Wednesday, 7 September 2016

ये कुश्ती वो कुश्ती तो नहीं

                                                

         सुशील कुमार -नरसिंह विवाद और और उसका सीक्वल नरसिंह डोप टेस्ट विवाद भारतीय खेल इतिहास का एक बहुत ही दुर्भाग्यपूर्ण और शर्मनाक घटना है जिसके निश्चित ही दूरगामी परिणाम होंगे। सबसे दुखद तो ये है कि नेपथ्य में बैठे कुछ लोगों की महत्वकाक्षांओं और उनके स्वार्थों की कुश्ती देश के दो सबसे होनहार पहलवान रेसलिंग एरीना में बिछे गद्दों पर नहीं बल्कि उससे बाहर लड़ रहे हैं। पहले दौर की लड़ाई हाई कोर्ट में जाकर समाप्त होती है तो दूसरे दौर की लड़ाई नरसिंह के प्रतिबन्ध पर जाकर। लड़ाई शुरू हुई रियो ओलम्पिक में जाने के दावे को लेकर लेकिन अंत हुआ दोनों में से किसी के भी ओलम्पिक में जाने की किसी भी संभावना के समाप्त होने पर। 25 जून और 5 जुलाई को डोप टेस्ट के लिए नरसिंह के लिए गए दोनों नमूने पॉजिटिव पाए गए। नमूने पॉजिटिव पाए जाने की खबर के तुरंत बाद एक आरोप रचा गया कि ये उनके यानी नरसिंह के विरुद्ध षड़यंत्र है। इशारा निश्चित ही उनके प्रतिद्वंदी खिलाड़ी की तरफ था। आनन् फानन में एक रसोइया सामने आता है,प्रतिबंधित सप्लीमेंट मिलाने वाला पहचाना जाता है और नाड़ा के सामने पेश होने से एक दिन पहले पुलिस में एफआईआर दर्ज़ करा दी जाती है। साथ ही कुश्ती संघ द्वारा क्लीन चिट दे दी जाती है कि नरसिंह ऐसा नहीं कर सकता है। 
               लेकिन यहाँ ये आरोप कि उसे फ़साने का षड़यंत्र प्रतिद्वंदी पहलवान खिलाड़ी द्वारा किया गया,खुद अपना एक प्रतिपक्ष रचता है। वो ये कि क्या प्रतिद्वंदी पहलवान सबसे सॉफ्ट टारगेट नहीं है अपनी गलती का दोष उसके मत्थे मढ़ कर उसे बदनाम करके सहानुभूति खुद बटोर लो। इससे अपनी बचत होती है तो ठीक वरना प्रतिद्वंदी के रियो जाने का रास्ता तो बंद होना तय है ही। डोप टेस्ट के परिणाम आने के तुरंत बाद जिस तरह से षड़यंत्र थ्योरी सामने आई और जिस तरह से कुश्ती संघ द्वारा उसे क्लीन चित दी गयी (आमतौर पर ऐसे मामले में जांच की रिपोर्ट आने तक इंतज़ार किया जाता है) से पता  असली कुश्ती कहाँ लड़ी जा रही है। 

          दरअसल इस पूरे मामले को व्यापक परिप्रेक्ष्य में देखा जाए तो इस मामले के कुछ सूत्र हाथ आ सकते हैं। फ़ूड सप्लीमेंट और शक्तिवर्धक दवाईयों का प्रयोग विश्व व्यापक है। इससे शायद ही कोई देश या कोई खिलाड़ी अछूता बचा हो। डोप टेस्ट में पकड़े जाना या उससे बच निकलना इस बात पर निर्भर करता है कि इनका सेवन आपने कितने सुनियोजित ढंग से किया है।डोप टेस्ट के मामले में भारत का रिकार्ड बहुत अच्छा नहीं रहा है। भारत में शक्तिवर्धक दवाईयों और फ़ूड सप्लीमेंट के प्रयोग की भयावहता का अंदाज़ा दो उदाहरणों से लगाया जा सकता है। एक,बकौल पत्रकार मित्र जो खेल कवर करते रहे हैं,प्रदेश स्तर तक के खेल आयोजन स्थल के वाश रूम में पड़ी सिरिंजों से इन दवाओं के प्रयोग के वॉल्यूम का अनुमान किया जा सकता है। दूसरे,अभी हाल ही में एक राज्य की पुलिस भर्ती में फिजिकल टेस्ट में अभ्यर्थियों के डोप टेस्ट कराये जाने से इस समस्या की गम्भीरता को समझा जा सकता है। लोग ये सोचते हैं कि एक खिलाड़ी और विशेष रूप से एक पहलवान गाय भैंस के घी दूध और बादाम पिस्ते से अपनी शारीरिक ज़रूरतें पूरी कर लेता है वे बहुत बड़े भ्रम में जी रहे हैं। स्वयं नरसिंह ने अपने फ़ूड सप्लीमेंट जाँच के लिए नाड़ा को सोंपे। एक रिपोर्ट के मुताबिक़ 2014 से 2016 के मध्य भारत में डोप टेस्ट के 98 मामले सामने आए और वो इस मामले में विश्व में तीसरे स्थान पर है। रूस 111 मामलों के साथ पहले नंबर पर है। डोप के मामले में सोवियत रूस से बने राष्ट्र और उसके पूर्व सहयोगी पूर्वी यूरोपीय देश अधिक बदनाम रहे हैं। 
                              अस्सी नब्बे के दशकों में जब इन देशों में साम्यवादी शासन दरक रहा था तो इन देशों की आर्थिक बदहाली विश्व के सामने आ रही थी।  समय था जब भारत में खेलों का स्तर ऊंचा उठाने के लिए विदेशी कोचों की ज़ोरदार वकालत की जा रही थी। समय तमाम खेल संघों ने कोचों को ढूँढने के लिए इन देशों का रुख किया। यहां से दोयम दर्ज़े के सस्ते कोच लाकर देश में खूब वाहवाही लूटी। इन कोचों के भारत में आने पर अच्छे परिणामों की उम्मीदें  परवान चढ़ने लगी। इससे इन विदेशी कोचों पर अपनी नौकरी बचाने और संघों पर अपनी साख बचाने के लिए सकारात्मक परिणाम दिखाने का अतिरिक्त दबाव था। क्या इसे एक संयोग भर मना जाए कि अधिकांश डोपिंग के मामले इसी समय से और इन्हीं खेलों में आने शुरू हुए।  
              दूसरी ओर  शक्तिवर्धक दवाईयों और फ़ूड सप्लीमेंट्स का दुनिया भर में बड़ा बाज़ार है। हमारे देश में सारे अच्छे फ़ूड सप्लीमेंट बाहर से आते हैं जो खासे महंगे होते हैं। जो खिलाड़ी इन महंगे सलिमेंट्स को अफोर्ड नहीं कर पाता वो देश में बने सस्ते मगर घटिया सलिमेंट्स को प्रयोग करता है। इन सभी देसी विदेशी फ़ूड सलिमेंट्स और शक्तिवर्धक दवाईयों के जांच और क्वालिटी कंट्रोल की कोई व्यवस्था देश में नहीं है। और प्रोफेशनल सपोर्टिंग स्टाफ  अभाव में खिलाड़ी वही सब खा रहे हैं जो कंपनियां उन्हें परोस रही हैं। या फिर कोच और सपोर्टिंग स्टाफ उन्हें कह रहा है। वाडा और नाडा भी केवल प्रतिबंधित सप्लीमेंट्स और दवाईयों की बात करते हैं। वे ये नहीं बताते कि क्या खाना है। फलतः बाजार की बेलगाम दौड़ ने इस समस्या को विकराल बना दिया है। 
        खेल दो व्यक्तियों या दलों के मध्य शारीरिक और मानसिक क्षमताओं की ज़ोर आज़माइश है। इसमे इससे इतर  चीज की घुसपैठ होगी तो खेलों की मूल भावना आहत होगी ही होगी। मसलन खेल में उग्र राष्ट्रवाद की घुसपैठ होगी तो खिलाडियों को वैसे अमानुषिक अत्याचार झेलने पड़ सकते हैं जैसे चीन ने खेल महाशक्ति बनने के उपक्रम में अपने खिलाडियों पर किए बताए जाते हैं या फिर वैसी हिंसा झेलनी पद सकती है जैसी यूरोपीय  देशों के बीच फुटबॉल मैचों के दौरान होती है।  यदि खेलों में बाज़ार की एंट्री होती है तो निश्चित ही खेलों को  फिक्सिंग और डोपिंग जैसी समस्याओं से कोई नहीं बचा सकता। शायद भगवान् भी नहीं। तो दो  पहलवानों के इस विवाद को इस नज़रिये से भी परखने  कोशिश कीजिये।  




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