Tuesday, 30 October 2018

आखिर नाम में ही तो सब कुछ है


आखिर नाम में ही तो सब कुछ है 
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किसी जगह का नाम बदलना मेरे लिए किसी बड़ी परिघटना की तरह नहीं होता था। ऐसा होना महज़ शब्द भण्डार में एक और संज्ञा का बढ़ जाना भर था या फिर सामान्य ज्ञान में एक और सवाल का बढ़ जाना भर। प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करते वक़्त बहुत सारी जगहों के पुराने-नए नाम याद किया करते थे। आखिर किसी जगह के नाम बदलने की परम्परा नयी नहीं थी। देश में ही नहीं विदेशों में भी। तमाम शहरों और जगहों के नाम बदले। क्या फर्क पड़ा। सिवाय इसके कि आपके सामान्य ज्ञान में एक और शब्द का इजाफा हुआ कि बम्बई अब मुंबई हो गया या फिर मद्रास चेन्नई। यहां तक कि जब मुग़लसराय दीन दयाल उपाध्याय नगर हुआ तब भी ये बदलाव महज एक नाम का बदलाव भर था।
                           लेकिन अब जब इस महबूब शहर का नाम बदल गया है। 'इलाहाबाद' जब 'प्रयागराज' हो गया है,तो ऐसा क्यूँ नहीं लगता कि ये भी एक शहर के नाम का सिर्फ एक  बदलाव भर है। निसंदेह प्रयागराज सुन्दर नाम है। बहुत से लोग पहले भी इस नाम का प्रयोग करते रहे हैं। तो क्या फर्क है किसी और जगह के  और इस शहर के नाम बदल जाने में। 
                            दरअसल ये फ़र्क़ जगह का है। जिन जगहों पर आप जीते हैं और जिन जगहों को आप जीते हैं,उन जगहों के नाम बदलने पर फ़र्क़ महसूस होता है और खूब होता है। ये वो जगहें होती हैं जिनमें आप रचे बसे होते हैं और वे आप में रची बसी होती हैं। उन जगहों की पहचान उनके नाम होते हैं और उन जगहों की तरह वे नाम भी आपके भीतर तक गहरे पैठे होते हैं। और इन्हें नयी पहचान देना निसंदेह दुष्कर होता है।
                      जिन जगहों को मैंने शिद्दत से जिया,उनमें से तीन ऐसी जगहें थीं जिनके नाम बदले। पहला मेरा गांव।सरकारी दस्तावेज़ों में दर्ज नाम 'सुंदरा उर्फ़ पूठा'। जो 'पूठा' के नाम से जाना जाता है और बोलचाल में 'पुट्ठा'।किसी भी गाँव की तरह आम गाँव। कच्चे पक्के घर। बड़े बड़े घेर और उसमें ढेर सारे डंगर। ऐसा गांव जिसकी अलमस्त सुबहें खेत दिशा जाती महिलाओं की बातों की गुनगुनाहट,खेत जाते बैलों और हलों की सरसराहट,हाथ में तख्ती और पट्टी लिए बच्चों की खिलखिलाहट और उससे मेल खाती चिड़ियों की चहचहाअट से गुलज़ार रहती। उनींदी सी अलसाई दोपहरें जिसमें नीम के पेड़ों तले बैठे ताश खेलते बेफिक्र किसानों की आवाज़ों की खनखनाहट खलल डालती। सुरमई शामें खुद किसानों के गले से या फिर ट्रांजिस्टर से बजती रागनियों से महकती। और निस्तब्ध नीरव रातें दादुर की टरटराहट,झींगुरों की भनभनाहट और सियारों के रुदन से बेचैन होती और रह रह कर डंगरों के गले में बंधी घंटियों की आवाजों से गमकती।लेकिन जल्द ही विकास की आंधी सब कुछ बहा ले गयी।नाम भी और पहचान भी।शहर सुरसा के मुख की तरह विस्तारित हुआ और आस पास के गॉवों को ग्रसता गया। शहर ने गॉव को चारों और से घेर लिया। उसका जीवन रस चूस लिया। और गला घोंट दिया। ज़मीनों के बदले लोगों को मुआवज़ा मिला। अब घर दबड़ों में बदल गए। हल,बैल और ट्रैक्टरों की जगह मोटर साइकिलों और कारों ने ले ली। अब सुबहें और दोपहरें वाहनों और उनके हॉर्न की चीखों के शोर से आहत होने लगीं तो शामें और रातें रागनियों की जगह आवारा कुत्तों के भोंकने और शराबियों की गालियों से कराहने लगीं।गाँव को नयी पहचान मिली 'वेदव्यास पुरी'।पर आज भी उसकी पहचान 'पुट्ठा'से ही होती है और दिल भी 'वेदव्यास पुरी' में 'पुट्ठा' ही ढूंढता है।
दूसरी जगह एटा जिले की तहसील कासगंज। इसमें कभी रहा नहीं। फिर भी जीवन का अभिन्न हिस्सा। यहां सैकड़ों बार खेलने गया।क्रिकेट पहला प्यार। यही जगह इस प्यार के अलगाव की वजह बनी। कैच पकड़ते समय सीधे हाथ की माध्यिका में चोट लगी।वो उँगली आज भी कुछ टेढी है।क्रिकेट छूट गया और कासगंज याद रह गया। ये जलीस भाई की वजह से भी याद है। उस समय वेस्टइंडीज के तेज गेंदबाज़ों का खौफ हुआ करता था और एटा के क्रिकेट सर्किल में जलीस भाई का।कहते हैं जलीस उस समय के राष्ट्रीय गेंदबाजों जितनी तेज गेंद  फेंकते थे।वे यू पी टीम के प्रबल दावेदार थे।पर उनका कोई माई बाप नहीं था।चयन नहीं हो पाया।उनकी गेंद पर बल्ले के किनारे से लगकर थर्ड मैन और और गली के ऊपर से कई बार छक्के लगते देखे थे और कई बार खुद भी उनकी गेंदों को कान के पास से सरसराते हुए गुज़रते देखा था। उस कहर बरपाती तेज गेंदबाजी का खौफ आज भी दिमाग पर तारी है।भले ही वेस्ट इंडीज़ की पेस बैटरी का खौफ ना देखा हो पर जलीस की गेंदबाजी के उस खौफ से उसका अंदाज़ लगाना मुश्किल भी नहीं। उसके बहुत बाद भी एटा से फरीदपुर जाते हुए कासगंज की सडकों से ही गुज़रते थे।आज भी स्मृतियों में वो शहर कासगंज के नाम से अंकित है। उसका बदला नाम अभी गूगल से जाना काशीराम नगर।
 और अब इलाहाबाद। सपनों का, ख़्वाबों का, सपनों को देखने का और उन्हें हक़ीक़त में बदलने का जो शहर था उसका नाम इलाहाबाद ही था प्रयाग नहीं।जिस सपनीले शहर को सबसे पहले किशोरावस्था में धर्मवीर भारती की नज़र से देखा था वो शहर इलाहाबाद ही था।जिस शहर में ज़िन्दगी के 35 सबसे अहम साल जिए और जिस शहर को 35 साल जिया वो कोई और नहीं इलाहाबाद ही था । 25 पैसे प्रति घंटे की किराए की साइकिल से जिस शहर की तमाम गलियों को दिन रात गहाते हुए मन पर स्मृतियों  की जो अमिट पगडंडी बनी है उस शहर का नाम कुछ और नहीं इलाहाबाद ही है। जिस शहर ने जीवन को जीने की सलाहियत दी और सलाहियत से जीवन जीने दिया वो इलाहाबाद ही है। वो शहर जो आपके दुःख दर्द,सुख दुःख का भागीदार रहा हो,वो शहर जिसने आपको मनुष्य बनने की प्रक्रिया में रत किया हो,वो शहर जिसने मुहब्बत करनी सिखाई हो,वो शहर जिसने आपको आजीविका दी हो,वो शहर जिसमें आपका एक खूबसूरत परिवार बना हो,वो शहर जिसने आपको बेपनाह मोहब्बत करने वाले दोस्त दिए हों,वो शहर इलाहाबाद ही है। गर वो शहर आपकी रग रग ना बस जाता तो क्या होता। उस शहर की पहचान आपके भीतर कहीं गहरे ना पैठ जाती तो क्या होता। 
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अर्से पहले मुझे भी शेक्सपियर की जूलियट की तरह लगता था कि 'नाम में क्या रखा है'। पर अब नहीं। बनिस्बत अब शायर अनजान का गीत याद आता है 'प्यार कागज़ पे लिखी कहानी नहीं'।दरअसल किसी शहर का नाम दस्तावेज़ों में दर्ज़ एक निर्जीव शब्द भर नहीं कि जब चाहो बदल दो बल्कि शहर में जीने वालों और शहर को जीने वालों की संवेदनाओं और संवेगों के रस में पगी सजीव संज्ञा है।  
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बिला शक प्रयागराज एक खूबसूरत नाम है। उसे चाहने वालों को शहर का ये नया नाम मुबारक और हमें अपना !



Sunday, 14 October 2018

एक वो और एक लॉन



एक वो और एक लॉन 

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ये शहर की एक पॉश लोकैलिटी है। इसे कभी अंग्रेज साहबों की रिहायश के लिए बसाया गया था। यहाँ बहुत सी बड़ी बड़ी पुरानी कोठियां हैं।ये कोठियाँ कई कई एकड़ में फ़ैली हैं। ज़्यादातर कोठियां रखरखाव के अभाव में भुतहा जंगल सी प्रतीत होती हैं। हर कोठी में सामने एक भरा पूरा  लॉन है। सामने नीरव शांत सड़कें। सड़क के दोनों और घने छायादार वृक्ष। इन्हीं कोठियों में से एक का बहुत ही खूबसूरत सा 'लॉन' है । उस कोठी की चहारदीवारी बहुत ऊँची नहीं हैं। सड़क से आते जाते ये 'लॉन' सबको दिखाई देता है।


इस 'लॉन' में यूँ तो उस कोठी में रहने वाले लोग अक्सर ही दिखाई देते हैं। खासकर शाम के समय। कई बार उस कोठी में आने वाले लोग भी मेजबानों के साथ बैठे दिखाई देते हैं। कभी कभार बच्चे भी खेलते खालते दीख जाते हैं । पर एक ऐसा व्यक्ति है जो सुबह से शाम तक उस लॉन के किसी ना किसी कोने में हमेशा दिखाई देता है। ये 'लॉन' और 'वो' व्यक्ति दोनों बरसों से ऐसे ही दीख रहे हैं। एक दूसरे के साथ। एक दूसरे से गुंथे हुए। एक दूसरे में समाए हुए। ऐसा लगता है मानो एक दूसरे के लिए ही बने हैं। इतने सालों में बहुत ही कम मौके ऐसे आए होंगे जब 'वो' 'वहां' ना दिखाई दिया हो,बहुत ही कम।
'वो' यानी एक दुबला पतला स्याह सा आदमी। शरीर पर उसी के रंग से मेल खाते मटमैले से कपड़े। हो सकता है वे भी कभी सुर्ख रंगों वाले रहे हों। लेकिन जिसने भी देखा उसे ऐसे ही मटमैले स्याह रंग वाले वस्त्रों में देखा। सच तो ये है कि वस्त्र कहना शायद निर्लज्जता भी मानी जा सकती है। दरअसल वे चिथड़े होते हैं जिन पर कई जगह थेकलियां लगी होतीं हैं। कई जगह सीवन उधड़ी होती। और जिस शरीर पर ये वस्त्र टंगे होते वो शरीर क्या बस समझो अस्थियों का एक जालनुमा कोई चीज़ है। एक ऐसी चीज जिसमें लकड़ीनुमा अस्थियों को बेतरतीब सा एक दूसरे के ऊपर रख ज्यामिति बना दी गई है। हाँ, सर पर बेहिसाब बाल हैं जो बेतरतीब से चारों और बिखरे रहते हैं। पर क्या ही कमाल है कि असंतुष्टि के तमाम उपादानों के बावजूद उसके चेहरे पर एक भोली सी मुस्कान पसरी रहती है।
'उसका' यानी लॉन का और 'वो' के चेहरों का भूगोल लगभग एक सा है। दोनों के चहरे लगभग सपाट और चौकौर। 'उसके' चेहरे पर फूलों की खुशनुमा सी मुस्कराहट हर मौसम में बिखरी रहती है। फ़िज़ा में फ़ैली उन फूलों की सुगंध 'उसके' चहरे की मुस्कान को स्निग्धता से भर देती है। और 'उसकी' इस स्निग्ध मुस्कराहट से 'वो' के चहरे की मुस्कराहट थोड़ी और गोलाई ले लेती है और 'वो' के चहरे के चौकोरपने को थोड़ा ढीला कर देती,उसके चहरे के किनारों की तीक्ष्णता को थोड़ा स्मूद कर देती है। 'वो' के चहरे की मुस्कराहट जितनी गोल होती जाती एक संतुष्टि का भाव सुर्ख से सुर्खतर होता जाता है। ऐसा लगने लगता है कि 'वो' के चहरे की संतुष्टि एक स्थायी भाव है। 'वो' का चेहरा कठोर है। पर ये कठोरता मुस्कराहट की मुलायमियत और बेफिक्री की आभा में हमेशा छिपी रहती है। ठीक वैसे ही जैसे 'उसकी' ज़मीन की कठोरता घास की मुलायमियत से ढकी रहती है। खिलते,महकते,झूमते फूल मंद मंद हवा में जितनी ज़्यादा अपनी सुगंध बिखेरते जाते,उतना ही 'वो' का रूखा सूखा चेहरा लावण्य से भर भर जाता है।
'वो' 'उसके' भीतर हर समय गतिशील रहता है। हर समय। समय के हर अंतराल में 'वो' एक अलग जगह पर दीखता है। अभी यहां तो थोड़ी देर में सरक कर वहां,फिर और आगे,फिर और आगे। मानो ये सरकना ही उसकी जिंदगी हो। 'वो' की गतिशीलता की सीमा 'उसकी' चौहद्दी है। ऐसा लगता मानो 'वो' समय के दायरे में बहता एक पल है। निर्द्वन्द सा। लेकिन उद्दंड नहीं। उसके बहने में एक लय है। किसी राग की बंदिश की तरह। उसके बहाव को देखकर अहसास होने लगता है मानो वो एक हिमखंड है। एक विशाल हिमपिंड से टूटा छोटा सा हिमखंड जो अपार नीली जल राशि में मंद गति से तैर रहा हो। फ़र्क़ रंग का है। वो हिमखंड के शुभ्र रंग की तरह नहीं है। वो स्याह है और घास के हरे समुद्र में दरख्तों और पेड़ पौधों से अठखेलियां करता बहता रहता है। स्याह रंग वाला 'वो' 'उसकी' खूबसूरती पर काला टीका लगा होने का आभास देता है। कभी कपाल पर, कभी गाल पर,कभी भाल पर। आखिर वो उसका टीका हो भी क्यूँ ना। उसने इतने जतन से उसे सजाया जो है। उसके बरसों की पसीने की कमाई है। ऐसे में किसी की नज़र लग गई तो। मखमली हरी घास और दुनिया भर के रंग बिरंगे और महक वाले खूबसूरत फूलों और बहुत सारे दरख्तों के बीच 'वो' टीका ही हो सकता है। उससे कम या ज़्यादा कुछ भी नहीं।
'वो' हमेशा 'उसके' पेड़ पौधों से एक गहरे संवाद में संलग्न रहता है। कई बार लगता वो उनके प्यार में है। उसके हाथ में हमेशा लौह धातु का एक औजार होता है। उसके हाथ में इस औजार को देख कर 'उसके' शत्रु होने का संदेह हो सकता है। पर ऐसा है नहीं। ये कठोर धातु वाला औजार दरअसल 'उसकी' और 'वो' की मुलायम मीठी मुस्कराहट का सबसे बड़ा कारक है। 'वो' के सधे हाथ अपने औजार से मृदा और वनस्पति से संवाद करते हुए इतने नियंत्रित ढंग से चलायमान होते मानो कोई वाद्ययंत्र बजा रहा हो। इस औजार के जरिए ही तो 'वो' ना केवल मृदा से बल्कि 'उसके' सभी रहवासों से भी संवाद करता है। एक ऐसा संवाद जिसमें गजब की लय है जो धीरे धीरे संगीत में रूपांतरित होती जाती और अनगिनत रंगों के रूप में चारों और बिखर बिखर जाता है। 'वो' 'उसके' प्यार में है तो संगीत के रंग बिखरने लाजिमी हैं। इस संगीत को 'वो' के 'उसके' रहवासों के साथ किये जा रहे संवाद को देख कर ही महसूस किया और सुना जा सकता है।
'उसके' प्यार में डूबा 'वो' 'उसको' हर ताप संताप से बचाने का जतन करता है। इस प्रयास में 'वो' पेड़ पौधों और दरख्तों के इर्द गिर्द उग आते अवांछित तत्वों का सफाया करके एक बड़े दरख़्त के नीचे इकट्ठा करता रहता है। शाम होते होते उस ढेर को बाहर फेंक आता है। ये क्रम अनवरत चलता रहता है। ये ढेर सूख कर उसकी तरह स्याह हो जाता है। जब तब 'वो' उस ढेर के पास सुस्ताने बैठता है तो वे एक जैसे दो ढेर लगते हैं। कभी कभी तो वो और ढेर मिलकर एक बड़ा ढेर लगने लगते हैं। 
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क्या पता किसी एक दिन 'वो' को भी उसी ढेर में बदल जाना है।
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क्रिया को बदलते देर नहीं लगती। 'वो' अब 'है' से 'था' में बदल गया। और निपट अकेला 'लॉन' धीरे धीरे जंगल में परिवर्तित हो रहा है।

Tuesday, 2 October 2018

कहानी



वो राजा 
वो रानी
वो चुड़ैलों के किस्से
वो परियों की कहानी
कभी नानी की जुबानी
तो कभी दादी की जुबानी
कहाँ वो दिन अब
कहाँ वो रातें
इन्टरनेट की सर्चें अब
और इन्टरनेट की चैटें।