Saturday, 14 July 2018

ओह ! इलाहाबादी जोंटी रोड्स ने क्रिकेट को अलविदा कह दिया !




ओह ! इलाहाबादी जोंटी रोड्स ने क्रिकेट को अलविदा कह दिया !
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          1983 के क्रिकेट विश्व कप में भारत की जीत भारतीय क्रिकेट के इतिहास में एक महत्वपूर्ण प्रस्थान बिंदु है। दरअसल यहाँ से क्रिकेट का चरित्र बदलता है और एक इलीट खेल मास के खेल में तब्दील होने लगता है। क्रिकेट बड़े बड़े शहरों से निकल छोटे छोटे शहरों की और रुख करता है और बड़े क्लबों और मैदानों से निकल कर गली मोहल्लों तक पहुंचता है। मैदान में नफासत की जगह भदेसपन घर करने लगता है। साफ़ शफ्फाक कर्रजदार कपड़ों पर घास और मिटटी के निशान नज़र आने लगते हैं। और छोटे छोटे शहरों के लड़के राष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान बनाने लगते हैं और अन्ततः भारतीय टीम में शामिल होकर देश को नयी ऊंचाईयां प्रदान करते हैं। मो.कैफ बदलाव की उसी बयार की देन है कि वे इलाहाबाद वाया कानपुर राष्ट्रीय टीम में पहुंचते हैं और अपनी पहचान बनाते हैं।
                         मो.कैफ ने 13 टेस्ट और 125 एक दिवसीय अंतरराष्ट्रीय मैच खेले।उनके नेतृत्व में भारत ने अंडर 19 विश्व कप जीता।उन्हें दरअसल2002 के लॉर्ड्स में नेट वेस्ट ट्रॉफी के फाइनल में उनकी युवराज सिंह के साथ लाजवाब साझेदारी और 87 रनों की पारी के लिए लिए जाना जाता है जिसके बाद ही सौरव गांगुली ने अपनी शर्ट उतार कर ऐतिहासिक जेस्चर दिया था।इसके अलावा भी कई यादगार प्रदर्शन किए।लेकिन मुझे लगता है उन्हें इनका वाजिब दाय नही मिला।

                             वे भले ही सचिन,लक्ष्मण, द्रविड़,सहवाग जैसे महान खिलाड़ी ना रहे हो।लेकिन उनका योगदान भारतीय क्रिकेट को कम नही।दरअसल वे एक शानदार फील्डर थे।उनके आसपास से गेंद का निकलना नामुमकिन था और उनके हाथों से कैच छूटना असंभव।वे बॉल रोकने के लिए लंबी लंबी डाइव मारते,चीते की फुर्ती से गेंद पर झपटते और एक ही एक्शन में बाल थ्रो करते।वे असंभव से कैच पकड़ते।युवराज सिंह के साथ उनकी शानदार जोड़ी बनती।युवराज पॉइंट और कैफ कवर पर फील्डिंग करते और फिर इस जगह से रन बनाने बल्लेबाज़ के लिए असंभव कर देते।उनके आने से पहले भारत की फील्डिंग एक बड़ी कमजोरी थी।भले ही भारत के पास बड़े बैट्समेन और बॉलर रहे हो पर भारतीय क्रिकेट टीम ऊंचाइयों पर तभी पहुंची जब उसकी फील्डिंग शानदार हुई।और इसका श्रेय बहुत कुछ कैफ को है।उनके साथ तमाम खिलाड़ी आये जो श्रेष्ठ क्षेत्ररक्षक थे।लेकिन कैफ उन समानों में प्रथम थे(first among the equals).अब खिलाड़ियों के हाथों में आर्मगार्ड्स और उंगलियों में टेप दिखाई देने लगे थे।अब फील्डिंग से भी खिलाड़ियों को पहचान मिलने लगी ।याद कीजिये कैफ से पहले किसी खिलाड़ी को फील्डिंग से पहचान मिली हो एकनाथ सोलकर को छोड़कर।ये कैफ ही थे जिन्होंने फील्डिंग को नई परिभाषा दी।दरअसल वे भारत के जोंटी रोड्स थे।ये भारतीय क्रिकेट को उनका बड़ा योगदान था और केवल इसी के लिए वे लम्बे समय तक याद किए जा सकते हैं और याद किए जाने चाहिए। 

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 खेल के मैदान से अलविदा कैफ।

Thursday, 12 July 2018

फुटबॉल विश्व कप 2018_8

             


ओह ये तो क़यामत की रात थी 
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  निसंदेह कल की रात दुनिया भर के खेल प्रेमियों के लिए रोमांच से भरी रात थी। यूरोप महाद्वीप के दो विपरीत छोरों पर दो सबसे लोकप्रिय खेलों की प्रतियोगिताओं के रोमांच में लोग डूबते उतराते रहे।अपेक्षाकृत कम विकसित पूर्वी छोर पर कभी सर्वहारा वर्ग के झंडाबरदार रहे रूस की राजधानी मास्को में आमजन के सबसे पसंदीदा खेल फुटबॉल की विश्व प्रतियोगिता का दूसरा सेमी फाइनल खेला जा रहा था तो दुनिया के सबसे विकसित पश्चिमी छोर पर स्थित मध्यम और उच्च वर्ग समर्थित पूंजीवादी लोकतांत्रिक देश इंग्लैंड की राजधानी लन्दन के आल इंग्लैंड क्लब में एलीट खेल टेनिस के क़्वार्टर फाइनल मैच खेले जा रहे थे। मानो ये दैवयोग हो कि दोनों खेल अपनी अपनी दुनिया में खेले जा रहे हों।हाँ द्वन्द और संघर्ष के नए पैमाने दोनों जगह स्थापित किये जा रहे थे,इतिहास दोनों ही जगह बनाये जा रहे थे। 
                 मास्को के लुझिन्स्की स्टेडियम में फुटबॉल कप के फाइनल्स  का दूसरा सेमीफ़ाइनल मैच खेला जा रहा था। एक तरफ फुटबॉल के गौरवशाली इतिहास और परम्परा की वाहक लेकिन एक युवा खिलाड़ियों वाली इंग्लैंड की टीम थी तो दूसरी ओर लगभग एक चौथाई सदी पहले अस्तित्व में आये नवोदित राष्ट्र की नई  लेकिन अनुभवी खिलाड़ियों वाली क्रोशिया की टीम थी।इंग्लैंड की टीम की विश्व रैंकिंग 12 थी तो क्रोशिया की रैंकिंग 20 थी। हाँ ये ज़रूर था कि दोनों ही टीमों का नेतृत्व दो शानदार खिलाड़ी कर रहे थे।इंग्लैंड का हैरी केन और क्रोशिया का लूका मोड्रिक।जहां क्रोशिया डार्क हॉर्स टीम थी जिसको शुरू में ज़्यादा तवज्जो नहीं दी जा रही थी,वहीं इंग्लैंड की टीम को संभावित विजेताओं में गिना जा रहा था।खुद इंग्लैंड वासी तो इतने आश्वस्त थे कि 1996 में इंग्लैंड में यूरो कप के आयोजन के अवसर पर रचा गया 'थ्री लायन' इंग्लैंड का थीम सांग बन गया और उसकी लाइन 'इट्स कमिंग होम' उसकी टैग लाइन। लेकिन कल मैदान में जब क्रोशिया की टीम उतरी तो उसने ना केवल इंग्लैंड की पार्टी खराब कर दी बल्कि इस टैग लाइन में "नहीं" शब्द जोड़ कर पूरे गीत को ही बेसुरा कर दिया। 
            क्रोशिया और इंग्लैंड के बीच खेला गया ये मैच उतना ही संघर्षपूर्ण,रोमांचक और शानदार था जितना कि किसी विश्व  प्रतियोगिता के सेमीफाइनल मैच को होना चाहिए था। पहले हाफ को पूरी तरह अपने नियंत्रण में रख कर इंग्लैंड ने बताया कि क्यों उसे इस मैच में फेवरिट माना जा रहा है। ऊपर से 5वें मिनट में जब ट्रिपर ने फ्री किक पर शानदार गोल किया तो लगाने लगा कि वोही जीतेगा। उसके मिडफील्ड ने खेल को पूरी तरह नियंत्रित किया। लेकिन आधा समय बीतते बीतते जैसे जैसे इंग्लैंड का मिडफील्ड ढीला पड़ने लगा क्रोशिया की टीम रंग में आने लगी और लगा मैच अभी ख़त्म नहीं हुआ है। क्रोशिया ने पहले भी पीछे से आकर मैच जीता था। दूसरे हाफ में क्रोशिया अपने शबाब पर थी। 68वे मिनट में पेरिशिच ने गोल कर क्रोशिया की वापसी करा दी। अब इंग्लैंड नींद से जागा। लेकिन तब तक देर हो चुकी थी। मैच अतिरिक्त समय में गया। 109वें मिनट में मारियो मंडज़ूकिच ने गोल कर इंग्लैंड के भाग्य का फैसला सुना दिया। जिस तरह से बेल्जियम के लुकाकु द्वारा अहम् गोल करने के मौके गवांए जाने का खामियाजा भुगतना पड़ा वैसे ही इंग्लैंड को हैरी केन द्वारा आसान मौके गवांने की कीमत टीम की हार से चुकानी पडी। 
फिलहाल 15 जुलाई को जब क्रोशिया और फ्रांस के मध्य फाइनल खेला जाएगा तो दोनों ही टीमों के दिमाग में 8 जुलाई 1998  के विश्व कप का क्वार्टर फाइनल मैच ज़रूर रहेगा जिसमें फ्रांस ने क्रोशिया को 2-1 से हराकर सेमीफाइनल में प्रवेश किया था। फ्रांस उसे दोहराना चाहेगी तो क्रोशिया उसका बदला लेना। मेरा वोट विश्व को नया चैम्पियन मिले। 

जिस समय यूरोप के पूर्वी हिस्से में क्रोशिया और इंग्लैंड के बीच श्रेष्ठता की जंग चल रही थी ठीक उसी समय पश्चिमी हिस्से में लोग टेनिस लीजेंड फेडरर और अपने काबिलियत से कहीं कमतर जाने जाने वाले केविन एंडरसन के बीच एक और ऐतिहासिक द्वन्द के साक्षी बन रहे थे। फेडरर यहां 8 खिताब जीत चुके थे और नवां जीतने के प्रयास में यहां जीत दर्ज़ कर सेमीफाइनल में पहुंचा चाहते थे। लेकिन एंडरसन  कुछ और ही तय करके आये थे। जिस तरह से फुटबॉल के दोनों सेमीफाइनल्स इस बात के गवाह बने कि बस एक चूक आपकी पूरी मेहनत पर भारी पड़ती है ठीक वैसे ही ये क्वार्टर फाइनल मैच भी। फेडरर ने दो सेट 6-2,7-6 से जीतकर तीसरे में मैच पॉइंट पर सर्व कर रहे थे। इस अंक में वे चूक गए और सवा चार घंटे के संघर्ष के बाद मैच 6-2,7-6,5-7,4-6 और 11-13 से हार गए। जिस समय विश्व नम्बर दो इस ऐतिहासिक संघर्ष में हार रहे थी ठीक उससे समय विश्व नम्बर एक राफेल नडाल लगभग वैसे ही एपिक संघर्ष में देल पोत्रो को लगभग उतने ही समय में  7-5,6-7,4-6,6-4 और 6-4 से हरा कर अपने 18वे ग्रैंड स्लैम की और बढ़ रहे थे। हालांकि फेडरर की हार ने राफा-फेड के संभावित ऐतिहासिक भिड़ंत को ख़त्म कर दिया लेकिन फाइनल से पहले एक फाइनल ज़रूर देखने को मिलेगा जब दो दिग्गज राफा और जोकोविच कल सेमीफाइनल में खेलेंगे। 
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2002 में 7 बार के विजेता पीट सम्प्रास स्विट्ज़रलैंड के जॉर्ज बैटल से हार गए थे और उसके बाद वे कभी आल इंग्लैंड क्लब वापस नहीं लौटे। ये देखना रोचक होगा कि क्या इतिहास अपने को दोहराएगा या फेडरर एक बार फिर लौटकर आएंगे।   अस्तु !
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विश्व कप फुटबॉल 2018_8 

Wednesday, 11 July 2018

फुटबॉल विश्व कप 201_2




फुटबॉल विश्व कप 201_2 
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जब आपको ये लगने लगे कि हिन्दुस्तान के हज़ारों हज़ार लोगों की रात की नींद और दिन का चैन उड़ गया है तो परेशां ना हों। दरअसल ये  ये किसी परेशानी का सबब नहीं बल्कि इस बात का संकेत है कि विश्व के सबसे लोकप्रिय खेल का महाकुंभ शुरू हो चुका है।यानि फीफा विश्व कप फाइनल्स का आग़ाज़ हो चुका है।
     रंगमंच तैयार है।पर्दा बस उठने को है।विश्व के कोने कोने से आए चुनिंदा दल अपने हुनर से हैरतअंगेज कारनामे दिखाने को उतावले हैं। जी हाँ,रूस में 14 जून से शुरू होने वाले होने वाले फीफा विश्व कप के इस इक्कीसवें संस्करण में 32 देशों की टीमें अपने खेल कौशल और इसमें महारत का परचम लहराने के प्रयास में अपना सब कुछ झोंक देने के लिए तैयार हैं।अगले एक महीने तक हर दिन 22 जोड़ी पैर 120 मीटर लम्बे और 80 मीटर चौड़े मैदान में एक अदद गेंद को 8 गज चौड़े और 8 फुट ऊँचे गोल पोस्ट के भीतर पहुँचाने की जद्दोजहद में अपना सब कुछ दाँव पर लगाने को तैयार हैं। वहाँ श्रेष्ठता के बोध से गर्वोन्नत यूरोपियन खिलाड़ियों का पॉवर खेल होगा,अलसाई नफासत लिए एशियाई खिलाड़ियों का धीमा खेल होगा,सर्वहारा की चेतना से युक्त दक्षिण अमेरिकी खिलाड़ियों का कलात्मक खेल होगा और घोर अमानवीय परिस्थियों में भी अद्भुत जिजीविषा वाले अफ्रीकी खिलाड़ियों का तेज रफ़्तार वाला आक्रामक खेल भी होगा। वहां जीत होगी तो हार भी होगी। जोश भी होगा,जूनून भी। आँखें ख़ुशी से भी नम होगी और ग़म से भी। मानवीय कौशल की पराकाष्ठा होगी तो तकनीक की श्रेष्ठता के भी दिग्दर्शन होंगे। एक दूसरे से गले मिलते खिलाड़ी होंगे और एक दूसरे पर झपटते प्रतिद्वंदी भी।खेल अधिकारी होंगे ,रैफरी होंगे ,लाइन्समैन होंगे ,कैमरे होंगे ,फ़्लैश लाइटें होंगी ,पत्रकार होंगे और पूरी ताक़त से बाज़ार भी होगा। और इन सबके केंद्र में होगा फ़ुटबाल का खेल और उसकी श्रेष्ठता का प्रतीक फीफा वर्ल्ड कप ट्रॉफी। 
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हम भी तैयार हैं 14 जून को रात्रि 10 बजे तीन पुरनियों और एक युवा के साथ आपसे रूबरू होने को। इस बार खेल पत्रिका के मेहमान हैं-ज़नाब जलालुद्दीन खान,प्रेमचंदर,के एम भद्रा और इंद्रनील घोष। क्या आप तैयार हैं ?
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फुटबॉल विश्व कप 2018_7



जब नीले पानी ने लाल आग को ठंडा कर दिया
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याद कीजिये 1998 का विश्व कप। ये फ्रांस की धरती पर खेला जा रहा था। ठीक 20 साल और 2 दिन पहले 8 जुलाई 1998 को फ्रांस की टीम क्रोशिया को 2-1  से हराकर फाइनल में पहुंच रही थी और उसके चार दिन बाद 12 जुलाई 1998 को ब्राज़ील को 3 -1 से हराकर अपना पहला विश्व कप जीत रही थी। तब से लेकर आज तक केवल सीन और सेन नदी में ही बहुत पानी नहीं बह चुका है बल्कि पूरे यूरोप के भू-राजनैतिक दृश्य पटल में भी काफी बदलाव आ चुका है।अगर इस बीच कुछ नहीं बदला है तो एक व्यक्ति फ्रांस के दिदिए डेशचेम्प की भूमिका नहीं बदली है। 1998 में 29 वर्ष की अवस्था में वे अपने नेतृत्व में फ्रांस को विश्व कप दिलवा रहे थे और आज 49 वर्ष की अवस्था में भी वे यही काम कर रहे हैं। बस जगह में परिवर्तन हुआ है। उस समय में वे कप्तान के रूप में मैदान के अंदर थे और अब कोच के रूप में मैदान के बाहर। 1998 का कारनामा दोहराएं जाने में बस एक कदम बाकी है। लेकिन क्या ही विडम्बना है कि 1998 में उनके एक साथी थे 20 वर्षीय युवा थिअरी हेनरी। कल दिदिए डेशचेम्प के साथ वे भी उपस्थित थे। लगभग उसी भूमिका में। लेकिन उनके साथ नहीं थे। उनके सामने खड़े थे। बेल्जियम के सहायक कोच के रूप में।
          जिस समय फ्रांस ने अपना पहला विश्व कप जीता था,उससे कुछ समय पहले ही रूस से एक बयार उठी थी खुलेपन और उदारीकरण की जिसने धीरे धीरे पूरे विश्व को अपने प्रभाव में ले लिया। बाइपोलर विश्व व्यवस्था की जगह यूनिपोलर विश्व व्यवस्था आकार ले रही थी। राज्यों की सीमाओं के बंधन कम होने लगे ,बंधन टूटने लगे,जकड़नें ख़त्म होने लगी और एक ग्लोबल विलेज की संकल्पना जन्म लेने लगी। इस संकल्पना के जो परिणाम रहे हों पर पर जब ये दोनों टीमें कल मैदान में उतरी थीं तो उस भावना की सबसे बेहतरीन नुमाईंदगी कर रहीं थीं। बेल्जियम टीम के मुख्य कोच स्पाहनी थे ,सहायक कोच फ्रेंच और मुख्य स्ट्राइकर अफ्रीकी मूल के खिलाड़ी थे। तो दूसरी तरफ फ्रांस के भी एक दो नहीं बल्कि कई खिलाड़ी अफ्रीकी मूल के थे। दरअसल दोनों टीमों का एक कॉस्मिक चरित्र था  और उस भावना के प्रति शायद एक ट्रिब्यूट भी । लेकिन ये भी विडम्बना ही है कि ऐन उसी वक्त जिस विश्व कप में ये खेल रहीं थीं वो धीरे धीरे स्थानिकता में बदल रहा था। अफ्रीकी टीमें पहले ही दौर में बाहर हो गईं, एक मात्र बची एशियाई टीम प्री क्वार्टर फाइनल में बाहर हो गई,बची दोनों दक्षिण अमेरिकी टीमों ने क्वार्टर फाइनल में विदा ले ली और तब विश्व कप यूरोपीय कप में तब्दील हो गया। और जब ये दोनों टीमें कल मैदान में उतरीं तो लगा कि कोई इंग्लिश प्रीमियर लीग का कोई मैच होने को है क्योंकि कल उस लीग के 13 खिलाड़ी खेल रहे थे। 9 बेल्जियम की तरफ से और 4 फ्रांस की तरफ से।
      'लेस ब्लू' और 'रेड डेविल्स' टीमों के बीच का ये मैच दरअसल नील वर्णी पानी और रक्तिम आग के बीच मुकाबला जैसा था बिलकुल अपने नामों और जर्सी के रंग जैसा। अगर फ्रांस की टीम पानी की तरह पूरे मैदान में बहुत ही सहज और सरलता से  बहती रही और विपक्षी टीम की दरारों के बीच से बहकर गंतव्य पर निशाना साधती रही तो बेल्जियम की टीम बार बार आग सी दहकती हुई विपक्षी गोल पर भड़कती रही। खेल की शुरुआत फ्रांस ने की और पहले तीन मिनट तक गेंद पर इस तरह से कब्जा रखा कि बेल्जियम को गेंद  छूने तक को नहीं मिली मानो पानी आग  का ताप  परख रहा है। लेकिन फ्रांस का ये तीन मिनट का कब्जा किसी ज्वलनशील पदार्थ सा आग को भड़काने के लिए पर्याप्त था।  बेल्जियम की टीम ने अगले 20  मिनट तक खेल पर नियंत्रण रखा और कई बार हमले किए। आक्रमण की धार का इस बात से अंदाज़ा लगाया जा सकता कि 21वें  मिनट तक बेल्जियम की टीम ने चार कार्नर अर्जित किए। जबकि उस समय तक फ्रांस एक भी कार्नर नहीं ले पाई थी।बेल्जियम के चौथे कार्नर पर जब बॉल पेनल्टी बॉक्स के ऊपर से डिफेंडर टोरी एल्डरवीराल्ड ने बाएं पाँव से बहुत जोरदार किक लगाई जिसका फ्रांस के गोलकीपर ने शानदार बचाव किया।अगर ये गोल होता तो प्रतियोगिता के बेहतरीन गोलों में से एक होता। इसके बाद मानो पानी को हल्का सा ढलान मिल गया हो।पानी एक बार फिर बेल्जियाई गोल की तरफ बहाने लगा। फ्रांस ने भी प्रत्याक्रमण शुरू किए और 25वें मिनट में पहला कॉर्नर लिया। आक्रमण-प्रत्याक्रमण का सिलसिला जारी रहा। लेकिन आधे समय तक कोई गोल नहीं हुआ। कुछ जानकारों का मानना था कि ये मैच टेक्निकली बेहतर होगा पर नीरस होगा,लेकिन इसके विपरीत ये प्रतियोगिता के सबसे शानदार और रोमांचक मैचों में से एक था। 

दूसरे हाफ में गतिरोध तब टूटा जब 51वें मिनट में फ्रांस के डिफेंडर उमतिति ने कॉर्नर पर हेडर से गोल किया। ये मैच विनर साबित हुआ। इसके बाद आग जैसे एक बार फिर भड़क गयी हो। बेल्जियम ने गोल करने की जोरदार कोशिश की,पर सफलता नहीं मिली। यहां  दोनों गोलकीपर और बेल्जियम के कप्तान हेजार्ड  मैच के हीरो थे। जहां दोनों  गोलकीपरों ने शानदार बचाव किये वहीं हेजार्ड ने बाए फ्लेंक से  जोरदार आक्रमण किये,पर वे फिनिश नहीं कर पाए। दरअसल बेल्जियाई कम्प्लीट टीम के रूप में विख्यात हैं। उनके खिलाड़ी पोजीशन बदल बदल कर खेलते रहे और आक्रमण करते रहे। जहाँ बेल्जियाई  लगातार आक्रमण कर रहे थे वहीं फ्रांसीसी थोड़ा डिफेंसिव खेले। उनकी रणनीति प्रत्याक्रमण की थी। वे बेल्जियम के आक्रमण को निगेट  करते और द्रुत गति से आक्रमण करते। लेकिन बेल्जियाई डिफेन्स ने उन्हें कोई मौक़ा नहीं दिया। वे केवल एक मौक़ा चूके और वही उनके लिए घातक सिद्ध हुआ। दरअसल ये बेल्जियम का दिन नहीं था। उनका बॉल पजेशन 38 प्रतिशत के मुक़ाबले 62 प्रतिशत था। बेल्जियम के खेल पर नियंत्रण को इस बात से समझा जा सकता है कि उनके 91 प्रतिशत पास सही थे। उनकी हार का कारण उनके  हीरो लुकाकू थे जिन्होंने  कई ऐसे मौके गवांए जिनमें से कई को गोल में तब्दील हो जाना चाहिए था।फिलहाल नीले रंग ने लाल रंग को हरा दिया। पानी ने आग को ठंडा कर दिया और उससे पार होकर नए गंतव्य की ओर बढ़ चला।


दरअसल बेल्जियम की इस हार ने फुटबॉल में विश्व को एक नया चैम्पियन मिलने की संभावना को क्षीण कर दिया है। ज़्यादा संभावना है कि आज के मैच में इंग्लैंड जीते। तब दो एक-एक बार के चैम्पियन आमने सामने होंगे और अपना दूसरा खिताब जीतने की कोशिश करेंगे।
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और हाँ आप माने या ना माने दक्षिण अमेरिकी टीमों का अब भी जलवा कायम है। उनकी लोकप्रियता में कोई कमी नहीं आई है। यकीन मानिये कल अगर अर्जेंटीना या ब्राज़ील की टीम में से कोई एक टीम सेंट पीटरस्बर्ग के उस स्टेडियम में खेल रही होती तो स्टैंड्स में इस कदर सीटें खाली ना होती 
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विश्व कप फुटबॉल 2018_6 

















Tuesday, 10 July 2018

विश्व कप फुटबॉल 2018_6




विश्व कप फुटबॉल 2018_6 
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ये एक शानदार दृश्य बन पड़ता है कि एक राष्ट्राध्यक्ष अपने देश की जरसी पहने मैदान में अपने खिलाड़ियों की हौसला अफ़जाई करता है और ये दृश्य तब अद्भुत लगने लगता है जब वो विपक्षी टीम के राष्ट्राध्यक्ष की उपस्थिति में ना केवल आम दर्शकों की तरह चीख कर अपनी टीम को चीयर्स करता है,बल्कि खुशी से झूमकर नृत्य करने लगता है।जीत के बाद अपने खिलाड़ियों का ड्रेसिंग रूम साझा करता है और अपनी टीम के साथ सोलिडेरिटी दिखाने के लिए आम समर्थकों के साथ हवाई जहाज में इकोनॉमी क्लास में सफर करके अपने रचे दृश्य को मुकम्मल करता है।दरअसल खेल मुकम्मल ही तब होता है जब आम ओ खास सब अपनी टीम के साथ एकाकार हो जाते हैं।क्रोशिया की माननीया राष्ट्राध्यक्ष कोलिंडा ग्रैबर कितारोविक सोची के स्टेडियम में एक ऐसा ही खूबसूरत नैरेटिव रचती हैं क्योंकि वे जानती हैं कि जब राष्ट्र की प्रसव पीड़ा में सब साझीदार थे तो यहां भी सबका एकाकार होना बनता है।

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मैदान में भले ही भौतिक रूप से एक/दो/पांच/छह/सात या ग्यारह खिलाड़ी खेलते दिखाई देते हों लेकिन उनके साथ उनका मुख्य कोच होता है,सहायक कोच होते हैं,सपोर्टिंग स्टाफ होता है,स्टेडियम में उपस्थित समर्थक दर्शक होते हैं,देशवासी होते हैं और पूरे संसार मे फैले उनके समर्थक भी वहां पूरी शिद्दत से उपस्थित होते हैं।तब जाकर टीम बनती है।फिर खेल खिलाड़ी की प्रतिभा,उसकी स्किल,उसकी तकनीक,उसकी मेहनत व लगन और उस खेल के उपकरणों भर से नहीं खेल जाते बल्कि कोच की रणनीति,सपोर्टिंग स्टाफ के सहयोग,उपस्थित समर्थकों के जोश और जूनून,देशवासियों की दुआओं और पूरी दुनिया मे फैले उनके चाहने वालों की उम्मीद से खेला जाता है।शायद माननीया कोलिंडा ग्रैबर इस सच्चाई से वाकिफ थीं,तभी वो ऐसा अनोखा दृश्य रच पाती हैं।
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अब आप अपने मन की आंखों से एक स्वप्न रचिए कि माननीय राष्ट्रपति क्रिकेट वर्ल्ड के किसी मैच में नीली जरसी पहने भारत के खिलाड़ियों द्वारा लगाए जा रहे चौके छक्कों पर उन्हें झूमकर चीयर्स कर रहे हैं,माननीय प्रधानमंत्री हॉकी विश्व कप के किसी मैच में भारतीय खिलाड़ियों द्वारा किए गए गोलों पर मुष्टि भींचकर उतेजित हो रहे हैं,माननीय खेलमंत्री बॅडमिंटन एरीना से जीतकर निकल रहे खिलाड़ी को गले से लगाकर झूम उठें या फिर माननीय वित्त मंत्री पंजाब के किसी दंगल में दर्शकों के बीच से अचानक किसी पहलवान को चित कर देने पर जेब से निकाल कर ग्यारह हज़ार एक रुपये न्योछावर कर रहे हैं।
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आप मानो या ना मानो,खेल जितने मैदान में खेले जाते हैं उससे कहीं अधिक मैदान के बाहर से खेले जाते हैं।


Sunday, 8 July 2018

फुटबॉल विश्व कप 2018_5

                             





                              फुटबॉल विश्व कप 2018_5    
               

           कई बार आपकी रूचि टीमों में  सिर्फ खेल के कारण ही नहीं होती,उसके इतर कारण भी होते हैं।विश्व कप फुटबॉल में जो आठ टीमें क्वार्टर फाइनल मेंपहुंचीं उनमें से रूस और क्रोशिया दो ऐसी टीमें थीं जो तमाम संभावनाओं से भरी पर  सबसे ज़्यादा अंडर रेटेड टीमें थीं जिन्हें कप के शुरू होने से पूर्व किसी ने भाव नहीं दिया था। लेकिन प्रतियोगिता शुरू होने के बाद उनके शानदार खेल से वे आपकी सहानुभूति या फिर आपकी चाहत का बायस हो सकती थीं। आप इन दोनों ही टीमों को एक साथ आगे बढ़ने का चाहना से भरे हो सकते थे। इसे आप दुर्भाग्यपूर्ण मान सकते हैं दोनों टीमों को आपस में खेलना पड़ा और एक टीम बाहर हो गयी। लेकिन दूसरी तरह से सोचें तो ये भी कह सकते हैं ये अच्छा ही रहा कि कम से कम आप इनमें से एक टीम को तो आगे बढ़ता देख रहे हैं।

                      क्वार्टर फाइनल के जो चार मैच होने थे उनमें से ये आख़िरी ज़रूर था लेकिन एक ऐसा मैच था जो बहुत से लोगों के लिए ना केवल सबसे ज़्यादा प्रतीक्षित था,बल्कि सबसे ज़्यादा रूचि वाला भी था क्योंकि दोनों ही टीमें बहुत कुछ एक सा साझा करती हैं। दोनों ही पूर्वी यूरोप से और पूर्व के साम्यवादी ब्लॉक से आती हैं। साम्यवादी व्यवस्था ढ़हने के बाद अपने नए स्वरुप/अस्तित्व में आए दोनों ही देश (पूर्व में सोवियत  संघ और युगोस्लाविया) संक्रमण के काल से गुज़र रहे हैं और पुनर्निर्माण की प्रक्रिया में हैं। फ़र्क़ सिर्फ इतना है कि जहां रूस केंद्र में था और उससे से अलग हो कर अनेक राष्ट्र बने,वहीं क्रोशिया अपने केंद्र से अलग होकर अस्तित्व में आया। ये दोनों ही नयी टीमें थीं जिन्होंने 1992 में पहली बार अपने अंतर्राष्ट्रीय फुटबॉल मैच खेले थे और दोनों ही एक तरह की 'आइडेंटिटी क्राइसिस'  गुज़र रहे हैं । अगर क्रोशिया को अपने प्रसव और जन्म के बाद के भीषण संघर्षों के दिनों में मिले जख्मों पर मलहम लगाने  और अपने अस्तित्व को सिद्ध करने को बहुत कुछ करना है तो दूसरी और रूस का अपने पुराने गौरव  को पाने का संकट कहीं बड़ा और गहरा था। अपने विघटन से पहले वो खेलों सहित विभिन्न क्षेत्रों में महाशक्ति था जिसकी कि अब छाया मात्र भी नहीं रह गया है। इससे भी बड़ा संकट खेलों में ईमानदारी और शुचिता का है। पूरी दुनिया में डोपिंग के लिए सबसे बदनाम देश है।खेल अपने को सिद्ध करने का एक बड़ा जरिया होता है या हो सकता है। जब दोनों ही टीमें मैदान में उतरी होंगी ये स्मृतियाँ उनके ज़ेहन में रही होंगी और दोनों ही टीमें इस मैच को और इस प्रतियोगिता को बड़े अवसर के रूप में देख सोच रही होंगी। 

                                         दोनों ही टीमें लीग में शानदार खेल दिखा कर नॉकआउट में पहुंची थी और दोनों ने प्री क्वाटर फाइनल में प्रतिद्वंदियों को पेनाल्टी शूटआउट में हरा कर अंतिम आठ में प्रवेश किया था। अगर रूस के पास चेरीशेव और गोलकीपर अकिनफीव जैसे नए स्टार थे तो थे तो क्रोशिया के पास लुका मोड्रिक जैसा शानदार मिडफील्डर। अगर रूस के पास लेव याशिन जैसे महान गोलकीपर की परम्परा थी तो  क्रोशिया के पास डावर सुकेर जैसे महान खिलाड़ी की थाती थी। हाँ क्रोशिया को एक बढ़त थी। वो अपने पहले ही वर्ल्ड कप में सेमीफाइनल तक पहुंची थी और तीसरे स्थान पर रही थी,जबकि रूस की टीम पहली बार अब क्वार्टर फाइनल खेल रही थी। फिर क्रोशिया की 20 वीं रैंकिंग थी जबकि रूस की 70 वीं रैंक थी। लेकिन रूस की इस कमी को उसके अपने दर्शक पूरी कर रहे थे।   

                             दोनों ही टीमों ने पॉजिटिव नोट पर खेल शुरू किया। लगातार आक्रमण किए और अपने गोल को बचाए  रखे । पहली सफलता रूस को मिली चेरीशेव के शानदार गोल से। उसने पहले एक खिलाड़ी को बीट किया और फिर दो डिफेंडरों के बीच से पेनाल्टी बॉक्स के बाहर से लेफ्ट फुट से शानदार किक लगाई जो गोल के ऊपरी दाएं कोने में धंस गयी। ये किक इतनी शानदार थी कि क्रोशियाई गोलकीपर को रिएक्शन का समय तक नहीं मिला। ये इस प्रतियोगिता के सबसे शानदार गोलों में से एक था। लेकिन रूस की खुशी ज़्यादा देर नहीं टिकी। थोड़ी देर बाद ही क्रोशिया के क्रेमेरिक ने गोल कर  बराबरी पर ला दिया। पहले हाफ का ये स्कोर खेल के अंत तक बना रहा। खेल अतिरिक्त समय में पहुंचा। अब बढ़त क्रोशिया ने ली। गोल विडा ने किया। लगा क्रोशिया जीत जाएगा। तब हीरो की माफिक मारिओ फर्नांडीज आए जिन्होंने खेल समाप्ति से सिर्फ पांच मिनट पहले गोल कर मैच को बराबरी पर ला दिया। इस 120 मिनट में यदि गेंद पज़ेशन को छोड़ दें जो की क्रोशिया के पक्ष में था,मैच पूरी तरह बराबरी पर छूटा। पेनल्टी शूट में अंततः बाज़ी क्रोशिया के हाथ लगी। जो खिलाड़ी कुछ देर पहले हीरो बन गया था वो ही अब विलेन बन चुका था। रूस को बराबरी पर लाने वाले  मारिओ अपनी पेनल्टी शॉट चूक गए और रूस इतिहास रचने से। 

                      ये नियति थी। एक को ही आगे जाना था। एक को वहीं सफर ख़त्म कर देना था। नियति क्रोशिया के साथ थी। वो आगे बढ़ गई। रूस का समय नहीं था। वो रूक गई। आँसू हर किसी की आँख में थे। कुछ थामे थे, कुछ के बह रहे थे।कुछ की आँख से निकला पानी दुःख के नमक से काले सागर के पानी को कुछ और खारा कर रहा होगा और कुछ की आँख से निकला पानी ख़ुशी के शहद सा उनके अतीत के ज़ख़्मों पर मरहम का काम कर रहा होगा। हाँ रूस वासियों को इस बात का संतोष ज़रूर होगा कि वे रैंकिंग में भले ही 70वें नंबर पर हों और वे इस कप में मेज़बानी की वजह  से खेल रहे हों पर वे इसके लिए डिजर्व करते थे। और इस बात का भी कि तमाम विपरीत परिस्थितियों के बावजूद उन्होंने विश्व कप का शानदार आयोजन किया है।  
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 वे हार कर भी जीत गए। दरअसल उन्होंने दिलों को जीता है। 

Sunday, 1 July 2018

विश्व कप फुटबॉल 2018_4



              कुछ इच्छाएं अधूरी रहने के लिए अभिशप्त होती हैं 
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इस समय दुनिया भर में तमाम खेलों में उम्रदराज़ खिलाड़ी युवा खिलाड़ियों को खेल का ककहरा सीखा रहे हैं और नित नए कीर्तिमान स्थापित कर रहे हैं। टेनिस में लगभग 37 साल के रोज़र फेडरर और 32  साल के राफेल नडाल अपना सर्वश्रेष्ठ खेल दिखा कर एक और दो पायदान पर बने हैं और सार्वकालिक महान खिलाड़ियों की सूची में अपना नाम दर्ज़ करा रहे हैं तो 34 साल के जेम्स लेब्रोन पिछले चार सालों से एनबीए में कैवेलियर्स की टीम को अपने बूते लगभग अजेय बनाए हुए हैं।  महेंद्र सिंह धोनी 37 साल की उम्र में  क्रिकेट में  भारत के ही नहीं बल्कि दुनिया के सर्वश्रेष्ठ फिनिशर में गिने जाते हैं और  लिन  डान तथा साइना बैडमिंटन में रह रह कर शानदार प्रदर्शन कर रहे हैं। और हाँ सरदार सिंह हॉकी में ऐन इस समय अपनी सरपरस्ती में 30 साल की उम्र में भारत को चैम्पियंस ट्रॉफी के फाइनल में पहुंचा रहे हैं। तो ऐसे समय में फुटबॉल में एक 31 साल के खिलाड़ी से कुछ वैसी ही उम्मीद रखना बेमानी नहीं हो सकता। वो भी एक ऐसे खिलाड़ी से जो 5 बार 'बैलेन डी ओर' का ख़िताब जीत चुका हो,600 से ज़्यादा  अंतर्राष्ट्रीय गोल कर चुका हो,जो सार्वकालिक महान खिलाड़ी माना जाता हो और लीजेंड का दर्ज़ा हासिल कर चुका हो। 
                      लेकिन कोई नहीं। अक्सर ऐसा होता है। उम्मीदें टूट जाती हैं। सपने बिखर जाते हैं। जिसकी जिस समय सबसे ज्यादा चाहना होती है वो ठीक उसी समय हाथ से रेत की मानिंद फिसल फिसल जाती है। दरअसल कुछ चाहतें अभिशप्त हो जाती हैं जो कभी मुकम्मल होती ही नहीं। शायद मेस्सी की  विश्व कप फुटबॉल का ख़िताब जीतने की और उसके लाखों चाहने वालों के लिए उसके हाथ में फीफा कप ट्रॉफी देखने की इच्छा एक ऐसी ही अभिशप्त इच्छा है जिसे अब कभी पूरा नहीं होना है।
                         याद कीजिए 2016 का  कोपा अमेरिका कप का फाइनल। ये मेस्सी का लगातार तीसरा फाइनल था। इससे पहले 2014 के विश्व कप में जर्मन से और 2015 में कोपा कप में अर्जेंटीना की टीम चिली से हार चुकी थी। इस बार फिर हारी। पेनाल्टी शूटआउट में मेस्सी ने गेंद गोलपोस्ट के ऊपर मार दी थी। निराशा में मेस्सी के आँखों से आंसू बहने लगे थे जिसकी परिणति मेस्सी के अंतर्राष्ट्रीय खेल से संन्यास लेने की घोषणा में हुई। फ़ुटबाल जगत हतप्रभ रह गया। लेकिन कुछ इच्छाएं इतनी बलवती होती हैं वे रह रह कर उफान पाती हैं और उस उफान में सारे संकल्प बह जाते हैं। मेस्सी के साथ भी शायद कुछ ऐसा ही हुआ होगा। दो महीने बाद ही मेस्सी ने खेल  में वापसी की घोषणा की। और उसके बाद मेस्सी ने अपने दम पर अर्जेंटीना को विश्व कप फाइनल्स में पहुँचाया। इक्वेडोर के विरुद्ध निर्णायक मैच में तो मेस्सी ने हैट्रिक लगाई। 
                             और फिर देशवासियों की ही नहीं बल्कि पूरे विश्व में फैले लाखों प्रशंसकों की उम्मीदों का बोझ उठाए मेस्सी रूस पहुँच गए। पर उम्मीदों का बोझ इतना ज़्यादा था कि खेल का स्तर ऊंचा नहीं रख सके और आयरलैंड जैसी टीम के खिलाफ 1-1 से ड्रा मैच में पेनाल्टी गवाँ बैठे तो क्रोशिया के खिलाफ मैच 3-0 से हार गए। अब लगा अर्जेंटीना पहले ही दौर में बाहर जाने वाली है। लेकिन जब इतिहास की निर्मिति होनी होती है  नियति अपना रास्ता खोज ही लेती है। उम्मीदों के बोझ से मेस्सी उबरे। अपनी रंगत में लौटे।शानदार खेल दिखाया। विश्व कप का अपना पहला गोल किया। तंजानिया को 2 -1  से हराया और अर्जेंटीना को नॉक आउट दौर में पहुँचाया। 
                                  तब एक पूर्व चैम्पियन की दूसरे पूर्व चैम्पियन से भिड़ंत तय हुई। प्री क्वार्टर फाइनल में अर्जेंटीना का फ्रांस से खेलना तय पाया गया। शनिवार के दिन दोपहर बाद तातारिस्तान की राजधानी कज़ान के कज़ान एरिना में। ये क़यामत की शाम थी जिसमें लोगों ने एक क्लासिक मैच देखा।उन्होंने उम्मीदों के उफान को देखा और उसे बहते हुए भी देखा। ये दो महाद्वीपों के बीच मुकाबला था। ये फुटबाल की दो अलग शैलियों के बीच मुकाबला था। ये उम्मीदों की विश्वास से टकराहट थी।उम्रदराज़ों का युवाओं से सामना था। अनुभव जोश के मुक़ाबिल था। कलात्मकता रफ़्तार और शक्ति से रूबरू थी। जो मुकाबला मैदान में दो टीमों के बीच हो रहा था वो लाखों लोगों के लिए मेस्सी का फ्रांस से मुकाबला बन गया था। अगर लोग अर्जेंटीना को मेस्सी के लिए जीतता देखना चाहते थे तो खुद मेस्सी अर्जेंटीना के लिए जीतना चाहता था। मेस्सी ने अपना सब कुछ झोंक दिया। उसने कुल मिला कर दो असिस्ट किये। लेकिन अर्जेंटीना और जीत के बीच 19 साल का नौजवान एमबापा आ खड़ा हुआ। उसने केवल दो गोल ही नहीं दागे बल्कि एक पेनाल्टी भी अर्जित की। उसकी गति के तूफ़ान में अर्जेंटीना का रक्षण तिनके सा उड़ गया। मेस्सी का अर्जेंटीना 4 के मुकाबले 3 गोल से हार गया। लोगों की उम्मीदें हार गई। हताश निराश मेस्सी मैदान से बाहर निकले तो एक बार भी पीछे मुड़कर नहीं देखा। मानो वे इस असफलता को पलटकर देखना ही नहीं चाहते थे। 
            निश्चित ही उस दिन बहते  आंसुओं से कज़ान के वातावरण में कुछ ज़्यादा नमी रही होगी,कराहों से हवा में सरसराहट कुछ तेज हुई होगी,हार की तिलमिलाहट से सूरज का ताप कुछ अधिक तीखा रहा होगा,दुःख से सूख कर मैदान की घास कुछ ज़्यादा मटमैली हो गयी होगी और कजान एरीना से बाहर काजिंस्का नदी वोल्गा नदी से गले लग कर जार जार रोई होगी। 
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और ! 
और बहुत सारे लोगों के लिए फीफा विश्व कप 2018 यहीं समाप्त हो गया होगा !
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विश्व कप फुटबॉल 2018_3