Monday, 16 October 2017

टीम हॉकी इण्डिया



टीम हॉकी इण्डिया 


दीपावली से ऐन चार दिन पहले वाले रविवार को यदि आपकी पत्नी घर की साफ़ सफाई में हाथ बटाने से मुक्ति देकर आपको टीवी के सामने बैठकर अपने पसंदीदा खेल देखने की सहमति प्रदान कर दे तो आप अपने को ज़रुरत से ज़्यादा भाग्यशाली मान सकते हैं। मैं भी उन भाग्यशालियों में से था कि आज रविवार को दो बड़े खेल इवेंट देख पाया।
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आज शंघाई मास्टर्स टेनिस का फाइनल था। यों तो ये कोई बहुत बड़ा इवेंट नहीं था। दरअसल कई बार इवेंट को भाग लेने वाले खिलाड़ी बड़ा बना देते हैं। आज फाइनल में राफा और फेड एक बार फिर आमने सामने थे। ये कुल मिला कर 38वां और इस साल का चौथा मौक़ा था जब ये दोनों खिलाड़ी एक दूसरे से ज़ोर आज़माइश कर रहे थे। सफलता फेड को मिली। पिछले 5 मुकाबलों में फेड ने राफा को हराया। 36 साल की उम्र में जैसी टेनिस फेड खेल रहे हैं वो अविश्वसनीय है। टेनिस,राफा और फेड पर साल भर चर्चा हुई है। तो आज बात दूसरे इवेंट की।
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ढाका में चल रहे 10वें एशिया कप हॉकी में पूल ए के एक मैच में भारत और पाकिस्तान आमने सामने थे। खेल कोई भी हो भारत पाक की टीमें आमने सामने हों तो खिलाड़ी ही नहीं बल्कि दर्शक भी पूरी तरह चार्ज्ड होते हैं। और इस चिर प्रतिद्वंदिता का कारण खेल नहीं बल्कि खेल से इतर कारण रहे हैं जिसे हम सब जानते हैं। आज के मैच में एक बार फिर भारत ने अपनी श्रेष्ठा सिद्ध की और पाकिस्तान को 3-1  से हरा दिया। ये भारत की पाक पर लगातार पांचवी जीत थी। अभी लंदन में संपन्न हॉकी वर्ल्ड लीग सेमीफाइनल में पाक को दो बार 7-1  और 6-1 से हराया था। ये जीत भारतीय टीम के समर्थकों को भावनात्मक संतुष्टि तो प्रदान कर सकती है। लेकिन इससे ज़्यादा और निहितार्थ नहीं निकाले जा सकते हैं।

भारत की तरह पाकिस्तान की हॉकी भी अपनी पुरानी प्रसिद्धि की छाया मात्र रह गयी है,ये हम आप सभी अच्छी तरह से जानते हैं। जिस तरह के वहां अंदुरुनी हालात हैं उसमें वहां खेल के विकास की बात करना बेमानी है। स्क्वैश,क्रिकेट और हॉकी ये तीन ऐसे खेल हैं जिनसे पाकिस्तान की पहचान थी और ये तीनों ही अब दुर्दशा के शिकार हैं और अपनी निम्नतम अवस्था में हैं। अतः इस जीत पर भारत को बहुत ज़्यादा खुश होने का कोई कारण नहीं बनता।

पिछले कुछ वर्षों से भारत हॉकी के रिवाइवल का प्रयास कर रहा है। उसमे कुछ हद तक सफल भी रहा है। पर एक सीमा तक। पिछले कुछ सालों में उसकी रैंकिंग 6 से 10 के दायरे में घूमती रही है। निसंदेह एशिया की बात करें तो भारत श्रेष्ठ है लेकिन विश्व स्तर पर कहीं नहीं ठहरता। आज भी आप उससे किसी बड़े टूनामेंट जीतने की उम्मीद नहीं रख सकते। सेमीफाइनल में पहुंचना भी अभी सपना सा है,जीतने की बात तो छोड़िये।

हाल के वर्षों में हॉकी को ऊपर लाने के लिए दो प्रयास किये गए। एक हॉकी लीग शुरू की गयी और विदेशी कोच लाये गए। इनके परिणाम सीमित रहे हैं। आप ब्रासा,टेरी वाल्श, ओल्टमंस और मरीने तक अनेक प्रसिद्द विदेशी खिलाड़ी लाये मुँहमाँगी तनख्वाह पर। जब क्रिकेट जैसे खेल में विदेशी कोच नहीं चल सके तो हॉकी में क्या चलेंगे। दरअसल विदेशी कोच के साथ सबसे बड़ी समस्या खिलाड़ियों के साथ सामंजस्य की है। उनकी भाषा और तौर तरीकों के साथ खिलाड़ियों का सामंजस्य बैठाना बड़ा मुश्किल काम है। क्रिकेट में अपेक्षाकृत अधिक एलीट बैकग्राउंड वाले खिलाड़ी आते हैं जो कुछ हद तक विदेशी कोचों की भाषा और तौर तरीकों से वाकिफ होते हैं और वहां वे फेल हो जाते हैं तो हॉकी जैसे खेल में,जहां अपेक्षाकृत निम्न पृष्ठभूमि और आदिवासी क्षेत्रों से खिलाड़ी आते हैं,वहां वे विदेशी कोचों से किस तरह से सामंजस्य बैठते होंगे,ये समझा जा सकता है।इसी तरह लीग में खिलाड़ियों को पैसा जरूर मिला लेकिन जितना एक्सपोज़र देशी खिलाड़ियों को मिलना चाहिए था नहीं मिला। अनेक खिलाड़ी पूरी लीग में बिना खेले या कुछ मैच खेल कर रह जाते हैं। इस सब के बावजूद ये मान भी लिया जाए कि ये उपाय कारगर हो रहे हैं कि पिछले कुछ सालों में इन्ही की वजह से हॉकी में कुछ सम्मानजनक स्थिति में आये हैं तो भी एक मूलभूत समस्या को जब तक एड्रेस नहीं किया जाता तब तक आप एक सीमा से ज़्यादा उठान हॉकी का नहीं ही कर सकते। ये समस्या कृत्रिम घास के मैदानों की है।

दरअसल इस उपमहाद्वीप की हॉकी की दुर्दशा कृत्रिम घास के मैदान के साथ साथ आयी। प्राकृतिक घास के मैदान और कृत्रिम घास के मैदान के खेल में जमीन आसमान का अंतर है। खेल की बेसिक्स में ही अंतर है। कृत्रिम मैदान पर खिलाड़ी में स्टेमिना,गति और ताकत चाहिए। वहां घास के मैदान की तरह बाल पर ड्रिब्लिंग से नियंत्रण नहीं बनाये रख सकते। वहां आपको गेंद जल्द से जल्द रिलीज करनी होती है। भारत में कृत्रिम टर्फ के हॉकी में आने के इतने साल बाद भी गिने चुने शहरों में इसकी सुविधा है। ज्यादातर बच्चे घास के मैदान पर हॉकी खेलना सीखते हैं,उसी की बेसिक्स उनमें विकसित होती है और जब बड़े होते हैं तो कृत्रिम टर्फ पर खेलना पड़ता है। अब उन्हें नई तकनीक सीखनी होती है। बेसिक्स पर फिर से काम करना पड़ता है। सब घाल मेल होता जाता है। सिर्फ बेसिक्स पर ही नहीं शारीरिक संरचना(शरीर का बायो मेकेनिज्म) के एडजस्टमेंट में भी समस्या आती है। घास के मैदान पर खेलने की शारीरिक आवश्यकताएं  अलग होती हैं। खिलाड़ियों का शारीरिक विकास उसी के अनुरूप होता है। लेकिन बाद में कृत्रिम टर्फ पर शरीर को एडजस्ट करने में खासी दिक्कत आती है। इसीलिये एक सीमा तक तो आप प्रगति कर सकते हैं उससे आगे बहुत मुश्किल है। अगर शुरुआत से खिलाड़ी उसी सतह पर नहीं खेलेगा जिस पर उसे प्रतिस्पर्द्धात्मक हॉकी खेलनी है आप वांछित परिणाम शायद ही पा सकें चाहे जितना प्रयास कर लें।
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 फिलहाल तो इंडिया एशिया कप के सुपर फोर में पहुँच गयी है और गोल औसत के आधार पर पकिस्तान भी। तो एक और महा मुकाबले देखने की तैयारी कीजिये और ये उम्मीद रखिये कि कम से कम एशिया  में तो अपना परचम लहराने में टीम इण्डिया सफल होगी।