Sunday, 8 July 2018

फुटबॉल विश्व कप 2018_5

                             





                              फुटबॉल विश्व कप 2018_5    
               

           कई बार आपकी रूचि टीमों में  सिर्फ खेल के कारण ही नहीं होती,उसके इतर कारण भी होते हैं।विश्व कप फुटबॉल में जो आठ टीमें क्वार्टर फाइनल मेंपहुंचीं उनमें से रूस और क्रोशिया दो ऐसी टीमें थीं जो तमाम संभावनाओं से भरी पर  सबसे ज़्यादा अंडर रेटेड टीमें थीं जिन्हें कप के शुरू होने से पूर्व किसी ने भाव नहीं दिया था। लेकिन प्रतियोगिता शुरू होने के बाद उनके शानदार खेल से वे आपकी सहानुभूति या फिर आपकी चाहत का बायस हो सकती थीं। आप इन दोनों ही टीमों को एक साथ आगे बढ़ने का चाहना से भरे हो सकते थे। इसे आप दुर्भाग्यपूर्ण मान सकते हैं दोनों टीमों को आपस में खेलना पड़ा और एक टीम बाहर हो गयी। लेकिन दूसरी तरह से सोचें तो ये भी कह सकते हैं ये अच्छा ही रहा कि कम से कम आप इनमें से एक टीम को तो आगे बढ़ता देख रहे हैं।

                      क्वार्टर फाइनल के जो चार मैच होने थे उनमें से ये आख़िरी ज़रूर था लेकिन एक ऐसा मैच था जो बहुत से लोगों के लिए ना केवल सबसे ज़्यादा प्रतीक्षित था,बल्कि सबसे ज़्यादा रूचि वाला भी था क्योंकि दोनों ही टीमें बहुत कुछ एक सा साझा करती हैं। दोनों ही पूर्वी यूरोप से और पूर्व के साम्यवादी ब्लॉक से आती हैं। साम्यवादी व्यवस्था ढ़हने के बाद अपने नए स्वरुप/अस्तित्व में आए दोनों ही देश (पूर्व में सोवियत  संघ और युगोस्लाविया) संक्रमण के काल से गुज़र रहे हैं और पुनर्निर्माण की प्रक्रिया में हैं। फ़र्क़ सिर्फ इतना है कि जहां रूस केंद्र में था और उससे से अलग हो कर अनेक राष्ट्र बने,वहीं क्रोशिया अपने केंद्र से अलग होकर अस्तित्व में आया। ये दोनों ही नयी टीमें थीं जिन्होंने 1992 में पहली बार अपने अंतर्राष्ट्रीय फुटबॉल मैच खेले थे और दोनों ही एक तरह की 'आइडेंटिटी क्राइसिस'  गुज़र रहे हैं । अगर क्रोशिया को अपने प्रसव और जन्म के बाद के भीषण संघर्षों के दिनों में मिले जख्मों पर मलहम लगाने  और अपने अस्तित्व को सिद्ध करने को बहुत कुछ करना है तो दूसरी और रूस का अपने पुराने गौरव  को पाने का संकट कहीं बड़ा और गहरा था। अपने विघटन से पहले वो खेलों सहित विभिन्न क्षेत्रों में महाशक्ति था जिसकी कि अब छाया मात्र भी नहीं रह गया है। इससे भी बड़ा संकट खेलों में ईमानदारी और शुचिता का है। पूरी दुनिया में डोपिंग के लिए सबसे बदनाम देश है।खेल अपने को सिद्ध करने का एक बड़ा जरिया होता है या हो सकता है। जब दोनों ही टीमें मैदान में उतरी होंगी ये स्मृतियाँ उनके ज़ेहन में रही होंगी और दोनों ही टीमें इस मैच को और इस प्रतियोगिता को बड़े अवसर के रूप में देख सोच रही होंगी। 

                                         दोनों ही टीमें लीग में शानदार खेल दिखा कर नॉकआउट में पहुंची थी और दोनों ने प्री क्वाटर फाइनल में प्रतिद्वंदियों को पेनाल्टी शूटआउट में हरा कर अंतिम आठ में प्रवेश किया था। अगर रूस के पास चेरीशेव और गोलकीपर अकिनफीव जैसे नए स्टार थे तो थे तो क्रोशिया के पास लुका मोड्रिक जैसा शानदार मिडफील्डर। अगर रूस के पास लेव याशिन जैसे महान गोलकीपर की परम्परा थी तो  क्रोशिया के पास डावर सुकेर जैसे महान खिलाड़ी की थाती थी। हाँ क्रोशिया को एक बढ़त थी। वो अपने पहले ही वर्ल्ड कप में सेमीफाइनल तक पहुंची थी और तीसरे स्थान पर रही थी,जबकि रूस की टीम पहली बार अब क्वार्टर फाइनल खेल रही थी। फिर क्रोशिया की 20 वीं रैंकिंग थी जबकि रूस की 70 वीं रैंक थी। लेकिन रूस की इस कमी को उसके अपने दर्शक पूरी कर रहे थे।   

                             दोनों ही टीमों ने पॉजिटिव नोट पर खेल शुरू किया। लगातार आक्रमण किए और अपने गोल को बचाए  रखे । पहली सफलता रूस को मिली चेरीशेव के शानदार गोल से। उसने पहले एक खिलाड़ी को बीट किया और फिर दो डिफेंडरों के बीच से पेनाल्टी बॉक्स के बाहर से लेफ्ट फुट से शानदार किक लगाई जो गोल के ऊपरी दाएं कोने में धंस गयी। ये किक इतनी शानदार थी कि क्रोशियाई गोलकीपर को रिएक्शन का समय तक नहीं मिला। ये इस प्रतियोगिता के सबसे शानदार गोलों में से एक था। लेकिन रूस की खुशी ज़्यादा देर नहीं टिकी। थोड़ी देर बाद ही क्रोशिया के क्रेमेरिक ने गोल कर  बराबरी पर ला दिया। पहले हाफ का ये स्कोर खेल के अंत तक बना रहा। खेल अतिरिक्त समय में पहुंचा। अब बढ़त क्रोशिया ने ली। गोल विडा ने किया। लगा क्रोशिया जीत जाएगा। तब हीरो की माफिक मारिओ फर्नांडीज आए जिन्होंने खेल समाप्ति से सिर्फ पांच मिनट पहले गोल कर मैच को बराबरी पर ला दिया। इस 120 मिनट में यदि गेंद पज़ेशन को छोड़ दें जो की क्रोशिया के पक्ष में था,मैच पूरी तरह बराबरी पर छूटा। पेनल्टी शूट में अंततः बाज़ी क्रोशिया के हाथ लगी। जो खिलाड़ी कुछ देर पहले हीरो बन गया था वो ही अब विलेन बन चुका था। रूस को बराबरी पर लाने वाले  मारिओ अपनी पेनल्टी शॉट चूक गए और रूस इतिहास रचने से। 

                      ये नियति थी। एक को ही आगे जाना था। एक को वहीं सफर ख़त्म कर देना था। नियति क्रोशिया के साथ थी। वो आगे बढ़ गई। रूस का समय नहीं था। वो रूक गई। आँसू हर किसी की आँख में थे। कुछ थामे थे, कुछ के बह रहे थे।कुछ की आँख से निकला पानी दुःख के नमक से काले सागर के पानी को कुछ और खारा कर रहा होगा और कुछ की आँख से निकला पानी ख़ुशी के शहद सा उनके अतीत के ज़ख़्मों पर मरहम का काम कर रहा होगा। हाँ रूस वासियों को इस बात का संतोष ज़रूर होगा कि वे रैंकिंग में भले ही 70वें नंबर पर हों और वे इस कप में मेज़बानी की वजह  से खेल रहे हों पर वे इसके लिए डिजर्व करते थे। और इस बात का भी कि तमाम विपरीत परिस्थितियों के बावजूद उन्होंने विश्व कप का शानदार आयोजन किया है।  
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 वे हार कर भी जीत गए। दरअसल उन्होंने दिलों को जीता है।