Wednesday, 11 March 2015

साइना नेहवाल

                             




                                        आठ मार्च को अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस के अवसर पर साइना नेहवाल एक इतिहास रचते रचते रह गईं।  लेकिन अपनी हार के बावज़ूद आल इंग्लैंड बैडमिंटन के फाइनल में पहुंच कर उन्होंने एक इतिहास तो रच ही दिया। उनका इस प्रतियोगिता के फाइनल तक पहुँचना और उसमें हार जाना (अगर जीत जातीं तो जीतना भी और उनकी बाकी उपलब्धियाँ भी) सामान्य खेल घटना हो सकती है। लेकिन इसमें गहरे निहितार्थ खोजे जा सकते हैं। दरअसल ये घटना  ऐसे समय में घट रही है जब 'इंडियाज़ डॉटर ' के बहाने भारतीय समाज में महिलाओं की स्थिति , सामंती पुरुष सोच और  पितृसत्तात्मक व्यवस्था जिसमें स्त्री  अधिकार नहीं के बराबर हैं पर बहस जारी है। साइना की उपलब्धियां बहुत कुछ कहती और सुनती हैं। 
                  हरियाणा के एक छोटे से शहर में जन्मा एक सपना आज बड़ी वास्तविकता बन चुका है। एक दंपत्ति ने सपना देखा अपने बच्चे को एक बड़ा खिलाडी बनाने का। उन्होंने  उसे हकीकत में बदलने का संकल्प भी किया । उसी सपने को पूरा करने वो हिसार से हैदराबाद आ जाते हैं और दिन-रात मेहनत करते है। आर्थिक संसाधनों की कमी के बावजूद माता-पिता जी जान से लग जाते हैं। मीलों लंबा सफर तय करके कोर्ट तक ले जाना उसे खेलते देखना और फिर अगले दिन उसी कोर्ट में लाने के लिए वापस ले जाना। यही दिनचर्या बना ली थी उन तीनों ने क्योंकि बच्चे ने भी उस सपने को अपना सपना बना लिया। देखते देखते वो सपना साकार होने लगा। साधारण से परिवार का वो सपना अब सफलता की असाधारण गाथा बन चुकी है। ये सपना एक ऐसी भूमि से जन्म लेता है जहाँ लिंगानुपात सबसे कम है। जहाँ ना जाने कितनी बेटियाँ जन्म लेने से पहले ही अपना जीवन जी चुकी होती हैं।जहाँ खाप पंचायतें बच्चियों के हौसलों के पंख इस तरह से क़तर देते है है कि  वे कभी  उन्मुक्त हो अपनी इच्छाओं के आकाश में उड़ान ही ना भर पाये। जहाँ  बेटा होना परिवार की सबसे बड़ी खुशी और बेटी का जन्मना सबसे बड़ा दुःख समझा जाता हो।  उसी जगह से सपना जन्मता है अपनी बेटी के लिए असीम संभावनाओं का द्वार खोल देने का। इसीलिए साइना की ये कहानी एक टिप्पणी है उस सोच पर जो स्त्री को एक शरीर से ज्यादा कुछ भी नहीं समझती और उनके लिए होंसला जो अपने बेटियों को ही अपनी सबसे बड़ी ख़ुशी समझते हैं । 
                        चुनौतियाँ केवल सामाजिक ताने-बाने और मानसिकता से ही नहीं उपजी थीं बल्कि और व्यापक थीं। भारत में खेलों के क्षेत्र में व्याप्त भृष्टाचार भाई, भतीजावाद और अपर्याप्त खेल सुविधाएँ भी बड़ी चुनौती थीं। और इनसे पार पाकर जब वे अंतर्राष्ट्रीय परिदृश्य पर आईं चीन की अभेद्य दीवार सबसे बड़ी चुनौती के रूप में सामने थी जिसका उन्हें अकेले ही सामना करना था। इस सन्दर्भ में साइना की उपलब्धियां असाधारण हैं। साइना और उनके माता पिता के होंसले और जीवट को सलाम !
                                                          उनमें  संघर्ष करने का गज़ब का माद्दा है। उनका इस मुकाम तक पहुँचना ही उनके कठिन परिश्रम, सतत साधना और संघर्षों की कहानी है। कभी हार ना मानने का जज़्बा उनको महान बनाता है। 2012 के लन्दन ओलम्पिक में कांस्य पदक जीतने के बाद से काफी समय तक उनका प्रदर्शन अच्छा नहीं रहा था। उस समय ऐसा लगने  लगा था कि उनका सर्वश्रेष्ठ आ चुका है और उनमे एक संतुष्टि का भाव आ गया है। ठीक उसी समय पी वी सिंधु का विश्व कप सेमीफाइनल में पहुंचने से लोगों को ये लगने लगा था कि वे बीते दिनों के सितारा है। यहाँ तक कि उनके कोच पी गोपीचंद को भी ऐसा ही लगा। शायद यही वजह थी कि उन्होंने भी अब साइना की जगह सिंधु पर अधिक ध्यान देना शुरू कर दिया था। लेकिन साइना ने हार नहीं मानी। वे अपने पुराने कोच विमल कुमार के पास लौटीं। अपनी फिटनेस और स्टेमिना पर काम किया। मेहनत रंग लाई। वे अपने रंग में  इतनी बड़ी उपलब्धि हासिल की। अभी भी उनमें  बहुत बैडमिंटन बाकी है।













एक अनिर्णीत संघर्ष जारी है

एक अनिर्णीत संघर्ष जारी है  यकीन मानिए बैडमिंटन चीन और इंडोनेशिया के बिना भी उतना ही रोमांचक और शानदार हो सकता है जितना उनके रहते...