीती चीजों के ऐसे प्रामाणिक दस्तावेज होंगे जिनसे इतिहास लिखा जा सकेगा।

-
-------------------------------------
दोनों का भी दून घाटी में इंतज़ार।