Sunday, 16 April 2017

फेसबुक की दुनिया_२

                         



चंद्रकांता बनाम मुख पुस्तिका
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              मुख पुस्तिका(फेसबुक)की किसी साहित्यिक कृति से तुलना करना बेमानी है। पर पता नहीं क्यूँ जब-जब मैं मुख पुस्तिका पर आता हूँ,चंद्रकांता संतति मेरे ज़ेहन में रह रह कर उभर आती है।और ज़ुकरबर्ग के साथ देवकीनंदन खत्री भी शिद्दत से याद आते हैं। चंद्रकांता संतति मैंने अस्सी के दशक में पढ़ी थी।उसके तीन दशक बाद अब मुख पुस्तिका का सहवास है। दोनों में मुझे गज़ब की समानता दीखती है। दरअसल चंद्रकांता अपने तिलिस्म के कारण ही इतना मक़बूल हुआ है। बिलकुल ऐसा ही तिलिस्म मुख पुस्तिका रचती है।हूबहू चंद्रकांता जैसा। कई बार मुख पुस्तिका चंद्रकांता संतति का आधुनिक संस्करण लगती है। 
                    चंद्रकांता भले ही साहित्यिक दृष्टि से कोई बहुत महत्वपूर्ण कृति ना हो। लेकिन रहस्य रोमांच की दृष्टि से अल्टीमेट है। कथानक बहुत तेज़ी से आगे बढ़ता है। कहानी पल पल नया रुख अख्तियार करती है। घटनाएँ इतनी तेजी से घटित होती हैं कि आपको तनिक भी अवकाश लेने का अवसर नहीं मिलता। उसमें रचा गया तिलिस्म अद्भुत है।अनिश्चितता इतनी कि आप कोई अनुमान नहीं लगा सकते। दिल थाम के पढ़ना पड़ता है। पाठक को पता ही नहीं चलता कब वो यथार्थ में है और कब तिलिस्म के बने जाल में है। जब पाठक ये सोच रहा होता है कि घटनाएं यथार्थ में घटित हो रहीं हैं तो अचानक पता चलता है वो किसी ऐयार द्वारा बना गया इंद्रजाल था। आप धम्म से ऊपर से नीचे गिर पड़ते हैं। अगले ही पल जब आप किसी इंद्रजाल की कल्पना कर रहे होते हैं तो पता चलता है कि ये तो यथार्थ घटित हो रहा था।आपकी सांस ऊपर की ऊपर और नीचे की नीचे रह जाती है। धड़कनें तेज़ हो जाती हैं। तिलिस्म और ऐयारी का गज़ब का शाहाकार है चंद्रकांता जिसका हैंगओवर किताब से बाहर आकर भी लम्बे समय तक बना रहता है। 
                        इसी के समानांतर मुख पुस्तिका को रखकर देखिए। ये भी तिलिस्म का आधुनिक शाहाकार है जो गज़ब का इंद्रजाल बुनती है जिसके आकर्षण से कोई नहीं बच पाता। जो इस इंद्रजाल में फंसा वो इसके आकर्षण से बाहर नहीं आ पाता। ये भी चंद्रकांता की तरह एक अद्भुत तिलिस्म बनाती है जिसमें ये पता ही नहीं चलता कब यथार्थ में चीज़े हो रही हैं और कब इस पर सक्रिय ऐयारों के इंद्रजाल में घटित हो रही हैं। इसमें भी आप किसी चीज़ पर विश्वास नहीं कर पाते। पता नहीं चलता क्या सच और क्या झूठ। वो सब जो आपको सच्चाई के बहुत करीब लगता है वो ही सबसे बड़ा झूठ होता है। जिसे झूठ समझते हैं अक्सर वो सच बन कर आपके मन को सहलाता है। कब शत्रु मित्र के वेश में ऐयारी कर रहा हो और कब कोई दोस्त शत्रु बना दूर से आपको तक रहा हो,कब दोस्त दुश्मन और दुश्मन दोस्त की भूमिका में आ जाए आप अनुमान नहीं लगा सकते।कब तलवारे तन जाएँ और कब कौन गले आकर मिल जाए नहीं जान सकते।घटनाएं भी गज़ब की तीव्रता से घटित होती रहती हैं। कई बार तो चंद्रकांता के कथानक को भी मात देती। चंद्रकांता का रहस्य रोमांच,लड़ाई,संघर्ष,प्रेम,वैराग्य,राग-द्वेष,झूठ-सच,छल-फरेब सब कुछ मुख पुस्तिका पर हूबहू मिलता है। मुख पुस्तिका से बाहर आकर भी इसका मोह जल्द नहीं छूटता। अक्सर लम्बे समय तक इसका हैंगओवर नहीं उतरता। 
                    अगर चंद्रकांता के प्रकाशन के समय उसे पढ़ने के लिए   बड़ी संख्या में लोगों ने हिंदी सीखी तो ऐसे लोगों की संख्या भी कम नहीं जिन्होंने मुख पुस्तिका को चलाने के लिए स्मार्ट फोन चलाना सीखा।हिंदी या अंग्रेजी में टाइप करना सीखा।    
                चंद्रकांता व चंद्रकांता संतति और मुख पुस्तिका में या फिर देवकी नंदन खत्री और मार्क ज़ुकरबर्ग के बीच लगभग सौ वर्षो का अंतराल है। ये कहा जाता है साहित्यकार भविष्य का वाचक होता है। वो भविष्य को पढ़ लेता है। तो क्या चंद्रकांता और संतति रचते हुए उन्होंने 100 साल आगे का समय देख लिया था। या कि ज़ुकरबर्ग ने मुख पुस्तिका को बनाने से पहले कभी चंद्रकांता और संतति को पढ़ा या उसके बारे में सुना था और उससे प्रभावित थे।पर दोनों में गज़ब की समानता तो है। 
              तो दोस्तों जिन्होंने चंद्रकांता को पढ़ा है और मुख पुस्तिका का आनंद नहीं लिया है तो चंद्रकांता के आधुनिक संस्करण का ज़रूर मज़ा लें और जिन्होंने मुख पुस्तिका का आनंद लिया है और चंद्रकांता नहीं पढ़ी है वे मुख पुस्तिका के 'प्रोटो टाइप' के रहस्य रोमांच में अवश्य ही डूबें उतराएं। मज़ा आएगा। 
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कुछ सम्बन्ध बेमेल होते हुए अद्भुत होते हैं और ये भी कि बिना बात दो चीजों में संबंध बनाने का अपना आनंद है। 
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