Sunday, 8 January 2017

महेंद्र सिंह धोनी

                       

                        अंततः महेंद्र सिंह धोनी ने क्रिकेट के संक्षिप्त संस्करण की कप्तानी छोड़ दी।हांलांकि वे खिलाड़ी के रूप में चयन के लिए उपलब्ध हैं और इंग्लैंड के विरुद्ध एक दिवसीय मैचों की श्रृंखला के लिए चुन भी लिए गए हैं। इसी के साथ भारतीय क्रिकेट इतिहास के एक युग की समाप्ति हो गयी। निःसंदेह वे एक शानदार खिलाड़ी हैं और एक महान कप्तान भी जिनके नेतृत्व ने भारत को असाधारण उपलब्धियां दिलायी। उनकी कप्तानी में भारत ने 2007 में पहला टी ट्वेंटी विश्व कप(इंग्लैंड),2011 में विश्व कप(भारत),2013 में चैंपियन ट्रॉफी(दक्षिण अफ्रिका)जीती और 2009 में टेस्ट क्रिकेट में भारत को नंबर एक बनाया।वे भारत के सबसे सफल कप्तान हैं।उन्होंने 50 टेस्ट मैचों में कप्तानी की जिसमे से 27 में जीत 17 में और 15 अनिर्णीत रहे,199 एक दिवसीय में से 110 में जीते और 74 हारे जबकि 72 टी ट्वेंटी मैचों में से 42 जीते और 28 हारे।उन्होंने कप्तान के रूप में एक दिवसीय मैचों में 54 की औसत और 86 की स्ट्राइक रेट से 6633 रन,टी ट्वेंटी में 122 की स्ट्राइक रेट से 1112 रन और टेस्ट क्रिकेट में 41 की औसत से 3454 रन बनाए हैं। ये आंकड़े उनकी सफलता की कहानी कहते हैं और ये बताने के किये पर्याप्त हैं कि वे एक बड़े खिलाड़ी और महान कप्तान भी हैं।उनकी शान में कसीदें पढ़ा जाना स्वाभाविक है,इसलिए पढ़े भी जा रहे हैं क्योंकि ऐसा किए जाने का मौक़ा भी है और दस्तूर भी। ऐसे में उनकी शान के खिलाफ कुछ भी लिखना कहना जोखिम का काम है। लेकिन उसके बाद भी मैं कहता हूँ कि धोनी मेरे पसंददीदा खिलाड़ी नहीं रहे और ना ही मेरे लिए वे गावस्कर,कपिल या सचिन जैसे खेल आइकॉन रहे हैं। आखिर आप इतने बड़े खिलाड़ी के मुरीद क्यों नहीं हो पाए। क्यों उस खिलाड़ी के फैन नहीं हो पाए ?
                       दरअसल आप किसी खिलाड़ी के सम्पूर्ण व्यक्तित्व से प्रभावित होते हैं। आप जब उसका अनुसरण करते हो तो केवल खेल के मैदान में ही नहीं उसके बाहर भी उसे देखते हो और खेल के मैदान में भी सिर्फ उसका खेल भर नहीं देखते हो बल्कि खेल से इतर उसकी गतिविधियों को भी उतनी सूक्ष्मता से देखते हो। 2004 में जब धोनी अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर क्रिकेट में पदार्पण करते हैं तो कंधे तक फैले लंबे बालों की तरह स्वाभाविकता उनके व्यक्तित्व पर पसरी हुई दिखती थी। उस समय वे एक मध्यम दर्ज़े के शहर और निम्न मध्यम वर्ग के परिवार के एक बहुत ही प्रतिभा वाले सच्चे,सरल,स्वाभाविक और उत्साही खिलाड़ी होते हैं।धीरे धीरे उनका रूपांतरण होता है। वे एक नवोदित खिलाड़ी से बड़े खिलाड़ी बन जाते हैं। फिर 2007 में टीम की कमान उनके हाथ में आती है। क्रिकेट प्रबंधन से उनके बहुत मज़बूत सम्बन्ध बनते हैं।अब वे बहुत शक्तिशाली हो जाते हैं। वे सत्ता के केंद्र में होते हैं और खेल के सर्वेसर्वा बन जाते हैं।यहां केवल एक नवोदित खिलाड़ी का खेल के सबसे बड़े खिलाड़ी बनने का सफर ही पूरा नहीं होता बल्कि पूरे व्यक्तित्व का रूपांतरण भी साथ साथ होता चलता है।वे जैसे जैसे कद में बड़े होते जाते हैं वैसे वैसे उनके बाल छोटे होते चले जाते हैं और उसी अनुपात में उनकी सरलता ,स्वाभाविकता ,अल्हड़पन और सच्चाई भी कम होती चली जाती है। वे अब सरल नहीं रहते जटिल हो जाते हैं,स्वाभाविक नहीं रहते कृत्रिमता उन पर हावी हो जाती है,वे हसंमुख और अल्हड़पन की जगह गंभीरता का आवरण ओढ़ लेते हैं,स्वाभाविक अभिमान अहंकार में बदल जाता है और एक साधारण आदमी अचानक से आभिजात्य वर्ग का प्रतिनिधि लगने लगता है।अभिजात्य उनके पूरे व्यक्तित्व पर पसर जाता है। उनके हाव भाव, चाल ढाल हर किसी पर।

                          अपनी सफलताओं और प्रबंधन के साथ संबंधों के बल पर सर्वेसर्वा बन जाते हैं।आदमी जैसे जैसे सत्ता और ताक़त पाता जाता है वैसे वैसे वो मन में अधिक और अधिक सशंकित होता जाता है और सबसे पहले उन लोगों को ख़त्म करने का प्रयास करता है जो उसके लिए यानी उसकी सत्ता के लिए ख़तरा हो सकते हैं। धोनी एक एक करके सारे सीनियर खिलाड़ियों को बाहर का रास्ता दिखाते हैं चाहे वो गांगुली हो,लक्ष्मण हो, द्रविड़ हो, गंभीर हो, हरभजन हो, सहवाग हो या फिर सचिन ही क्यों ना हो। इनमें से ज़्यादातर खिलाड़ी अपने खेल के कारण नहीं बल्कि धोनी की नापसंदगी के कारण ही हटे। वे इतने शक्तिशाली थे कि टीम में वो ही खेल सकता था जिसे वे चाहते। तभी तो रविन्द्र जडेजा जैसे औसत प्रतिभा वाले खिलाड़ी टीम में लगातार बने रहे और अमित मिश्र जैसे कई खिलाड़ी टीम में अंदर बाहर होते रहे। जब मोहिंदर जैसे बड़े कद के चयनकर्ता उनके विरुद्ध हुए तो उन्हें इस्तीफा देना पड़ा। अक्सर ये कहा जाता है कि टीम की एकता के लिए सीनियर खिलाडियों को बाहर किया जाना समय का तकाज़ा था। वे टीम में राजनीति कर रहे थे और फूट डाल रहे थे।इस तर्क़ के आधार पर आज उनकी टीम में जगह नहीं बनती है। क्या गारंटी है वे अब टीम में वही सब नहीं करेंगे।वे या तो उस समय गलत थे या अब।यहां पर पाकिस्तान के इमरान याद आते हैं। जिस समय उनके हाथ में पाकिस्तानी टीम की कमान थी वे एकदम तानाशाह की तरह व्यवहार करते थे। यहां तक कि लोकल स्तर पर खेलते खिलाड़ी को देखते और राष्ट्रीय टीम में शामिल कर लेते। अपनी प्रतिभा के बल पर उन्होंने अपनी कप्तानी में पकिस्तान को विश्व कप जिताया और  टीम को नई ऊंचाईयां भी प्रदान की लेकिन उन्होंने पाकिस्तानी क्रिकेट के ढांचे को ही नष्ट कर दिया कि उनके जाते ही पाकिस्तानी क्रिकेट अपने रसातल में चली गयी और आज तक नहीं उबर सकी। आप ध्यान से देखेंगे तो धोनी भी अक्सर इमरान की तरह व्यवहार करते प्रतीत होते हैं। बस गनीमत ये रही कि भारतीय क्रिकेट का ढांचा इतना मज़बूत है कि नुक्सान ना के बराबर या बिलकुल नहीं हुआ।  
                   उनका ये व्यवहार केवल टीम के स्तर पर ही नहीं दीखता है बल्कि मैदान में भी दिखाई देता है। वे मैदान में अब एक तरह की कृत्रिम गंभीरता ओढ़े नज़र आने लगे। जैसे जैसे वे सफल होते गए  उनकी 'कैप्टन कूल' की छवि मज़बूत हो गई। ये सही है कि आज खेल भी बहुत कॉम्प्लिकेटेड हैं और प्रतिद्वंदिता बहुत ज़्यादा हो गयी है और ऐसे में किसी भी खिलाड़ी और विशेष रूप से कप्तान का 'कूल' होना बनता है। लेकिन कूल होने का मतलब इतना ही है कि विषम परिस्थितियों में भी खिलाड़ी धैर्य और संयम बनाये रखे और कठिन समय में शांत दिमाग से परिस्थितियों के अनुसार ले सके। इसका ये मतलब ये कतई नहीं हो सकता कि आप जीत में उत्तेजित और उल्लसित ना हों और हार में दुखी। खेल तो नाम ही जोश और जूनून का है। आप भावनाओं को काबू में रख ही नहीं सकते।आप मशीन नहीं हो ना। आप भाव रहित यंत्रवत कैसे हो सकतेहो। धोनी अक्सर जीत हार के बाद निष्पृह से दिखाई देते हैं मानो जीत हार का कोई असर उन पर हुआ ही ना हो। क्या वे खेल नहीं रहे थे ?क्या वे पैसा कमाने के लिए काम भर कर रहे थे ?
                               उनकी बैटिंग का अंदाज़ बड़ा अनाकर्षक था। उनका रक्षात्मक शॉट देखिये। वे सीना आगे निकाल कर पैरों पर झुकते हुए बड़े ही अजीबोगरीब ढंग से गेंद को धकेलते थे। ऐसे ही हेलीकॉप्टर शॉट कहीं से भी आकर्षक नहीं लगता। एक बात और जब कोई बॉलर विकेट लेता है तो वो बैट्समैन की और एक खास भाव से देखता है  या कुछ हाव भाव प्रकट करता है। ठीक उसी तरह से जब बल्लेबाज़ चौका या छक्के लगाता है तो या तो बॉलर की और देखता है या हाव भाव प्रकट करता है जो बैट्समैन या बॉलर  को चिढ़ाए और उसमें  खीज़ पैदा करे। दरअसल ये हाव भाव केवल अपनी योग्यता दिखाने के निमित्त मात्र ही नहीं होते  बल्कि प्रकारान्तर से अपने विपक्षी की काबिलियत की स्वीकृति भी होती है। लेकिन धोनी चौके छक्के लगाकर भी भावहीन बने रहते हैं,कोई प्रतिक्रिया नहीं देते हैं,जैसे ये कोई बड़ी बात नहीं है।प्रकारान्तर से वे बॉलर की काबिलियत को नकारते हैं।ऐसा करके वे एक खास किस्म का अहंकार प्रदर्शित करते हैं।जैसे जैसे उनका कद बड़ा होता गया वैसे वैसे उनमें सरकाज़्म(sarcasm) की मात्रा बढ़ती गई। आप उनकी प्रेस वार्ताए देखिए। उनके जवाबों में हमेशा एक खास किस्म का व्यंग्य लक्षित करेंगे। ये अपने को श्रेष्ठ मानने के अहंकार से उपजा था जिसमे वे मीडिया को कुछ भी बताना ज़रूरी नहीं समझते थे।                                                                                                                          
                                  फिर  उनकी ये घोषणा उतनी अप्रत्याशित नहीं है जितनी कही जा रही है। अप्रत्याशित तब होती है जब कोई अपने चरमोत्कर्ष पर से जस्ट ढलान पर होता है। धोनी से तो विश्व कप में हार के बाद  ही कप्तानी छोड़ने की उम्मीद की जा रही थी। ये बात तय है कि कप्तान के रूप में उनकी काबिलियत में विश्वसनीयता लगातार कम होती गयी है। ऑस्ट्रेलिया में खेले गए विश्वकप की तैयारी के लिए महत्वपूर्ण ऑस्ट्रेलिया और इंग्लैंड के साथ खेली गई त्रिकोणीय श्रृंखला में भारत ने एक भी मैच नहीं जीता।विश्वकप के सेमीफाइनल में ऑस्ट्रेलिया के हाथों बुरी तरह हारे। इसके बाद वे बांग्लादेश इंग्लैंड और ऑस्ट्रेलिया से सीरीज हारे। दोस्सरी और एक मैच फिनिशर के रूप में भी वे लगातार असफल रहे हैं।अमेरिका में खेले गए वेस्टइंडीज के विरुद्ध टी ट्वेंटी मैच में ड्वेन ब्रावो ने उन्हें आखरी ओवर में मैच नहीं जीतने दिया। ज़िम्बाब्वे दौरे में भी दोयम दर्ज़े की टीम के विरुद्ध भी आखरी ओवर में ज़रूरी 8 रन नहीं बना सके। इसी तरह कानपूर में दक्षिण अफ्रिका के खिलाफ एक दिवसीय मैच में जीत के लिए ज़रूरी 11 रन नहीं बना सके। 
                                           और अंत में एक बात और। वे आई पी एल में एक ऐसी टीम से जुड़े थे जिसके मालिक सट्टेबाज़ी से जुड़े थे। ये सभी जानते कि किस तरह से मामले को थोड़े बहुत कार्यवाही करके रफा दफा किया गया। एक टीम के मालिक इतने गहरे से सट्टेबाज़ी में संलिप्त हो और टीम के कप्तान को कोई जानकारी ना हो ऐसा संभव नहीं लगता वो भी जब उसके मालिक के साथ उनके आर्थिक हितों में साझेदारी हो। कुछ छींटे धोनी पर भी पड़े थे। हांलांकि सीधे तौर पर उनकी भागीदारी का कोई सबूत नहीं मिला। लेकिन उस टीम के कप्तान के तौर पर भी और एक बड़े खिलाड़ी के तौर पर उनकी नैतिक ज़िम्मेदारी तो बनती ही है और इस मामले में उन्होंने अपनी ज़िमेदारी नहीं निभायी। आप जान सकते हैं कि इस तरह के आरोप किस तरह से आपकी छवि धूमिल करते हैं। इसका सबसे बड़ा उदाहरण अज़हरुद्दीन हैं। वे धोनी से बड़े खिलाड़ी थे और निसंदेह उन्ही की तरह सफल कप्तान भी। यही सब कारण हैं कि धोनी के कप्तानी छोड़ने की घोषणा करने के कई दिन बाद भी कुछ खालीपन सा नहीं लगा और अगर वे खेल से संन्यास लेने की भी घोषणा करते तो भी शायद ऐसी ही प्रतिक्रिया होती। 

              

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