Friday, 1 July 2016

मेस्सी

           
         
            ऊँचाई कितना सकारात्मक शब्द है ! हर आदमी उस बुलंदी,उस ऊंचाई पर पहुंचना चाहता है जहाँ अब तक कोई ना पहुंचा हो। लेकिन शब्द की भावाभिव्यञ्जना निरपेक्ष नहीं होती। अलग अलग सन्दर्भ एक ही शब्द को  अलग अलग तासीर में आपके समक्ष ला खड़ा करते हैं। 'ऊंचाई' एक ऐसा शब्द जो हमेशा  आपके कानों में सकारात्मक प्रतिध्वनि उत्पन्न करता है,जो हमेशा आपको कुछ बेहतर करने की प्रेरणा देता है,आपको सुनने में अच्छा लगता है, वही शब्द आपके दिमाग में एक विलेन की तरह चस्पा हो सकता है,आपको अवसाद में डुबो सकता है,आपको निराशा और अन्धकार के गहनतम धरातल पर ला पटक सकता है। ये बात मेस्सी के दुनिया भर के उन लाखों करोड़ों चाहने वालों से बेहतर कौन जान सकता है जो रविवार की रात को कोपा अमेरिका कप का फाइनल देख रहे थे। मेस्सी की पेनाल्टी किक की उस थोड़ी सी अतिरिक्त ऊंचाई ने बिना आवाज़ किये ही अजेंटीनावासियों के उनकी टीम द्वारा कोपा अमेरिका कप जीतने के स्वप्न को ही चूर चूर नहीं किया था बल्कि मेस्सी के फैंस के दिलों को भी तार तार कर  दिया।मेस्सी एक बार फिर खाली हाथ रह गए। ये चौथी बार हो रहा था कि मेस्सी फाइनल में अपने देश को जीत नहीं दिला सके। इन चार फाइनल में 2014 का विश्व कप का फाइनल  भी शामिल था। वे एक बार फिर अपने देशवासियों सहित करोड़ों लोगो की भरी उम्मीदों के बोझ तले दब कर रह गए। वे अपने ही देशवासी माराडोना या पेले की तरह महानतम नहीं बन पाए क्योंकि वे कोई ख़िताब नहीं जीत पाए। रविवार की रात को उस पेनाल्टी किक को बाहर मारने का असहनीय दर्द बच्चे सी मासूमियत वाले मेस्सी के चेहरे की उदास सूनी आँखों से होता हुआ उनके हर चाहने वाले के सीने  पर नुमाया हो रहा था।बॉल की उस अतिरिक्त ऊंचाई ने हमारे समय के सबसे सच्चे खिलाड़ी के खेल से पूरी दुनिया को महरूम कर दिया क्योंकि अब वे अपनी राष्ट्रीय टीम के लिए उपलब्ध नहीं रहेंगे और किसी भी खिलाड़ी का सर्वश्रेष्ठ  अपनी राष्ट्रीय टीम के लिये ही होता है। 
                                             
     हो सकता है वे अपने समकालीन रोनाल्डो क्रिस्टियानो की तरह परफेक्ट ना हो या फिर वे माराडोना की तरह ईश तुल्य भी न हो जो अपने लक्ष्य की प्राप्ति के लिए अपना सम्पूर्ण झोंक देने के अतिरिक्त  ज़रुरत पड़ने पर बेईमानी भी कर सकता हो जैसे कि हमारी पौराणिक कथाओं में तमाम चरित्र मिलते हैं या फिर पेले की तरह महानतम भी ना हो जिसने अपने देश ब्राज़ील को सफलता की बुलंदियों पर पहुंचाया हो। दरअसल वो अपूर्णताओं का खिलाड़ी था। वो एक ही समय में अविश्वसनीय किक से गोल कर सकता था और अगले ही क्षण पेनल्टी को जाया कर सकता था।  वो एक ही समय में दुनिया भर  श्रेष्ठ रक्षकों को छका सकता  था और साधारण से गोलकीपर से मात खा सकता था।  अपने खेल के दम पे  अपनी टीम को उस समय  जीता सकता था जब कोई उम्मीद नहीं कर रहा हो और जब उससे सबसे ज़्यादा उम्मीद हो तो सबको नाउम्मीद भी कर सकता था।नाउम्मीदी में शानदार खेल दिखा सकता था और उम्मीदों के बोझ से ढेर भी हो सकता था।  वो मैदान में हर क्षण  खेल को जीता था। जब वो ये कहता है कि 'उसे खेलने में जब तक गली मोहल्ले में खेलने वाले लडके की तरह आनंद आता रहेगा वो खेलता रहेगा' तो उस समय उसके भीतर का सच्चा खिलाड़ी बोल रहा होता है। दरअसल उसके खेल की यही अनिश्चितता और अपूर्णता उसे सच्चा खिलाड़ी बनती है और  विशेषता उसे औरों से अलग ही नहीं करती बल्कि एक खिलाड़ी के रूप में महानतम बनाती है।  वो असाधारण प्रतिभा वाला खिलाड़ी था लेकिन उसमें साधारण खिलाड़ी वाली कमजोरियां भी थीं गली में खेलने वाले लडके की तरह। यही साधारणता उसे असाधारण बनाती है। याद कीजिये सचिन तेंदुलकर को ना तो वे लॉर्ड्स के मैदान पर शतक बना सके और ना ही कोई टीहरा शतक लगा सके। ये असफलता उनकी महानता को काम नहीं कर सकती। कोई भी असफलता मेस्सी की महानता को भी कम नहीं कर सकती। वो असफलता पर दुखी हो सकता है और संन्यास लेने की घोषणा कर सकता है,लेकिन असफलताओं से अविचलित होने का दिखावा नहीं कर सकता। ये एक सच्चा खिलाड़ी ही कर सकता है। एक 'सच्चे खिलाड़ी' को एक सलाम तो बनता है।  

















एक अनिर्णीत संघर्ष जारी है

एक अनिर्णीत संघर्ष जारी है  यकीन मानिए बैडमिंटन चीन और इंडोनेशिया के बिना भी उतना ही रोमांचक और शानदार हो सकता है जितना उनके रहते...