Friday, 20 January 2017

यादों में इक शहर_2

                       



              रामपुर में जिस स्कूल में दाखिला हुआ वो स्कूल था सरस्वती शिशु मंदिर।पर 70-71 के आसपास का समय रहा होगा पिता जी के स्थानांतरण के बाद परिवार एटा आ गया।यहाँ पहली कक्षा में दाखिला हुआ।एक मोंटेसरी स्कूल में। मोहल्ले में ही था। कक्षा 5 तक का। अंग्रेजी माध्यम वाला नहीं था हाँ अंग्रेजी पढ़ाई ज़रूर जाती थी।एक वकील साहब थे जिनका एक बड़ा सा पैतृक घर था। उसी घर के आधे हिस्से में चलता था वो मोंटेसरी। वकील साहब की पत्नी स्कूल की प्रिंसिपल हुआ करती थीं।आज़ादी मिले एक चौथाई सदी बीत चुकी थी। अगर याददाश्त सही है ये वो समय था जब विदेशी चीजों का क्रेज़ चरम पर था। मोंटेसरी स्कूल भी विदेशी ब्रांड था जिसका गज़ब का उन दिनों क्रेज़ हो चला था। जिस तरह आज अंग्रेज़ी माध्यम वाले स्कूल गली मोहल्लों में उग आये हैं वैसे ही उस समय मोंटेसरी स्कूल कुकुरमुत्तों की तरह उगने शुरू हो गए थे।इन्हीं कुकुरमुत्तों में से एक में हम ने पढना शुरू किया। इन स्कूलों के बारे में और कुछ हो या ना हो एक बात गारंटी से कहता हूँ कि इटली की वो महान शिक्षाविद डॉ मारिया मोंटेसरी जिसने मोंटेसरी शिक्षा पद्धति और स्कूल ईज़ाद किए,गलती से भी यहाँ के किसी मोंटेसरी स्कूल में आ जाती तो निश्चित ही आत्महत्या कर लेती। कम से कम मेरे उस स्कूल में तो दो सौ फीसदी शर्तिया। मेरे स्कूल में तीन चार टीचर थीं। वे 10वीं पास थीं या नहीं आज भी विश्वास से नहीं कह सकता।हर कक्षा में 10से 15 बच्चे होते। टीचर बच्चों को कुछ काम थमा देतीं। बच्चे उसमें मशगूल हो जाते और टीचर जी अपने बैग से एक पतली सी किताब निकालती और उसे उसे पढने में लीन हो जातीं। आज जब सोचता हूँ तो अनुमान होता है किस तरह की किताब वे पढ़ती रही होंगीं। वे किताब को गज़ब की तल्लीनता से पढ़तीं कम से कम उस समय तो ऐसा ही लगता क्योंकि हम बच्चे कुछ भी करते वे बेखबर रहतीं। हाँ बीच बीच में यंत्रचालित सी एक वाक्य दोहरा देतीं 'बच्चों  शोर मत करो अपना काम करो'।बीच बीच में उनकी नज़रें बाहर की और भी देखती रहतीं। उन नज़रों में चौकन्नापन भी होता और इंतज़ार भी। चौकन्नापन प्रिंसिपल के अचानक आ जाने का और इंतज़ार अपने शोहदे नुमा पुरुष मित्रों के आने का।हांलाकि प्रिंसिपल कभी आती नहीं क्योंकि ये समय उनके घर के काम निपटाने का होता और पुरुष मित्र उन बेचैन नज़रों को कभी निराश नहीं करते। वे एक नियत समय के हेर फेर में  आ ही जाते जिन्हें देखते ही उस टीचर के चेहरे पे झिझक युक्त मुस्कराहट फ़ैल जाती जब जिसका मित्र आता। किताब वापस बैग में जाती और टीचर जी मित्र के साथ किसी कोने में दिखाई पड़तीं।  
                                       ये आगंतुक मित्र भी गज़ब के नमूने टाइप होते। इनमें से एक की बड़ी बड़ी ज़ुल्फें पीछे कन्धों तक लहरा रही होतीं और आगे आधे माथे और एक आँख को ढक रही होतीं। माथे के इन बालों को थोड़े थोड़े अंतराल पर बड़ी अदा से गर्दन झटक कर जुल्फें पीछे फेंकते और टीचर जी इस अदा पर निहाल हो हो जातीं। हालांकि उस मित्र की ये अदा हमें भी बहुत सुहाती। हमें भी उस तरह गर्दन झटक कर बाल पीछे फेंकने का बड़ा मन करता। पर हमारी समस्या थी कि हमारे अब्बा हुज़ूर सर पर आधे इंच से ज़्यादा बाल होते ही नाई की दूकान का रास्ता नपवा देते और हमारा बाल झटकने का अरमान नाई की केंची से कटकर उसकी झाड़ू से बुहरता हुआ नाली की शोभा बढ़ा रहा होता। लेकिन हम भी कहाँ मानने वाले। हम उन छोटे बालों को ही लंबे समझकर गर्दन में गाहे बगाहे झटका मार कर अपने अरमान पूरे करते रहते। एक दूसरे मित्र के बालों से तेल बहता सा प्रतीत होता। तीसरे सज्जन बाकी दो से उम्र में थोड़े बड़े प्रतीत होते क्योंकि उनके आगे के बाल थोड़े कम हो चले थे। बाकी लंबे बाल उन दिनों फैशन में थे ही। इन तीसरे वालों के बाल भी काफी लंबे होते और दोनों और कानों तक पहुँच कर ऊपर की और मुड़े होते। प्राय तीनों ही छींटदार शर्ट पहनते जिनके बड़े बड़े कॉलर होते। पेंट एकदम  टाईट सी पैरों पे चिपकी होती। उस समय तक सड़क पर घिसटने वाले बड़े बड़े पोहचों वाले बेलबॉटम का समय नहीं आया था। वे उस समय अपना अवतार लेने से छह  सात साल की दूरी पर थे। टीचर जी ऊंचे स्लिम फिट कुर्ते और स्लैक्स पहनती।पढ़ाई या संस्कारों की कोई ऐसी बात स्मृति पटल पर नहीं नहीं उभरती जिसका उल्लेख किया जा सके। भला हो माँ का जिसने भटकने नहीं दिया। इस दौरान जो कुछ सीखा माँ की बदौलत। वे रोज़ नियम से पढ़ाती। वे केवल हिंदी-अंग्रेजी की वर्णमाला ही नहीं सिखाती बल्कि संस्कारों की बारहखड़ी भी सिखाती। स्कूल के संचालक उस समय भी आज की तरह ही होते। प्रचार के महत्त्व को उन्होंने शिद्दत से समझा था। दिखावा खूब करते और इसका सबसे बड़ा टूल था स्कूल का वार्षिकोत्सव। ये वार्षिकोत्सव हर साल ज़ोर शोर से मनाया जाता। स्कूल के पेरेंट्स के आलावा मोहल्ले की वरिष्ठ लोगों को आमंत्रित किया जाता। ये सारा आयोजन पूरा फ़िल्मी होता। याद पड़ता है दो अलग अलग सालों में दो डांस आइटम में भाग मैंने भी लिया।वे गाने थे - दाग का 'अब चाहे बाबा रूठे या ....' और पूरब और पश्छिम का '. पुरवा सुहानी आई रे........ इस स्कूल में जीवन निर्माण के सबसे महत्वपूर्ण पांच साल जाया हुए। इसका यहां इन अध्यापिकाओं की जो स्मृतियाँ दिमाग में टंगी हैं उस से अंदाज़ा लगाया जा सकता है।प्राथमिक शिक्षा के क्षेत्र में इतने सालों बाद भी कुछ ख़ास नहीं बदला है।इस तरह के माहौल के बाद भी अगर आप थोड़े बहुत इंसान बने तो निश्चित ही माँ बाप की मेहनत और ऊपर वाले इनायत ही समझा जाना चाहिए। हाँ मोंटेसरी स्कूल में पढ़ने का एक परिणाम ये ज़रूर हुआ कि आपने अंग्रेजी की वर्णमाला के साथ कुछ शब्द उनकी स्पेलिंग और उनके अर्थ रट लिए थे जिसकी बदौलत छठवीं कक्षा में आने पर बाकी छात्रों से अपने को कुछ अलग,उनसे श्रेष्ठ समझने की ग्रंथि प्रस्फुटित हो गयी। इसने टीचरों की नज़रो में तो चढ़ा दिया लेकिन सीधे सच्चे उन बच्चों से बहुत दूर कर दिया जो आपके सही मायने में दोस्त हो सकते थे,लंगोटिया यार बन सक़ते थे। कुल मिला कर अलग थलग रहा बिना किसी दोस्त के। 
                      मेरा पहला स्कूल सरस्वती शिशु  मंदिर था  रामपुर में। रामपुर एक मुस्लिम बहुल शहर है जहां मुस्लिम जनसँख्या हिन्दुओं से काफी ज़्यादा थी ,अब भी है। नगर में हिन्दू अल्पसंख्यक थे। तो क्या यहां इस स्कूल में दाखिला  माँ बाप के मन में एक अल्पसंख्यक होने के कारण उपजा भय था। क्योंकि एटा में उस स्कूल की सुविधा होने के बावज़ूद दाखिला घर के पास वाले मोंटेसरी स्कूल में करा दिया गया। कहाँ शुद्ध देशी हिंदु ब्रांड स्कूल और कहाँ विदेशी ब्रांड मोंटेसरी स्कूल। क्या यहां दूसरी तरह की सोच और चिंतन प्रक्रिया चल रही थी माँ बाप के मन में। क्या वहां उनके अंतस में अल्पसंख्यक होने के कारण उपजा भय और असुरक्षा  ही स्कूल चुनने का मुख्य कारण रहा होगा। लेकिन एक ऐसे शहर में जहाँ वे बहुसंख्यक हो गए थे अर्थ जैसी चिंताएँ  मुख्य आधार रही होंगी अपने बच्चों के स्कूल को चुनने की। निश्चित ही शिक्षा का स्तर तो उस समय मुख्य आधार नहीं ही रहा होगा। ऐसा मुझे लगता है। यहां समझ आता है कि किस तरह से अल्पसंख्यकों के मन में भय और असुरक्षा की भावना उनकी गतिविधियों के सञ्चालन का प्रमुख प्रेरक शक्ति होती है। उस भय के कारण वे अधिक संगठित होने का प्रयास करते हैं और संगठित होने के लिए विभिन्न धार्मिक गतिविधियां और कार्य कलाप करते हैं। इस क्रिया की एक प्रतिक्रया बहुसंख्यक समुदाय में होती है। फलस्वरूप भय और अविश्वास का वातावरण बनाता है और सामाजिक ताने बाने में एक तनाव का माहौल बन जाता जाता है। रामपुर में हिंदुओं की कई तरह की धार्मिक गतिविधियां चलती थी। मुझे याद है कि एक बार वहां पर बहुत बड़ा यज्ञ का आयोजन किया गया। उसमें माँ समय निकाल कर रोज़ जातीं। मैं भी अक्सर उनके साथ जाता। कई बार पिताजी भी जाते। वहां पर एक बहुत बड़ा अग्निकुंड था जिसमें हर समय अग्नि जलती रहती। उसकी लोग लगातार परिक्रमा करते रहते और हर परिक्रमा पर एक पैसा दान में देते । वहीं से नैतिक शिक्षा की  बहुत सारी पुस्तकें पिताजी ने हम भाई बहन को दिलाई थीं। लेकिन एटा में इस तरह के किसी बड़े धार्मिक आयोजन की मुझे याद नहीं पड़ती। सिवाय इसके कि माँ महीने में कभी कभार मकान मालकिन के साथ श्रीराम मंदिर चली जातीं।  (जारी )



रियली वी मिस यू इटली इन रशिया

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