Tuesday, 18 October 2016

फेसबुक की दुनिया_१

                                
                                    

                                      आपकी अपनी एक दुनिया है जिसमें आप जीते हैं। हममें से बहुतों की एक और दुनिया है-आभासी दुनिया।ये फेसबुक की दुनिया है।आभासी इसलिए कि वो होकर भी नहीं है और नहीं होने के बावज़ूद है। आपके पास अनगिनत लोग हैं,आपके हज़ारों मित्र हैं,फिर भी आप अकेले हैं। और अकेले होते हुए भी आप अपने को भीड़ से घिरा पाते हैं। यहाँ सब कुछ है-राग-द्वेष,अनुराग-विराग,प्यार-घृणा, लड़ाई-झगड़े,मैत्री। आखिर क्या नहीं है सब कुछ तो है  । इतना सब कुछ होते हुए भी खालीपन है। चारों ओर सन्नाटा है। सन्नाटे में गज़ब का कोलाहल है और इस कोलाहल के अपनी ताक़त के साथ मौज़ूद होने के बावज़ूद अजीब सा सूनापन है,ऐसा सूनापन जो आपके सीने को चीर कर रख दे।यहां चारों तरफ ज़िन्दगी के रंग बिखरे पड़े है। दूर से देखो इन रंगों से ज़िन्दगी के कितने खूबसूरत कोलाज़ बने दिखाई देते हैं और पकड़ने जाओ तो कोई रंग दिखाई ही नहीं देता,यहां तक कि श्याम श्वेत भी नहीं।बावज़ूद इसके यहाँ भरी पूरी दुनिया मौजूद है अपनी पूरी संभावनाओं के साथ। यहाँ लोग भी हैं अपनी पूरी ताक़त के साथ,अपने अपने चरित्रों को जीते हुए। आप लोगों की दीवारों पर जाइये।अद्भुत रंग मिलेंगे जीवन के। बस महसूस कीजिये।
                                              यहाँ एक दीवार है जहाँ तीन सहेलियां हमेशा मौजूद मिलेंगी एक साथ ज़िन्दगी को मुकम्मल बनाते हुए। एक ज़िन्दगी का सिरा शुरू करती है,दूसरी उसे आगे बढ़ाती है तो तीसरी उसे अंतिम छोर पे ले जाती है। वे एक जीवन की सरल सीधी रेखा खींचती हैं पर त्रिकोण बनाते हुए,तीनों एक दूसरे से खुद को भरते हुए और खुद से दूसरे को  भरते हुए भी।एक दूसरे की ओर आते हुए और एक दूसरे से दूर जाते हुए भी। इनमें एक प्रस्थान बिंदु है। वो रोज़ अपना स्टेटस अपडेट करती है। प्रेम रस से भीगा भीगा सा। अल्हड सा। दिल की गहराईयों से निकला। कुछ एब्स्ट्रेक्ट सा। एक अधूरापन सा लिए। एक चिर प्रतीक्षा में। मुकम्मल होने की चाह में। उसके उल्लास में भी भीतर ही भीतर करुण संगीत सा बजता सुनाई देता है। ये करुण स्वर तीव्र से तीव्रतर होता जाता हैं। जिस समय आप प्रेम में भीगे इस करुण संगीत को सुन रहे होते है कि अचानक एक क्लिक की आवाज़ सुनाई देती है। ये सहेली का कमेंट होता है। स्टेटस के जुगलबंदी करता सा। अब आपको करुण संगीत के साथ खिलखिलाहट भी सुनाई देने  लगती है। हास का गुदगुदाता सा संगीत तीव्र होता जाता है। हास धूप सा फ़ैल जाता है। मानो बादलों की ओट से फैली सुरमई छाँव को बादलों में सेंध लगाकर आई किरणों ने रोशनी में बदल दिया हो। सहेली का कमेंट पूर्णता लिए हुए। भरा पूरा सा। उल्लास और उमंग से रंगा। ये पहली सहेली को भी अपने रंग में रंग लेता है। वो भी खुशी के रंग में भीगने लगती है। करुणा का संगीत मंद होता जाता है। उल्लास के स्वर तीव्र होते जाते हैं। अब वे कमेंट दर कमेंट करती जाती हैं। वे पहाड़ी नदी का रूप ले लेती हैं। निर्द्वंद बहती जाती हैं। बहुत से नदी नालों को समाहित  हुए कल  कल करती,उल्लास के संगीत सी। इस संगीत में आप डूबे नहीं कि  एक क्लिक और। ये तीसरी सहेली का कमेंट है।  इसमें भी उल्लास है,उमंग है,यादें हैं,आहें हैं। ये दोनों से मिल कर कल कल का नाद कुछ और तेज करती है। पर इस तीसरे कमेंट में ऊर्जा होते हुए भी एक अजीब सा नैराश्य सा पसरा है,एक वैराग्य भाव सा है। मानो उसने जीवन को बहुत करीब से देखा हो या जीवन का सत्य जान लिया हो।अचानक लगता है वो पहाड़ी नदी किसी पहाड़ी क्षेत्र से समतल मैदान में बहने लगी है। शांत स्थिर नीरव सी। कुछ देर यूँ ही बहने के बाद तीनों सहेलियां वापस लौट जाती हैं अपनी अपनी दुनिया में अपने-अपने हिस्से के सुख दुःख सहने। लेकिन फिर मिलने को। निर्द्वंद बहने को। अपने को अभिव्यक्ति देने  को। जीवन में कुछ और रंग भरने को। 
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आभासी दुनिया के रंग _१ 
    

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