Sunday, 18 September 2016

बात फुटबॉल की



                           1. इसमें किसी को कोई शक नहीं होना चाहिए कि फुटबॉल विश्व का सबसे लोकप्रिय खेल है। पिछले दिनों दो बड़ी फुटबॉल प्रतियोगिताओं के रोमांच में सारा विश्व डूबता उतराता रहा। भारत भी इसका अपवाद नहीं रहा। एक कोपा अमेरिका कप जो अमेरिका में खेला गया और चिली विजेता बना। इस प्रतियोगिता के आयोजन के 100 साल पूरे होने के अवसर पर ये इसका 45वां विशेष  संस्करण था जिसमें दो फुटबॉल परिसंघों-द साउथ अमेरिकन फुटबॉल कॉन्फेडरेशन (CONMEBOL)और द फुटबॉल कॉन्फेडरेशन फॉर नार्थ एंड सेंट्रल अमेरिका एंड द कैरेबियन(CONCACAF)-की कुल 16 टीमों ने भाग लिया।दूसरा यूरो कप 2016 जो फ्रांस में खेला गया। इसमें कुल 24 टीमों ने भाग लिया और पुर्तगाल विजेता बनी।जब ये दोनों प्रतियोगिताएं साथ चल रही थी तो उन्हें आप एक साथ एक दूसरे के समानांतर चलते हुए भी देख सकते थे और एक दूसरे के आमने सामने खड़ा भी देख सकते थे। दोनों में बहुत कुछ  एक सा घट रहा था और  कुछ ऐसा भी घट रहा था जो एक  दूसरे के एकदम उलट था।

                                 2.अब यूरो कप फाइनल को ही लीजिए। पुर्तगाल और फ्रांस के बीच खेला गया ये फाइनल मैच इतिहास को दोबारा जी रहा था,एकदम हाल के इतिहास को। दरअसल ये फाइनल दो मैचों को एक साथ दोहरा रहा था। एक तरफ ये फ्रांस और जर्मनी के बीच खेले गए मैच को दोहरा रहा था। उस मैच में जर्मनी एक बेहतर सम्भावनाओं वाली टीम थी। इतिहास उसके साथ था। वो बेहतर खेली भी। ज्यादातर समय खेल फ्रांस की पेनल्टी बॉक्स के आस पास सिमटा था। जर्मनी टीम का अभेद्य रक्षण था। पर कोई क्लोसे उसके पास नहीं था। और जर्मनी हार गयी। अब फाइनल में वही सब फ्रांस के साथ घट रहा था। इतिहास फ्रांस के साथ था। फ्रांस पुर्तगाल की तुलना में बेहतर संभावनाओं वाली टीम थी। उसने शानदार खेलते हुए फाइनल में प्रवेश किया था। इसके विपरीत पुर्तगाल गिरते पड़ते यहां तक पहुँचा था।वो ना केवल विश्व चैंपियन रह चुका था बल्कि ये प्रतियोगिता भी तीन बार जीत चुका था।फुटबॉल की दुनिया का नया सितारा ग्रीजमान  उनके पास था। यहां फ्रांस ने बेहतर खेला भी।पर यहां एक बार फिर बेहतर खेलते हुए एक बेहतर संभावनाओं वाली टीम हार गयी।
                
                          3.दूसरी ओर मानो ये मैच कोपा कप फाइनल का रिप्ले  हो। कोपा  कप में एक ओर नामी गिरामी अर्जेंटीना की टीम थी तो दूसरी और कम सम्भावनाओं वाली चिली की टीम थी जैसे यहाँ फ्रांस के आगे पुर्तगाल की सम्भावना कमतर थीं। दोनों ही जगह कमतर संभावनाओं वाली टीमें जीतीं। दोनों ही मैचों में विश्व के दो सबसे बड़े खिलाडियों का मानों सब कुछ दांव पर लगा था। लियोनेस मेस्सी और क्रिस्टियानो रोनाल्डो ने अपने अपने क्लब के लिए शानदार जीत हासिल की हैं। लेकिन दोनों ही अपनी राष्ट्रीय टीम के लिए कोई ख़िताब नहीं जीत सके थे। यदि मेस्सी 2014 के विश्व कप सहित चार फाइनल खेल कर  कोई ट्रॉफी  हाथ में नहीं उठा सके थे(ओलम्पिक को छोड़ कर) तो रोनाल्डो भी 2004 में यूनान के हाथों यूरो कप के फाइनल में चूक गए थे। दोनों जगह कमतर टीम विजेता बनीं। दोनों जगह दोनों उस्तादो को अश्रुपूर्ण नेत्रों से मैदान छोड़ना पड़ा। रोनाल्डो चोट खाकर बीच मैच में बाहर हो गए तो मेस्सी असफल पेनाल्टी किक के बाद। लेकिन ये विधि का विधान था कि  दोनों के नतीजे अलग होने थे। जिस समय मेस्सी गोल चूके उस समय इतनी देर हो चुकी थी कि उनके साथी उनके लिए जीत हासिल करने को एकजुट हो सकें,पर पुर्तगाल के खिलाडियों ने ऐसा कर दिखाया। उन्होंने अपने कप्तान और अपने हीरो के लिए यूरो कप जीत लिया। एक तरफ एक सपना आंसुओं के साथ किरच किरच बह रहा था तो दूसरी और एक सपना सपना  आंसुओं के पानी में सतरंगी इंद्रधनुष सा मन के आकाश पर नुमाया हो रहा था। एक और एक सपना दुःख और शर्म के बोझ तले दब कर ज़मीन में गहरे दबा जा रहा था तो दूसरी और एक सपना सफलता के रथ पे सवार हो  उत्साह और उमंग की कुंचाले भर रहा था।

                               4.दोनों ही फाइनल में दो टीमें जीती थीं। उनकी जीत के पीछे पूरी टीम की मेहनत थी। लेकिन दोनों ही फाइनल में दो इतने बड़े खिलाड़ी खेल रहे थे कि उनकी चर्चा के आगे टीमों की जीत नेपथ्य में चली गई। चिली की टीम में कोई बहुत बड़ा खिलाड़ी नहीं था। पर पूरी टीम एकजुट होकर खेली और  दिखाया कि टीम के आगे स्टार का कोई वज़ूद नहीं होता। जीत टीम के 11 खिलाड़ी दिलाते हैं। पर व्यक्ति पूजा मानव के स्वभाव में है जो पूरी टीम के बजाय नायक को महत्व देता है। उसकी सफलता असफलता  हावी हो जाती है। चिली के साथ ऐसा ही हुआ। एक कम संभावनाओं वाली चिली की टीम ने शानदार खेल दिखाया पर उसकी सर्वथा प्रशंसनीय जीत पर मेस्सी की असफलता हावी हो गयी। उसकी असफलता को चिली की  महत्वपूर्ण जीत से कहीं ज़्यादा महत्व मिला। ठीक ऐसा ही यूरो कप फाइनल में हुआ। रोनाल्डो जल्द ही चोटिल होकर  बाहर आ गए। तब पुर्तगाल की टीम ने अपने देश और अपने कप्तान के लिए कप जीता।  रोनाल्डो के आंसू,उनकी मैदान से बाहर की गतिविधियाँ और अन्ततः  देश के लिए कोई ख़िताब जीत लेना पुर्तगाल जीत से ज़्यादा महत्वपूर्ण हो गया।

                                 5.एक बात और। समान महत्व की होते हुए भी कम से कम भारत मीडिया द्वारा इन दोनों ही प्रतियोगिताओं के कवरेज में खासा भेदभाव बरता। जहाँ यूरो कप को प्रमुखता से छापा या दिखाया गया,वही कोपा कप को हमेशा यूरो कप के बाद ही स्थान मिला। यहाँ तक कि जिस समय कोपा अमेरिका कप के नॉक आउट दौर के मैच शुरू हुए उस समय यूरो कप के लीग मैच खेले जा रहे थेतब भी यूरो कप के लीग मैचों को प्रमुखता मिली। अंगरेजी अखबार टाइम्स ऑफ़ इण्डिया में यूरो कप को हमेशा  खेल पेज के पहले पेज  पर जगह मिली और कोपा कप को उसके बाद। यही हाल हिंदी अखबारों का था। यदि यूरो कप की खबर को तीन कलम मिले तो कोपा को दो या एक और यूरो  नीचे ही जगह मिली। यदि इन दोनों प्रतियोगिताओं की तुलना करें तो हर दृष्टि से समान महत्त्व की थीं। जहां यूरो में जर्मनी,फ्रांस,इटली,बेल्जियम'स्पेन जैसी टीमें थीं तो कोपा कप में ब्राज़ील,अर्जेंटीना,उरुग्वे चिली और मैक्सिको जैसी टीमें थीं। यदि यूरो में रोनाल्डो,ग्रीजमान,गिरोड,नानी,गेरेथ बेल जैसे खिलाड़ी थे तो  कोपा कप में भी मेस्सी,सांचेज़,क्लाडियो ब्रेवो,वर्गास जैसे खिलाड़ी थे।ब्राज़ील में 2014 में संपन्न विश्व कप में अंतिम 16 में जिन टीमों ने जगह बनायीं  उनमे से 6 यूरो कप में थीं-नीदरलैंड,जर्मनी,फ्रांस,बेल्जियम स्विट्ज़रलैंड और ग्रीस जबकि 7 टीमें  कप में खेल रही थीं-ब्राज़ील,अर्जेंटीना,चिली,कोलम्बिया,उरुग्वे,यूएसए,कोस्टारिका और मैक्सिको। मीडिया का पक्षपात रवैया स्पष्ट तौर पर सामने आया। ये अभी भी औपनिवेशिक गुलामी में जी रही है। जिसे पच्छिम और विशेष तौर पर यूरोपीय देशों की हर बेजां चीज़ भी खूब सुहाती है। कोपा कप की कलात्मकता पर यूरो कप की पॉवर और टेकनीक भारी पड़ी।
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