Tuesday, 30 June 2015

स्लम है कि कूड़ी

            

        जब कभी भी आप रेल से सफर कर रहे होते  और रात में किसी बड़े शहर में रेल प्रवेश कर रही होती है तो खिड़की से बाहर का नज़ारा देखना मन को कितना भाता है। पूरा शहर दूधिया रोशनी में नहाया हुआ। दूर तक जाती बल्बों की लम्बी कतारें और ऊंची ऊंची इमारतों के भीतर से आता प्रकाश पूरे शहर को आवृत कर रहा होता है। कही कहीं दिखाई पड़ता अंधकार अपना अस्तित्व बचाए रखने के लिए संघर्षरत सा प्रतीत होता है। पर उसमें सफल होता नहीं दिख पड़ता। लगता है छुपने के लिए कोने तलाश रहा है। रोशनी से नहाए शहर को देख कर आप किसी और जहाँ में पहुँच जाते हैं.... किसी तिलिस्मी दुनिया में विचरण करने लगते हैं आप…आप खुद इतना हल्के पाते हैं कि आसमान में उड़ता सा महसूस करने लगते हैं....सब कुछ स्वप्न सरीखा सा लगने लगता है.…एक अलग दुनिया में खो जाते हैं आप.…आपके सपनों की दुनिया…चाहतों की दुनिया…इच्छाओं की… अरमानों की दुनिया। पर अचानक किसी सिग्नल पर हलके से झटके से रेल रूक जाती हैं। उस हलके से झटके से आपकी सपनों की दुनिया भी बिखर बिखर जाती है। आप घबराकर सामने से नज़र हटाकर रेल के आस पास निगाहें फैलाते हैं  तो पटरियों के किनारे शहर के दूर छोर से छनकर आते मद्धिम से प्रकाश में सैकड़ों की तादात में दबड़े नुमा छोटी छोटी झोपड़पट्टी नज़र आने लगती हैं। 
            अचानक आप दूसरी फंतासी का शिकार हो जाते हैं। एक नए तिलिस्म में पहुँच जाते हैं । यहां सिर्फ अन्धेरा ही अन्धेरा नज़र आता है। दरअसल मुख्य शहर में रोशनी से पराजित अन्धेरा यहीं तो शरण पाता है। हताश,पराजित अन्धेरा यहाँ मानो अपनी ताकत फिर से संजोता है.…पुनः प्रकाश को चुनौती देने के लिए उठ खड़ा होता है। उसे लगता है जैसे ये उसका अपना ही तो घर है। हताश,निराश,गरीब,जीवन की जद्दोजहद में लगे लोगों के बीच उसे कितना अपनापन लगता होगा। सच में अन्धेरा गज़ब की ताक़त पा लेता है यहां। तभी तो यहाँ रोशनी आने में भी घबराती है। भूले भटके छन छनाकर कर थोड़ी बहुत कहीं से आ भी गयी तो वो अँधेरे से कहाँ पार पा पाती है। यहाँ तो वो खुद भी मरी मरी सी.…  बीमार सी नज़र आने लगती है।
                   और तब समझ आता है अरे ये तो हाशिया है.…और ये लोग ज़िंदगी के विशाल पृष्ठ पर खिंचे हाशिये में पड़े लोग हैं। ये तो सिर्फ जनसंख्या का अंक बताते हाशिये के उन नंबरों की तरह हैं जो सवालों और जवाबों की संख्या बताते हैं। अन्यथा रोशनाई और उससे लिखे अक्षर तो मुख्य पृष्ठ पर हैं। असली पहचान और महत्व तो उन्ही का है। ये.… ये.…  तो बस यूँ ही … बेसबब....अकारण.... कीड़े मकोड़ों की तरह..... डाल से टूटे पत्तों की तरह.…अपनी ज़मीन से कटे.…ना ना कटे नहीं बिछड़े……प्रवासी....विस्थापित। फिर तिलिस्म की एक और खोह में धँसे चले जाते हैं। लगने लगता है कि शायद ये स्लम्स तो राहु केतु की तरह हैं.…वैसे ही महत्वहीन....सौरमण्डल की परिधि से बाहर। सूर्य की ऊर्जा कुछ खास ग्रहों तक सीमित…प्रेम का ग्रह शुक्र,बुद्धि का बृहस्पति,जीवन का पृथ्वी,क्रोध यानी बल का मंगल,धन का बुध,तो न्याय का शनि.…महत्व के तो ये ग्रह हैं.....तो सूर्य का प्रकाश उसका तेज उसकी शक्ति भी तो इन्हीं को मिलेगी.... राहु केतु का क्या ये तो शत्रु ग्रह हैं,बेकार के ग्रह हैं.… इनकी क्या ज़रुरत है…ये तो बहिष्कृत हैं.… इन्हें क्योंकर कुछ मिलना चाहिए.... ये तो सौरमंडल के स्लम हुए ना। या यूँ कहें कि इन्हीं की तरह तो हैं स्लम…उपेक्षित,अनपेक्षित,अवांछित। 
                         आप तिलिस्म में और गहरे उतरते जाते है। एक नई दुनिया में। गाँव की दुनिया दृश्यमान होने लगती है। तभी अपनी बस यात्राओं की याद आ जाती है। वे यात्राएं जो अक्सर शहर से ग़ाँव और गाँव से शहर जाने के लिए की जाती हैं। जैसे ही आपको सड़क के किनारे दोनों और कूड़ियाँ पड़ी दिखाई दें,आप समझ जाएं  कि कोई गांव अाने वाला है,ठीक वैसे ही जैसे शहर जाते समय जब सड़क के दोनों ओर झोंपड़पट्टी दिखाई देने लगे तो आप समझ लेते हैं कि कोई शहर आने वाला है। मैंने तो यही पहचान बना रखी है बचपन से। कूड़ियां.... मतलब गाँव के घरों से निकला ढोरों डंगरों का मल मूत्र  अरे गोबर वगैहरा और घर घेर में सकेर सुकूर कर इकठ्ठा किया गया कूड़ा जहां एकत्र किया जाता है वही तो होती कूड़ी। सड़क बनाने के लिए दोनों किनारों से जब मिट्टी उठा कर सड़क पर डाल दी जाती है तो सड़क के दोनों ओर जो गड्ढे बन जाते हैं उनमें बेचारे किसान अपनी कूड़ी बना लेते हैं। इससे कम्पोस्ट खाद बनती है। भई मुझे तो स्लम और कूड़ी में साम्य ही साम्य नज़र आता है।जैसी कूड़ी वैसा स्लम। अब आप देखिए ना दोनों बाहर हाशिए पर..... एक गाँव के बाहर तो दूसरा शहर के। कूड़ी में क्या होता है घर गाँव का अपशिष्ट और कूड़ा जो उन्हें साफ़ सुथरा बनाने में निकलता है। और स्लम बनता है आदमियों से ऐसे आदमियों से जो अपनी जड़ों से उखड़े लोग हैं,सूखे पत्तों जैसे किस्मत की लहर पर सवार गली-कूंचों,मोहल्लों-मोहल्लों,डगर-डगर,शहर-शहर,भटकते कूड़े की मानिंद लोगों से। जो भटकते-भटकते पहुँच जाते हैं साफ़ सुथरे चमकते दमकते शहरों को गंदा करने। अब बाबूजी लोगों को,हुक्मरानों को,सेठ साहूकारों को ये कूड़ा कहाँ हज़म। ये उनकी शान पर बट्टा जो ठहरे। तो भई नगरपालिका के कारकून उन्हें धकिया धुकियाकर शहर के गड्ढों में कूड़े की तरह भर देते हैं। कई बार तो स्लम वालों को भी कूड़ी की किस्मत पर रश्क होता होगा कि वे स्लम से ज्यादा साफ़ सुथरी जगह पर है,खुली हवा में सांस ले रही हैं। उन्हें तो इतना भी मयस्सर नहीं। कूड़ी और स्लम में समानता यहीं ख़त्म नहीं होती। इसकी जड़ें बहुत गहरी हैं। कूड़ी सड़ गल कर अपना अस्तित्व समाप्त कर बहुमूल्य खाद में बदल जाती है। बेजान मिट्टी में मिलकर उसे उर्वर बना देती है जिससे फसलें लहलहाने लगती हैं। किसान खुशी से झूम झूम उठते हैं।दबा कुचला मृतप्राय किसान लहलहाती फसल देख जीवंत हो उठता है। खुद को मिटाकर दूसरे को जीवन देना.... उसे धन धान्य से परिपूर्ण कर देना.... कैसा निश्छल और पूर्ण समर्पण। बिलकुल वैसे ही जैसे स्लम वाले करते हैं। शहरों की ऊँची ऊँची इमारतों को कौन बनाता हैं। शहरों की साफ़-सफाई कौन करता है। घरों का रंग रोगन,सफाई-पुताई,रोज़मर्रा के काम कौन करता है। स्लम वाला ही ना। अपना तन मन सब गला कर शहर की सेवा स्लम वाला ही करता है न। मैं तो कहता हूँ गाँव की कूड़ी और हर का स्लम दोनों एक ही हैं। एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। कबीर दास की तर्ज़ पर कहूँ तो 'कूड़ी है कि स्लम है/स्लम है कि कूड़ी है/कूड़ी ही स्लम है /स्लम ही कूड़ी है,।  
         ... अचानक एक शोर सा उभरता है,चीख चिल्लाहट कानों से टकराने लगती है कि अचानक एक झटके से रेल रूक जाती है। प्लेटफार्म पर गाड़ी पहुँच चुकी है। ध्यान भंग होता है। तिलिस्म टूटता है।आप रेल से उतरने की जल्दी में सामान पैक करने लगते हैं।