Monday, 26 March 2018

फिर छिड़ी रात बात फूलों की

   





 फिर छिड़ी रात बात फूलों की
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   फारुख शेख बेहद उम्दा कलाकार थे। वे समानांतर सिनेमा के  ही नहीं थे बल्कि व्यावसायिक फिल्मों के भी सफल और लोकप्रिय कलाकार थे और साथ ही साथ थिएटर में भी उतने ही सक्रिय। फारुख पहली बार 1973 में बड़े परदे पर आए थे 'ग़रम हवा' में।
                              ये मोहभंग का काल था। आज़ादी के बाद जिस तरह उम्मीदें युवाओं ने की थी वो अभी भी दूर की कौड़ी थी। स्थापित संस्थाओं से उनका विश्वास उठ रहा था। व्यवस्था के खिलाफ असंतोष और गुस्सा पनप रहा था। उसी साल एक फिल्म आयी थी 'जंजीर'।अमिताभ बच्चन एक ईमानदार पुलिस इंस्पेक्टर की भूमिका निभाते हैं जो बेईमान व्यवस्था का शिकार होता है जिसके प्रति उसके मन में ज़बरदस्त आक्रोश और गुस्सा है। इसी के बूते वो व्यवस्था से टकराता है। अपनी 'एंग्री यंग मैन' की भूमिका में गज़ब के लोकप्रिय होते हैं और अगले 10  सालों में महानायक के रूप में उभरते हैं। ये मुख्य धारा के सिनेमा का सबसे लोकप्रिय ट्रेंड बनता है। 
                                  सत्तर और अस्सी के दशक में जब अमिताभ और विनोद खन्ना जैसे कलाकार 'एंग्री यंग मैन' और 'ही मैन' की छवियों के साथ धमाल कर रहे थे,फारुख शेख अपनी सौम्य सहज छवि के साथ लोकप्रिय हो रहे थे और दर्शकों के मन में घर बना रहे थे। दरअसल असंतोष और मोहभंग के उस दौर में भी मध्य वर्ग के युवाओं का एक बड़ा वर्ग उस असंतोष का हिस्सा नहीं बन पा रहा था। अर्थगत दबाव में उसके सपने बहुत बड़े नहीं थे। एक अदद नौकरी और एक छोटा सुखी परिवार उसके स्वार्थ के उच्चतम बिंदु थे जिसमें व्यवस्था से टकराने का ना तो माद्दा था और ना ही अवकाश।भावुक रोमान से भरे वे युवा अमिताभ और विनोद खन्ना से कहीं अधिक फारुख शेख की शख्सियत और उन किरदारों से अपना तादात्मय स्थापित कर पाते थे जो उन्होंने 'चश्मेबद्दूर' और 'साथ साथ' जैसी फिल्मों में निभाए थे। भोली भाली साधारण सूरत वाला ये कलाकार महान छवि की निर्मिति नहीं करता था।वो किसी और दुनिया का ना होकर वो अपने बीच का ही चरित्र लगता जिसमें वे खुद को जी सकते थे और जीते भी थे। फारुख से जुड़ाव का एक और कारण भी था। वे अपने चरित्र को अंडरप्ले करते हुए कभी भी लाऊड ना होते हुए भी अपनी साधारणता के बावजूद बहुत ग्रेसफुल और आभिजात्य से लबरेज दिखाई देते। अपनी मध्यवर्गीय पहचान को उच्च वर्गीय पहचान में तब्दील करने के आकांक्षी युवा को ये निश्चित ही आकर्षित करता था। 

                            लेकिन अभी भी फ्रेम कम्प्लीट नहीं होता है। इसमें एक अदद नायिका की कमी है। और तब नायिका के रूप में दीप्ति नवल का प्रवेश होता है। फारुख की तरह ही भोली भाली,मासूम लेकिन गरिमामय आभा से युक्त।किशोर और युवा वर्ग की आधी अधूरी कच्ची पक्की रोमानी कल्पनाओं का फ्रेम ही तब जाकर पूरा होता है जब उसमें प्रेम का रंग भरता है। इसीलिये ये एक सदाबहार जोड़ी बन जाती है और दसियों फिल्में एक साथ करते हैं।   

                       फारुख लगातार एक कलाकार के रूप में परिपक्व होते जाते हैं और 2010 में आकर उन्हें राष्ट्रीय पुरस्कार मिलता है। पर यादें तो इतनी जड़ और ढीट हैं कि सत्तर और अस्सी के दशक के फारुख ही दिल में समाए हैं किसी खिले फूल की तरह। सच में जब भी किसी बज़्म में तेरा ज़िक्र होता है तो लगता है 'फिर छिड़ी रात बात फूलों की'।
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जन्मदिन मुबारक। जहां भी रहो खुदा की इनायत रहे।


Sunday, 25 March 2018

इस बसंत


इस बसंत
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इस बसंत
तेरी याद
नरम गरम धूप सी
कभी सरसों के फूलों की
पीली नरम आंच सी
कभी पलाश के फूलों की
लाल दहकती आग सी 
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Thursday, 22 March 2018

होना




होना 
हक़ीक़त ना सही

स्वप्न बन रहो

सच ना सही

झूठ बन रहो

आस ना सही

निराशा बन रहो

फूल ना सही

शूल बन रहो

दोस्त ना सही

दुश्मन बन रहो

हर पक्ष का एक प्रतिपक्ष होता है

पक्ष ना सही
प्रतिपक्ष बन रहो
बस बने रहना
बने रहना ही
दुनिया की सबसे बड़ी नेमत

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क्या पूर्ण रूपेण निरपेक्ष भी कुछ होता है ?







Tuesday, 6 March 2018

क्रिकेट कथा वाया यादों की गलियां




 क्रिकेट कथा वाया  यादों की गलियां 
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               वर्तमान चाहे कितना भी अच्छा क्यूँ ना हो शायद ये अतीत के प्रति मोहग्रस्तता है कि अतीत कहीं बेहतर नज़र आता है। अब क्रिकेट को ही लीजिए। भारतीय क्रिकेट टीम के दक्षिण अफ़्रीकी के हालिया दौरे पर मिली शानदार सफलता के बाद आप मान सकते हैं कि ये भारत की अब तक की सर्वश्रेष्ठ क्रिकेट टीम है क्यूंकि इस प्रदर्शन ने दिखाया कि वे अपने देश की पाटा पिचों पर ही नहीं बल्कि तेज़ और उछाल वाली पिचों पर उतनी ही कुशलता के साथ खेल सकते हैं। सौरव गांगुली के साथ भारतीय क्रिकेट का जो रूपांतरण शुरू होता है उसे महेंद्र सिंह धोनी ने आगे बढ़ाया और विराट कोहली ने अपने अंजाम तक पहुंचा दिया।इन तीनों के नेतृत्व में भारतीय क्रिकेट टीम ने शानदार रिकॉर्ड जीतें दर्ज़ की हैं और वो भी खेल के हर फॉर्मेट में। 
             लेकिन इस सब के बावजूद इनमें से कोई भी जीत टेस्ट क्रिकेट में 1971 में अजित वाडेकर के नेतृत्व में इंग्लैंड में 1-0 की जीत और सीमित ओवरों के फॉर्मेट में 1983 के विश्व कप की जीत का मुक़ाबला नहीं कर सकती। आप इससे असहमत हो सकते हैं पर मेरे लिए यही सच है। 1971-72 में 7-8 साल की उम्र में उस जीत का सबक स्मृतियों पर ऐसा दर्ज़ हुआ कि बाद की कोई जीत मिटाने की तो बात छोड़िए ओवरलैप या ओवरशैडो भी नहीं कर पाई।और फिर उसके लगभग 12 वर्षों बाद 1983 के विश्व कप की जीत 1971 की जीत के समानांतर ऐसी दर्ज़ हुई कि बाद की कोई जीत उसे छू भी नहीं पाती। किसी ने उस जीत के बारे में सपने में भी नहीं सोचा होगा। शायद ख़ुद खिलाड़ियों ने भी नहीं। उसी विश्व कप में ज़िंबाबवे से लीग मैच था। भारत ने 17 रनों पर 5 विकेट खो दिए थे। तब कपिल देव ने 175 रनों की एक अद्भुत पारी खेली थी।सड़क पर एक पेड़ के नीचे सांस थाम कर वो पारी सुनी थी।उस पारी से बेहतर पारी हो सकती है क्या कोई ! उस जैसा रोमांच कोई दूसरी पारी पैदा नहीं कर सकी,यहां तक की सचिन,सहवाग और शर्मा के एक दिवसीय मैचों के दोहरे शतक भी। और फिर कोई भी स्पिनर बेदी प्रसन्ना चंद्रशेखर और वेंकट की चौकड़ी से बेहतर हो सकते हैं जब वे दोनों छोरों से गज़ब की लय के साथ बॉलिंग करते तो लगता मानो कोई तान छेड़ दी गयी हो।और फिर एकनाथ सोलकर को याद कीजिये। फॉरवर्ड शार्ट लेग पर बल्लेबाज़ से एक हाथ की दूरी पर बिना हेलमेट पहने मैच दर मैच जैसे कैच वे पकड़ते मो कैफ से लेकर रैना और कोहली तक कोई पकड़ पाता। आबिद अली याद हैं क्या आपको !दर्शकों की मांग पर जिस तरह  छक्के लगा कर जो रोमांच पैदा करते क्या सहवाग सचिन या धोनी या कोहली कर पाते!और हाँ विश्वनाथ जैसी कलात्मक और मोहिंदर जैसी सहज लयात्मक बैटिंग कोई दूसरा कर पाता ! ये कुछ उदाहरण भर हैं। सत्तर और अस्सी के दशक में बेशक़ भारतीय क्रिकेट आज जैसी बुलंदियों पर नहीं थी ,सफलता के सोपान बेहद कम थे लेकिनखेल अपनी कलात्मकता में और अपने क्लासिक मिजाज़ में बुलंदियों पर था।
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Monday, 5 March 2018

ऐसा भी कहीं होता है क्या ?

                 
                            
ऐसा भी कहीं होता है क्या ? 
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                                       अगर ऊंचा उठने के लिए ऊंचाई अनंत है तो गिरने के लिए अतल गहराई भी है। ये बात वेस्टइंडीज क्रिकेट टीम से बेहतर कौन समझ सकता है। किसी समय में अजेय समझी जाने वाली 'महान टीम' आज अपने पराभव के चरम पर है।ये टीम और कितने रसातल में जाएगी इसका अनुमान लगाना कठिन है।  दो बार की विश्व चैम्पियन वेस्ट इंडीज की क्रिकेट टीम को आईसीसी विश्व कप के लिए अहर्ता पाने के लिए अब क्रिकेट का ककहरा सीखने वाली टीमों के साथ दो दो हाथ करने होंगे। 
                       
                इस टीम का पराभव कोई एक दो दिन की परिघटना नहीं है। ये एक लम्बी प्रक्रिया है। शायद 1983 के विश्व कप के फाइनल में भारत के हाथों हार वो बिंदु है जहां से इस टीम की प्रगति का ग्राफ नीचे की दिशा में मुड़ता है। पर कहते हैं ना मरा हाथी भी सवा लाख का होता है। अगले एक दशक तक उस टीम का कोई सानी नहीं था।लेकिन उसकी श्रेष्ठता में जो सेंध लग चुकी थी उसे रोका नहीं जा सकता था।उसका पराभव निश्चित था और हुआ। लेकिन ये इस हद तक होगा इसकी कल्पना भी नहीं की थी और सच तो ये है कि इस पर आज भी विश्वास नहीं होता। दरअसल इस टीम की सफलता के चरमोत्कर्ष के समय की स्मृतियाँ मेरे दिमाग पर इस कदर हावी हैं और जड़ हो चुकी हैं कि आज की दुर्दशा भी उनको रिप्लेस नहीं कर पातीं।
                            जब भी क्रिकेट में वेस्टइंडीज का नाम आता है तो ज़ेहन में क्वींस पार्क ओवल त्रिनिदाद , किंग्स्टन ओवल बारबोदास,जार्जटाउन गुयाना ,सबीना पार्क किंग्स्टन जमैका, एंटीगुआ के उन मैदानों का अक्स उभरता है जिनमे 22 गज़ की एक खेल पट्टी होती थी जिससे दुनिया भर के बल्लेबाज़ खौफ खाते थे और ये मैदान खेल के मैदान कम और युद्ध के मैदान अधिक लगते थे। तेज़ रफ़्तार और उछाल भरी गेंदों से विपक्षी टीम के बल्लेबाज़ों का शरीर ही घायल नहीं होता बल्कि उनकी रूह भी काँप उठती। तो दूसरी ओर विपक्षी गेंदबाज़ों पर इस कदर प्रहार होता कि वे त्राहीमाम त्राहीमाम कर उठते।
                              वेस्टइंडीज क्रिकेट का मतलब मेरे लिए आज भी एंडी रॉबर्ट्स,माइकेल होल्डिंग,जोएल गार्नर,मेलकॉम मार्शल,कॉलिन क्राफ्ट,कोर्टने वाल्श होता है और इसका मतलब क्लाइव लॉयड,गॉर्डन ग्रीनिज,विवियन रिचर्ड्स,गारफील्ड सोबर्स,एल्विन कालीचरण,डेस्मंड हेंस,रिची रिचर्डसन होता है और इसका मतलब जीत और सिर्फ जीत होता है।  ये निसंदेह आश्चर्य की बात है कि जहाँ के लोगों के खून में क्रिकेट रचा बसा हो,क्रिकेट जीवन का अभिन्न अंग हो वहाँ क्रिकेट की ऐसी दुर्दशा। उफ़्फ़ कितना दुःखद और अवसाद का वायस है ये सब। जब ये सब मेरे लिए इतना पीड़ादायक है तो ज़रा सोचिये उन लोगों की जिनके जीवन में क्रिकेट इतने गहरे उतरा है कि उन्होंने 1962 में 5 साल में ही वेस्टइंडीज की 'पोलिटिकल आइडेंटिटी' के ख़त्म होने के बावजूद आज तक वेस्टइंडीज को 'क्रिकेट आइडेंटिटी' बनाये रखा है।