Monday, 1 June 2015

तिलिस्म




बताओ तो ज़रा
कैसे बिना कोई शिकन लिए चहरे पर
बने रहते हो इतने बड़े कलाकार
कि गरीब की थाली में परोसकर कुछ आश्वासन
छीन लेते हो उसके मुँह का कौर
और वादों का झुनझुना पकड़ाकर
कर लेते हो मासूम सपनों को 
अपनी तिज़ोरी में कैद 

बताओ तो ज़रा

'एकता' के नारे डालकर मज़दूर की झोली में  
कैसे उसकी बिछावन को
बना लेते हो अपने पैरों के नीचे की रेड कार्पेट
कैसे किसान में 'अन्नदाता' होने का सब्ज़बाग़ जगाकर
उसकी  हाड़तोड़ मेहनत के अन्न को  
बदल देते हो अपनी रंगीन शाम के 'चखना' में 


कुछ तो खुलो

बताओ तो ज़रा
कैसे खून के लाल रंग को
हरे भूरे नीले सुफ़ेद रंग में बदल कर 
कर देते हो रंग बिरंगा
और उससे लगी आग के धुँए से कर देते हो पूरे आसमां को स्याह
आखिर कैसे आदमी के दुखों को बना लेते हो
अपने बेहया सुखों का तकिया
और बनकर तीन बंदर
बजाते हो चैन की बंशी।

कुछ तो बताओ

कैसे आदमी के भीतर सुलग रही आग को
अपनी धूर्तता भरी आवाज़ से साधकर
 बना लेते हो अपनी ताकत तथा 
अपनी अय्याश सत्ता की नींव। 


कुछ तो गिरह खोलो और बोलो 

कुछ तो पता चलने दो 
आदमी से सत्ताधारी मठाधीश बनने के 
'अनिर्वचनीय सुख' वाले तिलिस्मी सफ़र का 
ताकि कोशिश हो सके इस तिलिस्म से बचाने की 
आने वाली नस्लों को।

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