Tuesday, 17 January 2017

यादों में इक शहर_1

                     
                           ये यादें भी कितनी दिलचस्प होती हैं और अजीब भी।कितने रंगों में,कितने रूपों में हमारे ज़ेहन में बिखरी होती हैं।कितना भी हटाने की कोशिश करो पर जस की तस बनी रहती हैं।किसी ऊँचे पर्वत सी हो जाती हैं जमा होते होते जिनसे गुज़रना उस पर्वत की चोटी को जीत लेना है। कुछ रुलाती हैं तो कुछ हँसाती हैं ।कुछ जुगनुओं सी चमकती बुझती रहती हैं तो कुछ स्ट्रीट लाइट सी स्थायी तौर पर जली रहती हैं।कुछ सर्द हवाओं सी चुभन देती हैं कुछ नरम मुलायम धूप सी मरहम लगाती हैं।  कुछ आपकी आत्मा पर जोंक सी चिपकी हुईं होती हैं जिनसे दर्द रिसता रहता है तो कुछ दिल पर तितली सी बैठी रहती हैं जो अपने रंगों से जीवन को उल्लास से भर देती हैं।
                      इन्ही यादों में दूर तक पसरा है एक छोटा सा शहर। एक ऐसा शहर जिसमें गांव की आबोहवा थी, उसकी सौंधी महक थी,गंवईपन था।वो शहर जिसमें गाँव का अल्हड़पन तो था ही पर शहर की थोड़ी सी नफासत भी मिली थी । वो शहर होने भर को शहर था।शहर होने के लिए ज़रूरी कुछ थोड़ी सी सुविधाओं से लैस शहर।शांत ठहरा सा। बस शहर होने के एहसास भर से संतुष्ट शहर। ऐसा शहर जिसमें आगे बढ़ने की जल्दबाज़ी ना थी। वो शहर जो कुछ कुछ मखमली सा था और कुछ कुछ खुरदुरा सा भी।वो शहर जिसमें बचपन बीता, तरुणाई बीती और यौवन की दहलीज़ तक आमद हुई।वो शहर जो हम में रचा बसा है और जिसमें हम रचे बसे हैं।वो शहर जिसकी गली कूँचों में हमारी यादें बिखरी पड़ी हैंऔर हमारी यादों में उसकी गली कूँचे। वो शहर जिसमें हम जिए। वो शहर जिसे हमने जिया। वो शहर जिसमें ख्वाबों को देखना सीखा, जिसमें ख्वाब देखे और उन ख्वाबो के लिए कुछ करने गुज़रने की सलाहियत पाई।वो शहर जिसमें क ख ग सीखा पढ़ाई का भी और ज़िन्दगी का भी। (जारी )
                  
                 

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